गुर्दे (किडनी) से संबंधित समस्याएं और इन बिमारियों से बचाव की जानकारी

गुर्दे (किडनी ) हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक है, अगर आप हमेशा स्वस्थ रहना चाहते हैं। लंबी उम्र जीना चाहते हैं तो गुर्दे की समुचित देखभाल व हिफाजत करना सीखें, दरअसल किडनी हमारे शरीर में सफाई का काम करती हैं। यह गंदगी बाहर निकालने वाले सिस्टम का एक बहुत अहम हिस्सा हैं। दोनों किडनियों में खून साफ होता है। हमारी दोनों किडनियों में छोटे-छोटे लाखों फिल्टर होते हैं जिन्हें नेफरोंस कहते हैं। नेरोफेंस हमारे खून को साफ करने का काम करते हैं। गुर्दे फेल हो जाने के लक्षणों के बारे में हम आपको पहले ही जानकारी पहले दे चुके हैं और यह भी बता चुके हैं कि ऐसे रोगी जब डॉक्टरों के पास परामर्श के लिए आते हैं तो उनके गुर्दे प्रायः बहुत खराब हो चुके होते हैं। और इस दशा को ” Chronic renal failure” कहते हैं जिसमें “डायलिसिस” और किडनी  बदलना (“Renal transplantation”) बहुत जरुरी हो जाते है। हालांकि कुछ दवाइयों से गुर्दो के काम करने की क्षमता को थोड़े बहुत समय के लिए बनाये रखा जा सकता है | इसलिए ऐसी कोई ख़राब हालात बने ही ना इसके लिए हम यहाँ जानकारियां दे रहे है की आम तौर पर किडनी खराब होने या गुर्दे से जुडी बिमारियों के प्रमुख कारण क्या है और आप इनसे अपना बचाव कैसे कर सकते है |  “क्रोनिक रीनल फेल्योर” के वैसे तो बहुत से कारण होते हैं लेकिन कुछ मुख्य इस प्रकार हैं

गुर्दे ख़राब होने का कारण : डायबिटीज

गुर्दे (किडनी) से संबंधित समस्याएं और इन बिमारियों से बचाव की जानकारी Kidney gurde kharab hone ka karan bachav

गुर्दे (किडनी) से संबंधित बिमारियों से बचाव

  • इन्सूलिन नामक हॉरमोन की कमी या उसकी निष्क्रियता से होने वाले रोग मधुमेह के इलाज में यदि देर हो जाये अथवा लापरवाही के कारण उस पर चौबीसों घण्टे हर समय प्रभावी कन्ट्रोल न रखा जाय तो धीरे-धीरे गुर्दो के अन्दर स्थित बहुत बारीक रक्त नलिकायें कड़ी होने लगती है। इससे दशा को “डायबिटिक ग्लोमेरूलोस्क्लोरोसिस” (के. डब्ल्यू. सिन्ड्रोम) कहते हैं।
  • ठीक इलाज के अभाव में जैसे-जैसे इस बीमारी की जटिलता बढती जाती है, रोगी के शरीर पर सूजन आने लगती है, खासतौर से आंखों के नीचे सुबह के समय और फिर पूरे शरीर पर हर समय सूजन रहने लगती है | इस स्टेज पर पेट की अल्ट्रासाउण्ड जांच करने पर गुर्दे का साइज प्रायः बढ़ा हुआ मिलता है। इन रोगियों में प्रायः आंखों के अन्दरूनी पर्दे रेटिना की खराबी भी मिलती है।
  • डायबिटीज पर कन्ट्रोलःशुगर कम करने के उपाय -Diabetes Control Tips

गुर्दे ख़राब होने का कारण : उच्च रक्तचाप

  • हाई ब्लड प्रेशर पर कन्ट्रोल न रखा जाये तो धीरे-धीरे गुर्दे खराब होते रहते हैं और बहुत समय तक रोगी को उसका पता भी नहीं चल पाता। बहुत से रोगियों को हाई ब्लड प्रेशर” होने की जानकारी होने बाद भी इसे गम्भीरता से नहीं लेते है वे या तो दवा नहीं ले रहे होते हैं थे या दवा अनियामित रूप से ले रहे थे। कुछ रोगी कहते हैं कि ब्लड प्रेशर की बीमारी तो उनको लगभग 8 या 10 साल से है। लेकिन जब जब उनको सिर दर्द होता था तो वे समझ लेते थे कि अब ब्लड प्रेशर बढ़ गया है तभी केवल दवा लेते थे ऐसा अनुमान करना और सिर दर्द पर निर्भर रहना एकदम गलत है। अच्छा तो यही रहेगा कि डॉक्टर की राय के अनुसार नियमित रूप से ब्लड प्रेशर नपवा कर उस पर हमेशा कन्ट्रोल रखा जाय तो जरुर आप गुर्दे की बीमारी और ह्रदय की कई बिमारियों से बच सकते है। हाई ब्लड प्रेशर का बिना दवा के भी सफल इलाज मौजूद है जिसमे आपको केवल बताई गई फल सब्जियां कुछ आयुर्वेदिक औषधि तथा योगासन करना है | इस विषय पर हमने कई आर्टिकल लिखे हैं |
  • उच्च रक्चाप पर कन्ट्रोलः अपना रक्तचाप समय-समय पर नपाते रहें, भरपूर नींद सोये, मानसिक तनाव से बचें, नमक कम लें, हृदय और आंख के रेटिना पर्दे की जांच करायें ।
  • ब्लडप्रेशर का कोई कारण मिले तो उसका भी उपचार आवश्यक है। हाई ब्लड प्रेशर कम करने के उपाय- हाई बीपी के कारण लक्षण

गुर्दे ख़राब होने का कारण : गुर्दो की सूजन

  • गुर्दो पर विपरीत प्रभाव डालने वाले एक खास प्रकार के जीवाणु, स्ट्रेप्टोकोकस, से जब गला खराब हो जाये अथवा त्वचा का संक्रमण हो जाये तो ये जीवाणु एक विषैला पदार्थ छोड़ते हैं जो रक्त द्वारा गुर्दो में पहुंच कर उनमें सूजन पैदा कर देते हैं जिसके कारण उनका आकार बढ़ जाता है। इस रोग को “एक्यूट ग्लोमेरूलोनेफराइटिस” कहते हैं, जो बच्चों में मुख्य रूप से देखने को मिलती है यह बड़ी उम्र के लोगो में बहुत कम होती है। इस रोग में रोगी के पूरे शरीर पर, मुख्य रूप से आखों के नीचे, बहुत सूजन आ जाती है और पूरा शरीर फूला सा नजर आता है। मूत्र में एब्यूमिन तथा रक्त भी आने लगता है और यूरिन की मात्रा कम हो जाती है। रोगी सांस फूलने और सिर दर्द की शिकायत करते हैं और उनका ब्लड प्रेशर बढ़ा मिलता है। अच्छी बात यह है लगभग 90 प्रतिशत रोगी पूरी तरह स्वस्थ्य हो जाते हैं, लेकिन सही इलाज और समय से उपचार के अभाव में रोग धीरे-धीरे “क्रोनिक स्टेज” में पहुंच जाता है। यदि “गला खराब” या त्वचा के संक्रमण का जल्दी ही उपचार कर लिया जाता तो यह स्टेज उत्पन्न ही नहीं होगी ।

गुर्दो में संक्रमणः

  • पाइलोनेफराइटिस (जिसके मुख्य लक्षण बुखार, कमर दर्द, कंपकंपी आना और उलटी होना) यदि जल्दी इलाज के अभाव में लम्बे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो धीरे-धीरे गुर्दे फेल होने लगते हैं। रोगी का ब्लड प्रेशर अधिक रहने लगता है और गुर्दो का आकार सिकुड़ कर बहुत छोटा हो जाता है।

गुर्दे ख़राब होने का कारण : किडनी स्टोन यानि पथरी

  • “स्टोन” गुर्दे में हो सकता है, मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में या मूत्र की थैली में । इसके मुख्य लक्षण पेट दर्द, पेशाब में जलन, पेशाब बार-बार होना, पेशाब में रक्त आना होते हैं। अधिकतर पथरियां दवाओं से घुल जाती हैं या निकल जाती हैं। लेकिन जब पथरियां बहुत बड़ी होती हैं, दोनों गुर्दो में हों, दोनों यूरेटर में फंसी रहकर पेशाब का प्रवाह रोक दें या बार-बार बन रही हों, और यदि ठीक उपचार न लिया जाये तो गुर्दो की कार्य क्षमता को धीरे-धीरे प्रभावित करके “क्रोनिक रीनल फेल्योर” की स्थिति उत्पन्न कर सकती हैं।
  • कुछ रोगियों में पथरी गुर्दो से निकल कर निचले हिस्से में आ जाती है। यानी यह यूरेटर में आकर फंस जाती है। इसके कारण मूत्र बाहर नहीं निकल पाता है। मूत्र यूरेटर में ही रुक कर किडनी की ओर वापस बढ़ने लगता है। इस तरह से वह धीरे-धीरे किडनी में ही जमा होने लगता है। अगर इसका सही समय पर उपचार न हो सका, तो यह रेफ्लेक्स किडनी फेलियर में तब्दील हो जाता है। इसके कारण खून के अंदर मवाद एकत्रित होने लगता है।
  • किडनी स्टोन मूत्र के रास्ते रुकावट और संक्रमण का कारण बनता है। इस इंफेक्शन की वजह से किडनी में खराबी आ जाती है। पथरी में क्या नहीं खाना चाहिए : परहेज

प्रोस्टेट ग्लैण्ड का बढ़ जानाः

  • लगभग 60 या 70 वर्ष के पुरुषों में मूत्राशय के निकास द्वार पर स्थित प्रोस्टेट ग्रंथि जब आकार में बढ़ जाती है तो मूत्र के सामान्य प्रवाह में रुकावट डालने लगती है जिससे रोगी को पेशाब बूंद-बूंद होना, मूत्र की धार दूर तक न जाना, रात को बार-बार मूत्र को उठना जैसे प्रारम्भिक लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस दशा को बहुत से रोगी अनदेखा करके टालते रहते हैं। और फिर एक दिन अचानक पूरी तरह से पेशाब रुक जाने के कारण डॉक्टरों के पास आते हैं तो कैथेटर (नली) द्वारा पेशाब उतारने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। कई रोगी तो बार-बार कैथेटर डलवा कर मूत्र करते रहते हैं जिससे मूत्रतंत्र में संक्रमण का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
  • प्रोस्टेट-ग्रंथि के बढ़े आकार का यदि दवाओं से इलाज ना हों तो ऑपरेशन ही ठीक रहता है । अन्यथा प्रोस्टेट ग्रन्थि के बड़े आकार से मूत्र प्रवाह में रुकावट से गुर्दे पर यूरिन का दबाव बढ़ने से और संक्रमण दर बढ़ जाने से गुर्दो के फेल्योर का खतरा हमेशा बना रहता है। यही नहीं, यदि गुर्दो की कार्य-क्षमता किसी अन्य कारण से कम हो रही है तो प्रोस्टेट का बढ़ा आकार उसे और भी कम कर देगा इसलिए इसका जल्दी उपचार बहुत आवश्यक होता है जिससे गुर्दो की कार्यक्षमता बहुत सुधर जाने की संभावना काफी बढ़ जाती है। प्रोस्टेट ग्रंथि कैंसर की पहचान, कारण तथा आधुनिक उपचार

गुर्दे ख़राब होने के अन्य कारणः

  • छोटी उम्र पर “गुर्दा फेल्योर” के कुछ अन्य कारण गुर्दो तथा ब्लैडर के जन्मजात रोग एवं लगभग 35-40 की उम्र पर गुर्दो में बहुत सी सिस्ट बन जाना होता है।
  • पेनकिलर दवाइयों का अपनी मर्जी से सेवन न करें, लंबे समय तक दर्दनाशक दवाएं लेने से किडनी खराब हो सकती है, डॉक्टर से पूछ कर ही पेनकिलर खाएं |
  • नशा न करें- धूम्रपान से रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचती है और रक्त ठीक से फिल्टर नहीं हो पाता है, रक्तसंचार भी बाधित होता है, जिससे किडनी तक उचित मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता, जिसकी वजह से उसकी काम करने की क्षमता पर असर होता है|
  • पौष्टिक आहार खाएं. हरे रंग की सब्ज़ियां खाएं, इनमें मैग्नीशियम अधिक होता है | हेल्दी आहार लेने से किडनी को भी पोषण मिलता है और उसकी कार्य क्षमता बढ़ जाती है |
  • शराब पीना भी गुर्दे की बीमारी का बहुत बड़ा कारण है |
  • किसी दुर्घटना में गुर्दों पर तेज़ झटका या चोट लगना |
  • पीलिया जैसे रोग में भी गुर्दे खराब हो सकते है |

किडनी पर नज़र

  • साल में एक बार किडनी का चेकअप ज़रूर कराएं | 30 साल के व्यक्ति, डायबिटीज़, मोटापा व हाई ब्लडप्रेशर से ग्रसित लोगों को किडनी का ज़्यादा ख्याल रखने की ज़रूरत है, इन मरीज़ों को हर 6 महीने में ब्लड व यूरिन टेस्ट कराते रहना चाहिए | 35 साल की उम्र के बाद साल में एक बार ब्लडप्रेशर व शुगर लेवल की जांच ज़रूर करवाएं | यह भी पढ़ें – जानिए क्यों जरुरी है फुल बॉडी चेकअप तथा Full Body Checkup List
  • डायलिसिस तभी कराया जा सकता है, जब किडनी 95 फ़ीसदी तक डैमेज हो चुकी हो | किडनी ट्रांसप्लांट की ज़रूरत तब पड़ती है जब दोनों किडनियां ख़राब हो चुकी हों | भारत में हर साल लगभग डेढ़ से दो लाख लोग किड्नी फेल्योर का शिकार होते हैं |
  • हर साल लगभग 20 लाख से ज़्यादा लोग दुनिया भर में डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट करवाते हैं, लगभग 70 फ़ीसदी लोग ट्रांसप्लांट नहीं करवा पाते, क्योंकि इसका इलाज बहुत महंगा होता है |
  • किडनी की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है। ऐसे व्‍यक्ति को थकान होने के साथ ही छोटी और रूक-रूक कर सांस आती हैं। किडनी रोग को समय से पहचानना बहुत जरूरी है, रोग को पहचानने में देरी होने पर यह किडनी फेल्‍योर का कारण भी बन सकता है। अन्‍य किसी भी प्रकार की समस्‍या से बचे रहने के लिए डॉक्‍टर से परामर्श करें।

गुर्दे का इलाज क्रोनिक रीनल फेल्योर का उपचारः

  • इसके लिए रोगी से लक्षणों की विस्तृत जानकारी करके उसकी अच्छी तरह शारीरिक परीक्षा की जाती है। इसके लिए पेशाब की मात्रा नापना, मूत्र की शुगर, एल्ब्यूमिन, रक्त के लिए जांच माइक्रोस्कोप-परीक्षण, यूरिन कल्चर, ब्लड में टी. एल. सी.डी. एल.सी., ब्लड यूरिया क्रियेटिनीन, ब्लड शुगर, कॉलेस्ट्रोल, सोडियम, ट्राइग्लसराइड, यूरिक अम्ल, कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, अल्ट्रासाउंड, पेट का प्लेन एक्स-रे, चैस्ट एक्स-रे, कार्डियोग्राम, एण्डोस्कोपी इत्यादि जांच लाभदायक मानी जाती है। इन सभी का निर्धारण हो जाने के बाद उपचार के लिए यह विधि अपनायी जाती है।
  • डायलिसिसः जब रोगी को उपर्युक्त से लाभ न हो रहा हो, रक्त में अम्लता बहुत अधिक बढ़ी हो, रक्त में पोटैशियम सात से ज्यादा हो, यूरिया 250 से ज्यादा हो, रोगी की दशा बिगड़ रही हो, रोगी की किडनी ट्रांसप्लान्टेशन की तैयारी हो रही हो तो डायलिसिस से बहुत लाभ मिलता है। किडनी ट्राँसप्लान्टेशन से रोगी बिलकुल सामान्य व्यक्ति की तरह स्वस्थ हो जाता है।

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