कुष्ठ रोग का आयुर्वेदिक इलाज : कुष्ठरोग उपचार

कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) यह एक संक्रामक रोग है और इसका वाहक माइक्रोबैक्टीरियम लेप्रो नामक जीवाणु है। इस रोग के वाहक जीवाणु, त्वचा या सांस के द्वारा शरीर में प्रवेश होते हैं और इन जीवाणुओं द्वारा नसों एवं त्वचा को नुकसान पहुंचायी जाती है। कुछ समय के बाद त्वचा पर सूखापन लिए हुए लाल या सफेद चकते उभर आते हैं। कुष्ठ रोग के बढने के साथ-साथ उंगलियों में विकलांगता भी आने लगती हैं और दर्द रहित घावों के कारण हाथों तथा पैरों की उगलियां गल जाती हैं।

कोढ़ अनेक प्रकार के होते हैं और उनका इलाज भी रोग की प्रकृति पर निर्भर करता है। ट्यूबरक्यूलॉयड कुष्ठ रोग, जिसमें जीवाणु बहुत कम होते हैं और संक्रामकता नहीं के बराबर होती है, को सिर्फ छह महीने में आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के इलाज ‘मल्टी ड्रग थेरेपी’ से ठीक किया जा सकता है, जबकि लेप्रोमोटस कुष्ठ रोग, जिसमें जीवाणु अधिक होते हैं और संक्रामकता भी अधिक होती है, को कम-से-कम एक साल के ‘मल्टी ड्रग थेरेपी’ (एमडीटी) से ही ठीक किया जा सकता है। आप में से कई पाठको ने कुष्ठ रोग का आयुर्वेदिक इलाज पूछा था इसलिए इस आर्टिकल में हम केवल आयुर्वेदिक इलाज के नुस्खे बतायेंगे, हालाँकि सरकारी हॉस्पिटल में मुफ्त में इसका प्रभावी आधुनिक उपचार मौजूद है लेकिन फिर भी आपकी जानकारी के लिए यह पोस्ट लिख रहे है लेकिन याद रहे एक वक्त में केवल एक ही प्रणाली से उपचार करवाएं | Leprosy ayurvedic treatment tips

कुष्ठ (कोढ़) का आयुर्वेदिक इलाज

जानिए कुष्ठ रोग का आयुर्वेदिक इलाज : कुष्ठरोग उपचार Kusht Kodh rog ka ayurvedic ilaj

कोढ़ का आयुर्वेदिक उपचार

  • कुष्ठ के व्रणों पर नीम और चालमोगरा का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर रुई के साथ लगाने से बहुत लाभ होता है।
  • गर्मियों में नीम पर पकी हुई निबौली 10 ग्राम मात्रा में प्रतिदिन खाने से कुष्ठ में बहुत लाभ होता है। खून की खराबी ठीक होती है।
  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर प्रतिदिन स्नान करने, कुष्ठ के व्रणों को धोने से कुष्ठ का प्रकोप कम होता है।
  • करंज, नीम और खादिर के 100-100 ग्राम पत्तों को पानी में उबालकर नहाने से कोढ़ का निवारण होता है।
  • 20 ग्राम कूठ के साथ 20 ग्राम धनिए को पीसकर कुष्ठ पर लेप करने से कुष्ठ के व्रण ठीक होने लगते हैं।
  • बाकुची और तिल 3-3 ग्राम मिलाकर थोड़ा-सा पीसकर सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से कुष्ठ ठीक होता है, लेकिन इसका सेवन 7-8 महीने तक करना चाहिए। कुष्ठरोग उपचार उपचार में बकुची का तेल भी अच्छा असर दिखाता है |
  • निर्गुण्डी की जड़ को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। 3 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करें।
  • आक की जड़ की छाल को छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर रखें। 2 रत्ती चूर्ण में 2 रत्ती सोंठ का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करने से कुष्ठ ठीक होता है।
  • आंवला और नीम के कोमल पत्ते 3-3 ग्राम पीसकर शहद मिलाकर खाने से कुष्ठ के व्रणों से पूयस्राव बंद होता है।
  • अंकोल की जड़ की छाल को पीसकर कुष्ठ व्रण पर लेप करें।
  • अर्जुन की छाल को पानी में उबालकर हल्के गर्म पानी में मिलाकर नहाने से बहुत लाभ होता है।
  • नीम और चालमोंगरा का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर कांच की शीशी में बंद करके रखें। इस तेल को दिन में दो-तीन बार कुष्ठ व्रणों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
  • कनेर की जड़ की छाल को पानी के साथ घिसकर कोढ़ के दागों पर लगाने से दाग ठीक हो जाते हैं।
  • भांगरा और बाकुची को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। 5 ग्राम चूर्ण का 21 दिन तक पानी के साथ सेवन करने से कुष्ठ रोग का निवारण होता है।
  • बाकुची के बीज 25 ग्राम, सफेद मूसली 25 ग्राम और चित्रक 25 ग्राम सभी चीजों को पीसकर चूर्ण बनाकर रखें। 4 ग्राम चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से कोढ़ में बहुत लाभ होता है।
  • सत्यानाशी के 10 ग्राम रस का रोजाना सेवन करने से कुष्ठ रोग में बहुत लाभ होता है। छः सप्ताह तक जरुर इसका सेवन करें।
  • जायफल, जावित्री, लौंग और अंकोल की छाल, प्रत्येक औषधि 5-5 रत्ती लेकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से कोढ़ का बढ़ना रुक जाता है।
  • निर्गुण्डी के ताजे कोमल पत्तों को 10 ग्राम मात्रा में पीसकर 200 ग्राम पानी में मिलाकर पीने से कोढ़ में बहुत लाभ होता है।
  • अमलतास के पत्तों को सिरके के साथ पीसकर लेप करने से कोढ़ के व्रण ठीक होते हैं।
  • चम्पा की छाल का चूर्ण 3 ग्राम मात्रा में दिन में दो बार पानी के साथ सेवन करने से दूषित रक्त की शुद्धि होती है।
  • चालमोगरा का तेल 5 ग्राम मात्रा में लेकर वैसलीन में अच्छी तरह मिलाकर कुष्ठ के जख्मों पर लगाने से बहुत लाभ होता है।
  • 5 ग्राम गंधक को कड़वे तेल से शुद्ध करके, अमलतास की जड़ को 10 ग्राम रस के साथ पीसकर प्रतिदिन शरीर के कुष्ठ वाले अंगो पर लगाएं।
  • कनेर के पत्ते 200 ग्राम मात्रा में एक बाल्टी पानी में उबालकर नहाने से कोढ़ कम होता है।
  • नीम के कोमल पत्ते और गिलोय का रस बराबर मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से कोढ़ की बीमारी ठीक होने लगती है।
  • गन्धक रसायन गाय के दूध से शुद्ध किये गंधक को पीसकर उसमें दालचीनी, इलायची, नेजपात तथा नागकेशर समान मात्रा में मिलाएं तथा गिलोय, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, श्रृंगराज आदि के स्वरस में 8-8 बार भावना दें। इसके बाद इसे सुखाकर चूर्ण बनावें तथा इस चूर्ण के बराबर मात्रा में मिश्री का चूर्ण इसमें मिलाएं। सुबह शाम ठंडे पानी के साथ इसकी 1 ग्राम मात्रा लेने से धातुक्षय, प्रमेह, अग्निमांद्य, शूल, कोढ़ आदि रोगों में लाभ प्राप्त होता है। इस दवा के सेवन में नमकीन तथा खट्टे पदार्थ, सब्जी, दाल का परहेज रखें |
  • तुबरक तेल -इसका लैटिन नाम ‘हिडनोकार्पस वाइटियाना’ है। इस तेल की पांच बूंदें गाय के ताजे मक्खन या मलाई में मिलाकर दें। इससे सब प्रकार के रक्त विकार, कोढ़, महाकुष्ठ, दाद, खाज, खुजली, व्रण आदि रोगों में लाभ मिलता है। इसका सेवन करते समय दूध, मौसमी फल रस, मीठा नींबू, अनार, सेब, केला, मीठा, अंगूर खाएं । नमकीन तथा कड़वे पदार्थ न खायें।

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