आयुर्वेद के अनुसार पाचन क्रिया ठीक करने तथा पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय

आयुर्वेद के अनुसार यदि सही मात्रा में और ठीक समय पर संतुलित भोजन किया जाए तो कोई बीमार ही न पड़े। परंतु ऐसा नहीं किया जाता है और फिर गैस्ट्रिक अल्सर, आँत का अल्सर तथा पेप्टिक अल्सर जैसे रोगों की संभावना बढ़ जाती है। आयुर्वेद में पाचन तंत्र को काफी महत्त्व दिया गया है। जब पाचन क्रिया सही होता है तो कोशिकाओं समेत शरीर के सभी ऊतक पर्याप्त पोषण प्राप्त करते हैं और शरीर के विकास में मदद करते हैं।

त्रिदोष तथा पाचन क्रिया

आयुर्वेद का मानना है कि लोगों को स्वास्थ्यप्रद आहार खाना चाहिए । तीन प्रमुख शारीरिक विकारों का पाचन भिन्न होता है वात प्रकृति के व्यक्ति का पाचन परिवर्तनशील, नाजुक तथा तेज़ होता है। पित्त प्रकृति के व्यक्ति का पाचन गहन तथा मजबूत होता है, यानी ऐसे व्यक्ति भारी भोजन भी पचा सकते हैं। कफ प्रकृति के व्यक्ति का पाचन धीमा तथा भारी होता है। इसे अदरक की चाय या जीरा के साथ धनिया लेकर सुधारा जा सकता है। वात दोष में शुद्ध रक्त निर्माण तथा उपयुक्त चयापचय की आवश्यकता होती है। वात प्रकृति के लोगों का पाचन परिवर्तित होता रहता है। आयुर्वेद का मानना है कि मजबूत पाचन ऊतकों को उचित पोषण देता है तथा व्यर्थ पदार्थों, जैसे मल के सहज विसर्जन में मददगार होता है। इसलिए शरीर को संतुलित अवस्था में रखने के लिए पाचन क्रिया की अग्नि को संतुलित करना सबसे ज्यादा आवश्यक है। जठराग्नि क्या है? – पाचक अग्नि (Digestive enzymes) ही भोजन को हजम करके उसमे से जरुरी उर्जा शरीर में पहुंचाता है | जैसे किसी मशीन या वाहन में पैट्रोल जलकर पैदा हुई एनेर्जी से वाहन चलता है ठीक ऐसे ही पाचक अग्नि भोजन को जलाकर उससे पैदा पोषक तत्वों से हमारा शरीर चलता है |

पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय 

आयुर्वेद के अनुसार पाचन क्रिया ठीक करने तथा पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय pachan kirya shakti badhane ki ayurvedic dawa

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  • आयुर्वेद के अनुसार पाचन क्रिया की गतिविधियाँ लयबद्ध होती हैं। उस लय का पालन करना तथा सही समय पर उचित मात्रा में भोजन करना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो यह पाचन क्रिया में असंतुलन को पैदा करता है और रोगों को जन्म देता है।
  • ग्रामीण लोग समय से भोजन करने में अनुशासित होते हैं, इसलिए उन्हें पाचन क्रिया के असंतुलन तथा इससे संबंधित बीमारियों की कोई शिकायत नहीं होती है। शहरों में रहने वाले लोगों की तुलना में यह उत्तम तथा प्रशंसनीय है।
  • जब भोजन गलत समय पर पर किया जाता है तो पाचन क्रिया में गड़बडियाँ पैदा होती हैं, जिससे निम्नलिखित लक्षण पैदा होते हैं- भूख की कमी, कब्ज या डायरिया, कलेजे में जलन (हाइपर एसिडिटी या अति अम्लता), पेट में जलन, वजन सामान्य से कम या अधिक, संग्रहणी रोग (पाचक रोग), अल्सर, इरिटेबल कोलोन सिंड्रोम, कोलाइटिस (शोथ) तथा पेटदर्द।
  • यदि ये सभी लक्षण उभरते हैं तो 15 दिनों में एक बार पाचकाग्नि या पाचन क्रिया को फिर से ठीक करना आवश्यक होता है। कफ प्रकृति में पाचन क्रिया को 7 दिनों में एक बार ठीक करने की जरूरत होती है। यदि किसी को सूजन, डायरिया (दस्त), पेचिश (डिसेंटरी) तथा अल्सर है तो चिकित्सक के परामर्श के बिना पाचन क्रिया को पुनर्व्यवस्थित न करें।
  • पाचन क्रिया को ठीक करने के लिए हलका आहार लेना तथा सोते समय गरम पानी में अरंडी के तेल के साथ दस्तावर लेना अच्छा रहता है। यह पेट तथा आँत में अल्सर वाले रोगियों को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। यदि यह उन्हें दिया ही जाता है तो तेल में दूध मिलाना चाहिए। अगले दिन उपवास करना तथा पूरे दिन तरल पदार्थ लेना ही बेहतर होगा।
  • पाचन क्रिया को ठीक करने के लिए वात तथा पित्त प्रकृति के लोगों को चाहिए कि फलों के रस को गरम पानी साथ मिलाकर लें। यह पूरे दिन लेना ठीक रहेगा।
  • कफ प्रकृति के लोगों को केवल गरम पानी पीना चाहिए। उन्हें केवल आराम करना चाहिए। हलका आहार लेना उनके लिए उत्तम है, क्योंकि यह शरीर के लिए स्वास्थ्यकर है।
  • तीसरे दिन हलका नाश्ता लेना तथा दोपहर के हलके भोजन तथा रात का भोजन के बीच गरम पानी पीना अच्छा रहता है।
  • पाचन क्रिया को ठीक रखने के लिए शराब तथा अन्य सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए।
  • यदि आप चाय पीना चाहते हैं, तो अदरक की चाय या जीरा पाउडर के साथ धनिए की चाय लेना फायदेमंद है। भोजन के बाद गरम पानी पीएँ, जो पाचक होता है तथा भूख को बढ़ाता है।
  • दो समय के भोजन के बीच गरम पानी या अदरक की चाय या धनिया की चाय के अलावा कुछ न लें।
  • पाचन क्रिया दुरुस्त करने के लिए भोजन में सब्जियाँ, दाल तथा चावल होना चाहिए। यह सभी प्रकार के वात, पित्त तथा कफ व्यक्तियों के लिए उपयुक्त होता है।
  • इन सब उपायों को करने बाद पाचन क्रिया फिर से संतुलित हो चुकी होगी तथा आप पहले की तरह अपना नियमित आहार ले सकते है।
  • पाचन क्रिया को ठीक करने तथा शरीर को रोगों से मुक्त रखने के लिए कच्ची सब्जियाँ खाना अच्छा रहता है।
  • कॉफी, शराब तथा नमक से परहेज करना चाहिए। कॉफी नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करती है, यह सभी अंगों को उत्तेजित करके कुछ देर के लिए फुर्ती का अहसास तो दिलाती है, परंतु बाद में थकान पैदा करती है। यही काम शराब भी करती है।
  • अधिक नमक युक्त भोजन अधिक तरलता को शरीर में बढ़ाने का काम करता है, जिससे अधिक वजन और उच्च रक्तचाप की शिकायत हो सकती है। बाद में यह हृदयाघात को भी जन्म दे सकता है।

अमा (बिना पचा हुआ भोजन) तथा पाचन क्रिया की अग्नि

  • आयुर्वेद का मानना है कि पाचन क्रिया की अग्नि को संतुलित अवस्था में तथा सही समय पर भोजन को पचाने की स्थिति में होना चाहिए। यदि भोजन ठंडा या बासी है तो अग्नि उसे नहीं पचा पाती है, बल्कि ऐसा भोजन दोषों की उचित गति में बाधा उत्पन्न करता है। इस चरण को अमा कहते हैं।
  • दूसरी ओर, यदि पाचन क्रिया की अग्नि अधिक मात्रा में है तो भोजन के लेते ही वह उसे तत्काल जला डालती है, जिससे पाचन क्रिया अक्षम हो जाती है। वह व्यक्ति अपनी सामान्य शक्ति खोकर थकान से पीडित हो जाएगा।
  • पाचन क्रिया के संतुलित अवस्था में होने का अर्थ है अच्छा स्वास्थ्य। परंतु उसका असंतुलन दोषों के द्वारा रक्तसंचार के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों में बिना पचे, दूषित भोजन को फैलने के लिए उकसाता है।

संतुलित पाचन क्रिया की अग्नि के लक्षण हैं :

  • यह शरीर को रंगत प्रदान करती है।
  • व्यायाम के प्रति सहनशक्ति
  • अच्छा स्वास्थ्य
  • भारी काम करने की अधिक क्षमता
  • कठिन परिश्रम करने के लिए हमेशा तैयार
  • मजबूत तथा परिश्रमी शरीर
  • सभी प्रकार का भोजन पचाने की क्षमता
  • चमकीली रंगत
  • चमकीली आँखें |
  • साफ मूत्र विसर्जन
  • बिना किसी दुर्गंध के सामान्य रूप से मल त्याग
  • कब्ज तथा दस्त की शिकायत नहीं।

जब शरीर में अमा पैदा होती है तो निम्नलिखित आरंभिक लक्षण देखने को मिलते हैं :

  • भूख में कमी
  • कमजोर पाचन
  • निस्तेज आँखें तथा चमक रहित त्वचा
  • परतदार जीभ
  • मुँह में अरुचिकर स्वाद
  • दुर्गंधयुक्त साँस
  • जोड़ों में दर्द
  • लगातार दस्त या कब्ज की शिकायत।

यदि पाचन क्रिया संतुलित तथा सामान्य है तो अमा स्वतः ही पच जाएगा तथा शरीर के ऊतकों को पोषण देने के लिए संचार हेतु उपयुक्त होगा।

पाचन क्रिया को दुरुस्त करना

  • आयुर्वेद चिकित्सा ग्रंथों में असंतुलित पाचन क्रिया की अग्नि को संतुलित अवस्था में लाने तथा उसमें सुधार के लिए बहुत से उपाय बताए हैं। इनसे न केवल भूख बढ़ती है, बल्कि पाचक अग्नि को सामान्य करने में भी मदद मिलती है, जिससे बदहजमी दूर हो जाती है।
  • कुछ खाद्य पदार्थ, जड़ी-बूटियाँ तथा मसाले अग्नि को सामान्य अवस्था में लाने के लिए उपयुक्त हैं : जैसे :-
  • अदरक : एक महत्त्वपूर्ण पाचक है। सूखा अदरक, जिसे सोंठ कहते हैं, यह पाचन क्रिया के लिए बहुत फायदेमंद है। अदरक का एक छोटा टुकड़ा पीसकर दो कप पानी में मिलाएँ। इसमें एक चुटकी धनिया मिलाकर एक कप होने तक उबालें। इसे दिन में दो बार हलका गरम ही सेवन करें। यह भोजन से पहले या बाद में लिया जाना चाहिए। इसका सेवन रोज न करें। इसे चाय के रूप में भी तैयार किया जा सकता है। सब्जियाँ बनाने, केक इत्यादि में भी अदरक का इस्तेमाल कर सकते हैं। वात प्रकृति के लोग अदरक को नमक के साथ ले सकते हैं; परंतु पित्त प्रकृति के लोगों में अधिक अदरक का इस्तेमाल शरीर में पित्त को उत्तेजित कर सकता है। अधिक लाभ के लिए अदरक के साथ जीरे का उपयोग भी किया जा सकता है। कफ प्रकृति के लोगों के लिए अदरक की चाय अच्छी होती है, इसे ठंडा करके उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। शहद अधिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार यदि अदरक का इस्तेमाल अधिक किया जाए तो वह पेट तथा ग्रास नली में जलन उत्पन्न कर सकता है। यदि यह उपचार राहत न दे तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। यह भी पढ़ें – बदहजमी : कारण और इलाज के 13 घरेलू उपाय
  • घी : पित्त वृद्धि या असंतुलन के लिए सर्वोत्तम उपचार है। गाय के दूध से बना घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, क्योंकि यह खून में कोलेस्टरोल नहीं बढ़ाता तथा वात को शांत करता है; परंतु यह कफ प्रकृति के लोगों के लिए अच्छा नहीं है। इसलिए कड़वी तथा तीखी औषधियों को मिलाने के बाद इसे इस्तेमाल में लाना चाहिए। घी को खाना पकाने के लिए तेल की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर के लिए नुकसानदायक है।

पाचन शक्ति बढ़ाने की आयुर्वेदिक नुस्खे 

  • आयुर्वेद में बहुत से मसाले और जड़ी-बूटियाँ हैं, जिन्हें पाचन क्रिया की असंतुलित अग्नि को सामान्य अवस्था में लाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है; लेकिन इन चीजों को पित्त प्रकार के अपच में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये पित्त को उत्तेजित करते हैं : चित्रक, 2. कालीमिर्च, 3. लौंग, 4. इलायची।
  • चित्रक की जड़ सत फार्मेसियों में उपलब्ध होती है। उसे भोजन के बाद दूध या मट्ठा में कम मात्रा में इस्तेमाल किया जाता है।
  • पाचन क्रिया की अग्नि को संतुलित करने के लिए कालीमिर्च के चूर्ण का सेवन किया जाता है। कड़वी चीजें, जैसे- करेला अग्नि को बढ़ाने तथा अमा को साफ करने में बेहतरीन उपाय है।
  • पाचन क्रिया को संतुलित तथा अमा को साफ करने के लिए अदरक, लौंग, कालीमिर्च तथा दालचीनी का प्रयोग किया जाता है।
  • हमारे देश में भोजन के बाद चुटकी भर सेंधा नमक के साथ सौंफ चबाने का रिवाज है। यह अग्नि को उत्तेजित करके पाचन क्रिया को संतुलित करती है।
  • खुशनुमा आहार : हमारे जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण चीज है प्रसन्नता यानि ख़ुशी हमारे लगभग सभी कार्य या मेहनत ख़ुशी पाने के लिए ही होती है ख़ुशी पाने के लिए ही मनुष्य धन, सत्ता, सम्मान आदि की कामना करता है । व्यक्ति को स्वस्थ तथा प्रसन्न बनाने के लिए आयुर्वेद में बहुत से उपाय दिए गए हैं।
  • जब हम भोजन करते हैं तो वह सूक्ष्म स्तर पर बहुत से परिवर्तनों से गुजरकर ऊतकों तथा अंततः हमारे शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचता है। भोजन का अंतिम परिणाम ‘ओजस’ हैं, जो भोजन का रस है। यह शरीर को बल तथा तेज देता है। शरीर तथा मन, दोनों के संतुलन के लिए यह आवश्यक है। असंतुलित एवं असंयमित भोजन के कारण मानसिक विकार, चिंता, अवसाद आदि उत्पन्न होते हैं।
  • आयुर्वेद के अनुसार मजबूत पाचन क्रिया के लिए हमेशा सात्त्विक आहार का सेवन करना चाहिए आहार तीन प्रकार के होते हैं- सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक। अगले आर्टिकल में हम सात्त्विक आहार के विषय में बतायेंगे |

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