वात रोग के कारण, लक्षण और क्या है वात विकार

हमने पिछले पोस्ट में बताया था की आयुर्वेद के अनुसार किसी व्यक्ति में होने वाले सभी रोगों का प्रमुख कारण वात, पित्त और कफ होता है तथा इनमे से सबसे मुख्य और बड़ा कारण “वात” को माना गया है अर्थात वायु | इस पोस्ट में हम वात असंतुलित होने पर क्या लक्षण उभरते है और वात प्रधान व्यक्तियों की सेहत कैसी होती है यह जानेगें |

त्रिदोष धातुओ की प्रमुखता किसी व्यक्ति की प्रकृति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है जैसे – लाल ऑंखें पित्त के कारण होती है, आँखों की सफेदी कफ के कारण और सूखापन वात के कारण। इन लक्षणों में से किसी एक की मौजूदगी के आधार पर यह निर्धारित किया जाता है की व्यक्ति किस धातू के ज्यादा प्रभाव में है ।

वात रोग के कारण, लक्षण और पहचान

वात रोग के कारण, लक्षण vat rog ka karan aur lakshan

वात के लक्षण

अब हम उन कारणों के बारे में जानेंगे जिनसे वात-विकार उत्पन्न होता है, ताकि वातग्रस्त लोग उनसे बच सकें। ये है – उपवास, देर से भोजन करना, और भूखे रहना वात दोष के कार्यों में बाधक है। रात्रि में देर तक जागना, ठंडी हवा में रहना, जरूरत से ज्यादा पका हुआ सूखा आहार, और बासी भोजन, आनुवंशिक गड़बड़ी, यूरिक एसिड के लवणों का कम उत्सर्जन शामिल हैं। इस दोष को बढ़ाने वाले कुछ अन्य कारण हैं। वर्षा ऋतु, रात्रि का अन्तिम प्रहर, वृद्धावस्था, जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों की जलवायु भी वातवर्द्धक हैं। चोट और रक्तस्राव से और सख्त बिस्तर पर सोने से भी वात कुपित होता है। अति-व्यस्त जीवन-शैली, अपराध-भावना, भय और दुख जैसी भावनाएं वात को कुपित करते हैं।

यह साफ़ है कि वात प्रधान व्यक्ति वातवर्द्धक दोष से आसानी से प्रभावित होगा। इसलिए सबसे पहले, हमें वात के लक्षणों के बारे में जानना चाहिए | वात अवस्था जीवन का अंतिम एक तिहाई भाग (इकसठ वर्ष की उम्र से जीवन के अंत तक) है।  वात प्रकृतिवाले व्यक्ति का सीना चपटा होता है, वह शारीरिक रूप से दुबला और अत्यंत सक्रिय होता है। उसकी मांसपेशियाँ स्नायु और नसें बाहर से दिखती हैं। ऐसे व्यक्ति का रंग भूरा या नीलाभ होता है। उसकी त्वचा रूखी, ठंडी, सूखी और फटी हुई होती है। उसके बाल काले और धुंघराले होते हैं तथा मांसपेशियाँ कमजोर होती हैं। आँखें छोटी, सूखी और धंसी हुई होती हैं तथा उसका नेत्र श्लेष्म (कंजक्टिवा) कोचयुक्त तथा सूखा होता है।

सामान्यत: व्यक्ति से पूछताछ के आधार पर उसकी प्रकृति निर्धारित की जाती है, साथ ही यह शारीरिक जाँच पर भी निर्भर करती है। पूछताछ -भाग () में बताई गई है। नंबर सभी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करते हैं। शारीरिक जाँच का जिक्र भाग (ब) में है। इसके लिए भी नंबर को उसी तरीके से किया जाता है।

वात प्रकृति के व्यक्तियों की आदते अक्सर ये होती है  :

भाग अ :

  • काम को कैसे करते हैं- बहुत जल्दी
  • उत्तेजित हो जाते हैं- बहुत जल्दी
  • नई चीजों को सीखने की शक्ति- तेज
  • याददाश्त- कम
  • भूख, पाचन- अनियमित
  • भोजन की मात्रा, जो आप ग्रहण करते हैं- कभी अधिक, कभी कम
  • कैसा स्वाद पसंद करते हैं- मीठा, खट्टा, नमकीन
  • प्यास कितनी लगती है- बहुत कम
  • किस प्रकार का भोजन पसंद करते हैं- हलका गरम
  • किस प्रकार का पेय पसंद करते हैं- गरम
  • मलत्याग नियमित है या अनियमित – अनियमित
  • कब्ज की क्या स्थिति है- सख्त कब्जवाला मल
  • किस प्रकार का पसीना आता है- अधिक और दुर्गंधयुक्त
  • यौन इच्छा— कम
  • कितने बच्चे— एक या दो, छोटा परिवार
  • क्या अच्छी नींद आती है- बाधित नींद, पाँच-छह घंटे
  • क्या रोज सपने देखते हैं- हाँ।
  • उड़ने, उड़ाने, कूदने, भागने के डरावने सपने बोलने की समस्याएँ- परेशानी के साथ, अनियंत्रित मस्तिष्क के साथ, आत्मनियंत्रण नहीं
  • बातचीत का तरीका- बहुत तेज, परंतु शब्दों को छोड़ते हुए
  • चलने का तरीका- तेज, हाथ-पाँव तेज हिलाते हुए कार्य के दौरान पैरों, हाथों, भौंहों – की हरकतें-साथ-साथ

वात प्रकृति के व्यक्तियों की सेहत 

भाग  ब :

  • सीने की दृश्य पसलियाँ- छोटी, लंबी पसलियाँ, अदृश्य
  • पेट—पतला
  • आँखों की पुतली का रंग- नीला या काला
  • जीभ—गहरे रंग की
  • दाँत- बड़े या छोटे, चटके हुए, चौड़े, अनियमित और असंगत
  • होंठ- सूखे और काले
  • शारीरिक संरचना- दुबला/नाटा
  • शरीर का भार- हलका, औसत से कम
  • शारीरिक बल—कमजोर
  • शारीरिक प्रवृत्ति– रूखा, शुष्क, कमजोर, दुबला
  • शरीर पर बाल- कम
  • शरीर की गंध- गंधहीन या अप्रिय
  • त्वचा का रंग- नीला या गहरा काला
  • त्वचा की प्रकृति- फटी हुई, सख्त, रूखी
  • त्वचा का तापमान- कम, ठंडे हाथ-पैर, ठंडा सीना
  • जोड़- ढीले, कठोर, अस्थिर
  • स्नायु- अस्थिर, दृढ़
  • पैरों के निशान – अनिश्चित
  • हाथ- शुष्क, रूखे, कड़े, कालापन लिये हुए
  • नाड़ी- अनियमित, तेज
  • आँखें- सोने के समय खुली रहती हैं

ऊपर वात प्रधान व्यक्तियों के कुछ लक्षण दिए गए थे अगर आपको इन लक्षणों में कुछ उलझन महसूस हो रही है और आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहे है तो कोई बात नहीं इसके तीन कारण हो सकते है, एक तो ये लक्षण वात के असंतुलन के बाद ज्यादा उभर कर आते है दूसरा आप में अनुभव की कमी है और तीसरा ये की आपकी प्रक्रति पित्त और कफ प्रधान की हो सकती है | आइये इससे सम्बंधित कुछ और जानकारियां लेते है |

वात के असंतुलन और वात प्रधान व्यक्ति के बीच का फर्क समझना भी जरुरी है | यदि वात असंतुलित हो जाये तो कोई भी व्यक्ति उससे सम्बन्धित रोगों का शिकार हो जाता है | और जो व्यक्ति जन्म से ही वात प्रधान वाले होते है उनमे कफ और पित्त प्रधान व्यक्ति की अपेक्षा वात बिगड़ने की संभावना ज्यादा होती है |

वात प्रकृतिवाले लोग दुबले तथा आकर्षक होते हैं। और दूसरों द्वारा आसानी से आकर्षित हो जाने वाले होते हैं। कफ प्रकृति वाले व्यक्ति मजबूत शरीर के, नाटे तथा मधुमेह के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वात प्रकृति वाले व्यक्तियों में स्नायु-विकार (Neurosis) होने की अधिक संभावना होती है।

असंतुलन– वात प्रकृति का व्यक्ति स्वभाव से खुशमिजाज और जोश से भरपूर होता है। जब यह असंतुलित अवस्था में होता है तो बचपन से वृद्धावस्था तक व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के दर्द का शिकार बनना पड़ता है। अकसर उच्च वर्ग के लोग इसके असंतुलन के शिकार होते हैं। वे नींद की गोलियाँ दर्द की दवाएँ तथा ट्रैक्वलाइजर लेने लगते हैं। ये दवाएँ शरीर में साइड इफेक्ट तथा मस्तिष्क में परिवर्तन उत्पन्न करती हैं। अधिकतर रोग इसके असंतुलन के कारण ही पैदा होते हैं।

वात की संतुलित करते ही पीठ दर्द, मासिकपूर्व दर्द तथा अवसाद समाप्त हो जाता है। यह ज्यादातर वृद्धावस्था में उभरता है। त्वचा सिकुड़ जाती है, मांसपेशियाँ कमजोर हो जाती हैं, फलस्वरूप व्यक्ति जल्दी थक जाता है और जीवन दु:खमय बन जाता है। ये सब परेशानियाँ इसके कारण होती हैं।

वात प्रधान प्रकृति वाले व्यक्ति में वात असंतुलन की संभावना अधिक रहती है। उन्हें इन लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए 1. भावनात्मक दुःख, आघात, भय, 2. सूखा मौसम तथा ठंडा जलवायु , 3. खाली पेट 4. अनियमित पेय, 5. असंतुलित भोजन, 6. असमय भोजन, 7. ठंडा, शुष्क, तीखा, कड़वा तथा सख्त भोजन, 8. कम नींद 9. अधिक कार्य की वजह से बेचैनी तथा तनाव, 10. शारीरिक थकावट, 11. शराब, सिगरेट की लत और 12. स्थान तथा आहार में अचानक परिवर्तन।

वात रोग के लक्षण

  1. शरीर में ऐंठन या संकुचन, 2. शरीर में दर्द-माइल्जिया-पेशियों में दर्द, न्यूरेल्जिया तंत्रिका उत्तेजना, आर्थरल्जिया- जोड़ों में दर्द, 3. मरोड़- मांसपेशियों में मरोड़-व्यायाम, खेल के बाद या अत्यधिक यौनक्रिया के बाद 4. अधीरता, 5. पेट फूलना, 6. कमजोरी और 7. फेफड़ों में संकुचन, 8. साइनस में संकुचन, 9. द्रव जमा होने के कारण शरीर में सूजन, 10. पाचक अग्नि मंद, 11. आलस्य, 12. 13. मधुमेह, 14. कुछ भी करने की इच्छा न होना |

शारीरिक परेशानियाँ : 1. शुष्क त्वचा, 2. कमजोरी, थकान, 3. गैस के कारण परेशानी, 4. पेट फूलना, 5. सर्दी, 6. विभिन्न प्रकार के दर्द, 7. वजन में कमी, 8. पेशियों में दर्द-मरोड़, 9. नसों में दर्द, 10. पीठ दर्द, 11. मासिकपूर्व दर्द, 12. ऑत-प्रदाह (इरीटेबल कोलोन सिंड्रोम), 13. उच्च रक्तचाप, 14. फटे होंठ, 15. फटी त्वचा और 16. मन भटकाव ।

मानसिक समस्याएँ :

  1. साइकोसिस (मनोविकृति), 2. अवसाद, 3. व्यग्रता, 4. चिंता, 5. अधीरता और 6. मानसिक अस्थिरता। ये लक्षण वात-असंतुलन के कारण उत्पन्न होते हैं। अन्य दोनों दोषों के असंतुलन के कारण भी उपर्युक्त लक्षण और विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

वात दोष वाले लोग अकसर कब्ज के शिकार रहते हैं। यह अन्य दोनों दोषों के कारण भी हो सकता है। जब ये दोष कुपित हो जाते हैं तो व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक विकारों से ग्रस्त हो जाता है। यह भी जरुर पढ़ें – जानिए क्या है आयुर्वेद के अनुसार क्या है त्रिदोष

इस पोस्ट में हमने वात बिगड़ने और वात प्रधान व्यक्तियों की शारीरिक और मानसिक अवस्था के लक्षणों उनको किस रोग के होने की अधिक संभावना होती है, इन सब बातो को बताने का प्रयास किया है | आगे आने वाले पोस्ट में हम वात बिगड़ने की दशा में यानि वात असंतुलित होने के बाद इसको कैसे संतुलित किया जाता है और वात प्रधान लोगो को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए यह बतायेंगे |

अन्य सम्बंधित पोस्ट 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *