पीलिया कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

पीलिया गंभीर संक्रामक रोग है, जिसमें प्रमुख रूप से लीवर प्रभावित होता है। जो प्राय: गर्मियों और मानसून के सीजन में अधिक होता है। यह त्वचा, झिल्ली, जीभ, आँखों और मूत्र में पित्त से पीले पड़ने से होती है। पीलिया खून में बिलिरूबिन (Bilirubin) की मात्रा सामान्य से अधिक बढ़ जाने के कारण होता है। साधारणतया लीवर बिलीरूबिन को शोषित कर शरीर से निकाल देता हैं लेकिन अगर लीवर संक्रमित हो जाता है तो पित्त का बहना रूक जाता है और बिलीरूबिन अधिक मात्रा में बनने लगता है और यह धीरे-धीरे खून में जमा होने लगता है। इसी स्थिति को पीलिया कहते हैं।

पीलिया नवजात शिशुओं में अधिक पाया जाता है और कभी-कभी यह जन्म के दूसरे दिन ही शुरू हो जाता है | बच्चो को होने वाले पीलिया के बारे में हम अगले पोस्ट में जानकारी देंगे। अब आपको अच्छी तरह समझ में आ गया होगो की पीलिया कोई साधारण बीमारी नहीं है। इसलिए पीलिया से बचाव के बारे में सभी को जानना बहुत आवश्यक है। कई विशेषज्ञ तो संक्रामक पीलिया को एड्स से भी अधिक खतरनाक मानते हैं।

पीलिया तीन प्रकार का होता है : (Types of Jaundice)

  • हिमोलिटिक पीलिया (Hemolytic jaundice)-यह, लाल रक्त कोशिकाओं के अधिक मात्रा में नष्ट होने से होता है। इससे बिलीरूबिन अधिक बनने लगता है और एनीमिया भी हो जाता है।
  • अवरुद्ध पीलिया (obstructive Jaundice) जहाँ बिलीरूबिन यकृत कोशिकाओं में बनता है तथा पित्त रस के अग्नाशय में पहुँचने के रास्ते में रूकावट के कारण होता है। यह ज्यादातर बड़ी उम्रदराज वृद्ध लोगों को ज्यादा होता है और इस प्रकार के पीलिया में त्वचा पर जोरदार खुजली होती है।
  • हिपेटोसैल्यूलर पीलिया (Hepatocellular Jaundice) यह यकृत कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त होने के कारण होता है। इसके कारण वायरस संक्रमण, विषाक्त दवाएँ या अन्य बीमारियाँ, जैसे-टॉयफाइड, मलेरिया, पीत ज्वर, क्षय रोग आदि हो सकते हैं।

पीलिया के निम्नलिखित लक्षण हैं: (Jaundice Symptoms)

Jaundice Piliya ke lakshan karan upay पीलिया कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

पीलिया (Jaundice)

  • अत्यधिक कमज़ोरी, सिरदर्द, भूख की कमी, सिर के दाहिने भाग में दर्द रहना, लंबे समय तक कब्ज़ रहना, मचली होना | आँखें, जीभ, नाख़ून और त्वचा का पीला पड़ जाना |
  • कई दिनों तक बुखार बना रहना तथा पेशाब गहरे पीले रंग का होना।
  • पीलिया में थकान और कमजोरी रहती है। हाथ-पैर में दर्द होता है। भूख नहीं लगती एवं उलटी की इच्छा अथवा उलटियाँ होती हैं, घी-तेल की तली चीजों के प्रति अरुचि, चिड़चिड़ा स्वभाव, नींद ठीक से न आना, और पेट दर्द |
  • पीलिया में आँखों के सफेद भाग में पीलापन उतर आता है।
  • रोग की बढ़ी हुई अवस्था में रोगी की हथेलियाँ भी पीली दिखती हैं।
  • अवरुद्ध पीलिया के कारण अत्यधिक खुजली होना। अगर उल्टी में खून आता है, पेट में सूजन, लीवर में सूजन, साँस उखड़ना अथवा टाँगों में पानी जमाव आदि के लक्षण दिखाई देने लगे तो तुरन्त अपने चिकित्सक की परामर्श लें।
  • किसी भी तरह के संक्रामक पीलिया में ऑंखें और त्वचा पीली होना चेतावनी देने वाला प्रमुख लक्षण है। यह दिखाता है कि सीरम में बिलिरूबिन की मात्रा सामान्य से बहुत अधिक हो गई है।
  • पित्ताशय से नलियों द्वारा यह आँतों में आता है। इसके कारण ही मल का रंग पीलापन लिये होता है।
  • एक स्वस्थ व्यक्ति में बिलिरूबिन की मात्रा 1000 सी.सी. रक्त में 3 मि.ग्रा. से 1 मि.ग्रा. तक होती है। जब बिलिरूबिन का रक्त द्रव में स्तर 3.0 मि.ग्रा. के आस-पास या इससे ऊपर हो जाता है तो आँखों के सफेद भाग में पीलापन और त्वचा का रंग पीला हो जाता है, क्योंकि इसके बाद लिवर की गंदगी साफ करने की प्रक्रिया रुक जाती है ।

पीलिया निम्नलिखित कारणों से हो सकता है: (Jaundice Causes)

  • इसका एक और मुख्य कारण होता है, हैपेटाइटिस-ए प्रकार का वाइरस जो गंदे पानी, भोजन, मल इत्यादि में होता है। भारत में पीने का गंदा पानी पीलिया होने का सबसे बड़ा कारण है |
  • पीलिया की बीमारी का स्रोत स्वयं मनुष्य होता है। कई लोगो में रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते और ऐसे लोग पीलिया रोग फैलाते रहते हैं। इसलिए स्रोत पर नियंत्रण रखना मुश्किल काम होता है।
  • पीलिया यकृत पित्त की थैली का विकार है। इसलिए निम्न कारणों से भी पीलिया हो सकता है:-
  • कुछ दवाइयों के कारण, खून की खराबी, पित्ताशय की थैली में पथरी होने पर |
  • संक्रमण के कारण लीवर में सूजन, इस स्थिति को हिपैटाइटिस (Hepatitis) कहते हैं। इसके कारण प्रायः गंदा वातावरण, घनी आबादी, अस्वास्थकर हालात तथा पानी और भोजन का दूषित होना होता है।
  • Jaundice के विषाणु हाथों, खुले में रखे भोजन या पानी द्वारा अन्य व्यक्ति में पहुँच जाते हैं। पीलिया रोगी के साथ यौन संपर्क बनाने से भी यह बीमारी स्वस्थ व्यक्ति को भी हो सकती है।
  • अधिक मात्रा में अल्कोहल लेने से भी लीवर में सूजन आ जाती है, जिससे पीलिया हो सकता है। इसके अलावा गर्भावस्था, लिवर के सीरोसिस तथा लीवर कैंसर में भी पीलिया हो सकता है।
  • बहुत सी दवाएँ जैसे-टी.बी रोग में दी जानेवाली दवा रिफामसिन, आई.एन.एच. तथा दर्द में ली जाने वाली फेनाइलब्यूटाजोन और इंडोमेथासिन भी यह रोग पैदा कर सकती हैं। देखें ये पोस्ट – जाने दवाइयों के सेवन से जुडी सावधानियां और Medicine Side Effects.
  • मनोरोगों में दी जाने वाली क्लोरप्रोमाजीन तथा एमिट्रिप्टालीन जैसी दवाइयाँ भी रक्त में बिलिरूबिन की मात्रा बढ़ा सकती हैं।
  • पीलिया की जाँच प्रयोगशाला में ही संभव है। इसके लिए रक्तद्रव में बिलिरूबिन की मात्रा की जाँच करवाते हैं। इसके अलावा पेशाब में बाइल पिगमेंट्स और बाइल साल्ट्स की जाँच भी की जाती है।
  • कुछ अन्य कारण हैं विभिन्न बीमारियाँ जैसे पैरीनीशियस एनीमिया, टॉयफाइड, मलेरिया, बुखार रक्तस्राव से अधिक खून निकलना आदि
  • संक्रमित व्यक्ति को लगाए इंजेक्शन की सुई से स्वस्थ व्यक्ति को इंजेक्शन लगाना |
  • यदि लाल रक्त कोशिकाए अधिक मात्रा में नष्ट या क्षतिग्रस्त होकर लीवर में जा रही हो |

पीलिया के उपचार के दौरान रखें इन बातो का ख्याल  

  • Jaundice के इलाज के दौरान रोगी को पूरी तरह से आराम करना चाहिए। इसके लिए रोगी को बिस्तर पर लेटना चाहिए, केवल मल-मूत्र करने के लिए ही उठना चाहिए। यह भी पढ़ें – हेपेटाइटिस बी के कारण, लक्षण और बचाव
  • किसी तरह की मेहनत का कार्य न करें। रोगी हलका खाना ले सकता है। फलों का रस ग्लूकोज मिलाकर लेना चाहिए।
  • बीमारी के दौरान शराब नहीं पीना चाहिए। इसके अलावा महिला रोगियों को गर्भ निरोधक गोलियों का भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पीलिया की बीमारी में शराब पीना जहर पीने के समान है |
  • इस रोग में आराम सबसे बड़ी दवा है।
  • भोजन के पहले और शौच के बाद हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोना चाहिए। नाखून काटकर रखें। पीलिया का वायरस प्रत्‍यक्ष रूप से अंगुलियों से और अप्रत्‍यक्ष रूप से रोगी के मल से या मक्खियों द्वारा अन्य लोगो तक पहुंच जाता हैं।
  • यदि आप ऐसे स्थान पर रह रहे हों, जहाँ यह रोग फैला है तो पानी उबालकर अथवा क्लोरीन की गोलियाँ डालकर पिएँ।
  • दूध भी उबालें तथा भोजन तैयार करने में साफ-सफाई का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • घर के गंदे पानी के निकलने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा सेप्टिक टैंक वाले शौचालय संक्रमण कम करने के लिए ठीक रहते हैं।
  • मक्खियों को खाने पीने की चीजो पर ना बैठने दें | भोजन साफ बर्तन में जाली या ढक्कन से ढककर रखें।
  • रोगी के कपड़े, व्यक्तिगत चीजें, बर्तन उबले पानी से अच्छी तरह से साफ करें।
  • किसी भी प्रकार का इंजेक्शन लगवाते समय डिस्पोजेबल सिरिंज व निडिल का ही प्रयोग करें।
  • संतरा, नींबू ,नाशपती, अंगूर , गाजर ,चुकंदर ,गन्ने का रस पीना फायदेमंद होता,गन्ने का रस भी लिया जाना चाहिए। इस बीमारी में खाने पीने से जुडी जानकारी के लिए पढ़ें ये दो पोस्ट –
  • पीलिये में क्या खाएं और क्या नहीं खाना चाहिए, परहेज
  • पीलिये के रोगी का डाइट चार्ट

पीलिया के दौरान किन चीजो से बचें :

  • सिर्फ झाड़-फूक पर निर्भर न रहें। Jaundice जानलेवा साबित हो सकता है। टोने-टोटके, गंडा, ताबीज या ऐसे ही अन्य हथकंडे ना अपनाए इसमें समय बर्बाद होगा तथा पीलिया का संक्रमण बढ़ता जायेगा और अंत में रोगी की मृत्यु हो जाएगी |
  • बाजार में ठेलों पर मिलने वाली खाने की खुली चीजें न खाएं। सब्जियां और फल बिना साफ़ पानी से धोए सेवन न करें। खुले में रखे गंदे, सडे, गले व कटे हुये फल नहीं खायें |
  • कब्ज की शिकायत पैदा न होने दें। रोगी के कपड़े, निजी वस्तुएं, बर्तन आदि इस्तेमाल न करें।

नवजात शिशुओं और बच्चो में पीलिया

आजकल नवजात शिशु में जॉन्डिस सामान्य माना जाता है। थोड़े बहुत पीलिया में तो स्थिति नियंत्रित रहती है, लेकिन जब यह ज्यादा हो तो बच्चे को फ़ोटोथेरेपी या लाइट थेरेपी दी जाती है। इसमें बच्चे की आंखों पर सॉफ्ट मास्क लगाकर उसके शरीर को तेज़ लाइट में रखा जाता है। इससे जॉन्डिस का केमिकल कम होता है। कुछ बच्चों को लिवर इन्फेक्शन के कारण भी पीलिया होता है, जिसमें अलग ट्रीटमेंट दिया जाता है। लाइट थेरेपी देने से पहले बच्चे का ब्लड टेस्ट किया जाता है। कुछ बच्चों में जन्म के दो हफ्ते तक पीलिया के लक्षण दिखते हैं। प्रीमेच्योर बेबी में यह तीन हफ्ते तक भी दिख सकते हैं। हॉस्पिटल से घर लौटने और दो हफ्ते के बाद भी पीलिया के लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है।

बच्चो में पीलिया की पहचान तथा निदान के उपाय

  • पीलिया की पहचान त्वचा, आँखों तथा पेशाब के पीलेपन से की जाती है ।
  • पेशाब का गाढ़ा पीले रंग का होना इस रोग का पहला लक्षण होता है।
  • नवजात शिशु में पीलिया की पहचान के लिए प्रतिदिन उसे धूप में लिटाकर ध्यान से देखना चाहिए। जरा भी संदेह होने पर डॉक्टरी सलाह लें क्योंकि थोड़ा समय बीत जाने पर समस्या गंभीर हो जाती है । प्रायः देखा गया है कि जन्म के एक सप्ताह के भीतर लगभग साठ प्रतिशत बच्चों में पीलिया का हलका सा प्रभाव होता है। पीलिया के उपचार में इस बात का काफी महत्त्व होता है कि पीलिया कब देखा गया : जन्म के बाद पहले 24 घंटों में, माँ के द्वारा प्रसारित रोग, माँ द्वारा खाई गई कुछ। दवाओं के प्रभाव से, माँ की संक्रामक बीमारियों से, आर.एच. ब्लड ग्रुप की समस्या द्वारा, दूसरे-तीसरे दिन का पीलिया | सामान्य पीलिया, तीसरे-चौथे दिन के बाद का पीलिया-संक्रामक रोगों अथवा सेप्टीसीमिया तथा एक सप्ताह बाद देखा गया पीलिया-जिगर के रोगों अथवा अन्य रोगों से।
  • जैसा ऊपर बताया गया है कि साठ प्रतिशत बच्चों में जन्म के दूसरे-तीसरे दिन हलका सा पीलिया देखा जाता है, यह चौथे दिन तक बढ़ता है और सातवें दिन कम हो जाता है। जन्म के बाद शिशु का जिगर काम करने में सक्षम नहीं होता, इसलिए पीलिया का थोड़ा प्रभाव आ जाता है। जैसे ही जिगर की कार्य क्षमता बढ़ती है, पीलिया अपने आप ठीक हो जाता है। इस समय उपचार की विशेष आवश्यकता नहीं होती, केवल बच्चे को निगरानी में रखना चाहिए। उसे माँ के दूध के अलावा उबले पानी में चीनी मिलाकर पिलाएँ। प्रायः एक सप्ताह में पीलिया चला जाता है।
  • यदि ऐसा न हो तो डॉक्टर की सलाह लें । शिशु को सुबह व शाम हलकी धूप में लगभग पाँच मिनट केवल लँगोट पहनाकर धूप दिखाएँ, लेकिन आँखों को ढककर रखें।

अगले पोस्ट में हम पीलिया के उपचार के लिए कुछ घरेलू आयुर्वेदिक उपाय बताएँगे |

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