हेपेटाइटिस बी के कारण, लक्षण और बचाव

हेपेटाइटिस बी (यकृत शोथ ) एक गंभीर बीमारी है जो विषाणु के संक्रमण से होती है। विषाणु से फैलने वाली बीमारी होने के कारण इस रोग का कोई विशेष इलाज नहीं है और रोग कई गंभीर साइड इफ़ेक्ट और अन्य बीमारियाँ भी पैदा करता है, हेपेटाइटिस बी का विषाणु लिवर को संक्रमित करता है इसलिए हेपेटाइटिस बी से बचे रहना अधिक अच्छा है। इस रोग के टीके उपलब्ध हैं। यह रोग उच्च जीवन स्तरवाले व्यक्तियों में कम और निचले तबके के लोगों में अधिक होता है। इसलिए यह ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोप में कम तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया, भारत, चीन इत्यादि देशों में ज्यादा पाया जाता है। इस बीमारी से पीड़ित एक चौथाई रोगी की पुराने यकृतशोथ (क्रॉनिक हेपेटाइटिस) सीरोसिस और पेट के कैंसर से मृत्यु हो जाती हैं। कुछ देशों, जैसे-अफ्रीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया में हेपेटाइटिस बी से होने वाले पेट के कैंसर लोगों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण है।

इस पोस्ट में निम्न लिखित जानकारी दी गई है :

  1. हेपेटाइटिस बी रोग के लक्षण
  2. हेपेटाइटिस बी कैसे फैलता है ?
  3. हेपेटाइटिस बी को फैलाने वाले अन्य कारण
  4. हेपेटाइटिस बी के उपचार
  5. किन व्यक्तियों को हेपेटाइटिस बी के टीके लगवाने चाहिए?
  6. हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए उपाय
  7. हेपेटाइटिस बी ठीक होता है की नहीं ?
  8. हेपेटाइटिस बी की जाँच

हेपेटाइटिस बी रोग के लक्षण

  • हेपेटाइटिस बी हो जाने पर रोगी को भूख बिलकुल नहीं लगती है | कई-कई दिन बिना खाये-पिए ही निकल जाते हैं।
  • हेपेटाइटिस बी में कभी-कभी दाहिनी तरफ पेट के पास दर्द होता है। थोड़ा बुखार भी हो सकता है।
  • कुछ दिनों बाद आँखें पीली पड़ जाती हैं।
  • खाना देखने या उसकी महक से ही उलटी हो सकती है ।
  • पेशाब गहरा भूरा या पीले रंग का हो जाता है और मल सफेद सा हो जाता है। इसके बाद पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगते है |
  • थकान, जोड़ो या स्नायु में दर्द, पीली आँखें और त्वचा, फूला हुआ पेट, और खुजली |

हेपेटाइटिस बी कैसे फैलता है ?

इंसान ही इस रोग के विषाणुओं का स्रोत होता है। बहुत से व्यक्तियों में हेपेटाइटिस बी के कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन वे विषाणुओं के वाहक बने रहते हैं। ऐसे व्यक्ति भी रोग फैलाने में सक्षम होते हैं। वैसे यह रोग पानी या भोजन से नहीं फैलता, बल्कि इसके लिए विषाणुओं का खून से संपर्क होना जरूरी होता है। दूषित रक्त और उससे बने रक्त उत्पाद बीमारी फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इस रोग का वाइरस वातावरण में कई दिनों तक जिंदा रह सकता है, लेकिन उबालने से यह विषाणु नष्ट हो जाते हैं।

रोग 20 से लेकर 40 वर्ष तक के व्यक्तियों को अपना शिकार अधिक बनाता है। माँ के पेट में पल रहे शिशु और छोटे बच्चों में भी यह रोग होता है। यौन संपर्क से भी रोग हो सकता है।

कुछ अधिक खतरे वाले समूह भी होते हैं, जिनमें इस रोग के मामले ज्यादा मिलते हैं। जैसे-शल्य-चिकित्सकों (सर्जरी करने वाले डॉक्टर) में हेपेटाइटिस बी के मामले बहुत होते हैं। इनको इस रोग का खतरा सामान्य लोगों की अपेक्षा 50 गुना अधिक होता है।

इसी तरह बार-बार रक्त चढ़वाने वाले रोगी, प्रयोगशालाओं के कर्मचारी, नर्स, समलिंगी आदतों वाले लोग, इंजेक्शनों द्वारा नशीली दवाइयाँ लेने वाले व्यक्ति भी अधिक खतरे वाले समूहों में आते हैं।

हेपेटाइटिस बी को फैलाने वाले अन्य कारण :

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हेपेटाइटिस बी

  • रक्तवाहिकाओं द्वारा- वास्तव में यह बीमारी खून से फैलने वाली (ब्लड-बोर्न) ही होती है। यदि इस रोग का विषाणु वाले खून अन्य मरीज को दे दिया जाए तो उसे भी रोग हो सकता है। इसके अलावा डायलेसिस, दूषित सीरिंज, सुइयाँ अथवा दुर्घटनावश सुई चुभने या कटने (शल्य-चिकित्सकों के साथ ऐसी घटनाएँ हो सकती हैं) से भी संक्रमण हो सकता है।
  • टैटू गोदने वाली मशीन, कान छेड़ने वाली मशीन, नाई के उस्तरे या दूषित ब्लेड से भी संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में जा सकता है।
  • रोगी व्यक्ति के टूथब्रश से भी हेपेटाइटिस बी संक्रमण की आंशका हो सकती है।
  • गर्भावस्था के दौरान यह रोग माँ से शिशु में भी जा सकता है।
  • यौन संपर्क द्वारा-वेश्याओं और समलिंगी यौन आदतों वाले व्यक्ति इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें यौनांगों पर बने घावों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में विषाणु पहुँच जाते हैं। इस तरह जिनके कई यौन सहभागी होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को रोग का अधिक खतरा होता है। यह भी पढ़ें – एचआईवी एड्स के लक्षण और 4 मुख्य स्टेज
  • अन्य माध्यम– खून चूसनेवाले जंतुओं (जैसे-मच्छरों, खटमलों) से भी रोग फैलने की संभावना व्यक्त की गई, लेकिन इसके प्रमाण नहीं मिले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इस रोग का संक्रमण फैलाने के लिए 0004 मि.ली. रक्त की मात्रा ही पर्याप्त होती है, जबकि एड्स विषाणु का संक्रमण फैलाने के लिए 0.1 मि.ली. रक्त आवश्यक होता है।
  • हेपेटाइटिस बी विषाणु एड्स के विषाणु से सौ गुना अधिक संक्रामक होता है।

हेपेटाइटिस बी के उपचार

  • हेपेटाइटिस बी का टीका (एच.वी.व्ही. वेक्सीन)- इस तरह के हेपेटाइटिस के इलाज के लिए दो तरह के टीके उपलब्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन दोनों प्रकार के टीकों को संतोषजनक और सुरक्षित पाया है। इनमें एक, व्यक्ति के रक्त के प्लाज्मा से तैयार किया जाता है, जबकि दूसरा, पैतृक अभियांत्रिकी की सहायता से यीस्ट कोशिकाओं के डी.एन.ए. से बनाया जाता है। इस टीके का फायदा यह है कि इससे मानव प्लाज्मा में पाए जानेवाले अन्य तरह के विषाणुओं से संक्रमण का खतरा नहीं होता। इसके अलावा यह कुछ सस्ता भी है। भारत जैसे देश के लिए जहाँ की जलवायु गरम होने के कारण वेक्सीन खराब होने का खतरा होता है, यह टीका ज्यादा उपयोगी है।
  • रक्त द्रव (प्लाज्मा) से बना टीका- इस टीके को हेपेटाइटिस बी विषाणु के वाहक व्यक्ति के रक्त द्रव से बनाते हैं। इस टीके को मांसपेशियों में लगवाया जाता है। टीके की 1-1 मि.ली. की तीन मात्राएँ ली जाती हैं। पहली और दूसरी मात्रा के बीच एक माह का अंतर होता है एवं पहली और तीसरी मात्रा के बीच 6 महीनों का अंतर होता है।
  • इस टीके से 3 से 5 वर्ष तक सुरक्षा मिलती है, इसलिए 3 से 5 वर्ष के बाद इसकी प्रभावी मात्रा फिर से ली जानी चाहिए। इसका खर्च 900 रुपए के आसपास होता है। बच्चों में यह खर्च 500 रुपए के आस-पास है। उन्हें वेक्सीन की आधी मात्रा देते हैं।
  • यीस्ट से बना टीका– इसको बनाने के लिए संक्रमित व्यक्ति के प्लाज्मा की जरूरत नहीं होती।

किन व्यक्तियों को हेपेटाइटिस बी के टीके लगवाने चाहिए?

  • वे व्यक्ति, जिनको धोखे से या दुर्घटनावश संक्रमित व्यक्ति की रक्त-युक्त सूई चुभ गई हो या ऐसे व्यक्ति का रक्त चढ़ा दिया गया हो। विषाणु के संक्रामक व्यक्ति से यौन संबंध रखने वालों को भी ये टीके लगवाने चाहिए।
  • संक्रमित माँ से पैदा हुए शिशु को भी टीका लगवाना चाहिए। इस वेक्सीन का ऐसे व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं होता, जो पहले से ही विषाणुओं (एच.बी.एस.ए.जी.) से संक्रमित हो चुके है |
  • इम्यूनोग्लोब्यूलिंस हेपेटाइटिस बी- जिनको विषाणुयुक्त रक्त चढ़ा दिया गया है या अन्य दुर्घटनावश विषाणु उनके शरीर में पहुँच गया है, ऐसे व्यक्तियों को तुरंत सुरक्षा देने के लिए ये इम्यूनोग्लोब्यूलिंस दिए जाते हैं। यदि वेक्सीन और इम्यूनोग्लोब्यूलिंस दोनों को साथ-साथ दिया जाए तो अधिक प्रभावी होते हैं।

हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए उपाय

  • रक्त लेते समय रक्तदाता की जाँच विषाणु के एंटीजन (HBSAG) के लिए अवश्य करवाएँ। यदि जाँच के परिणाम पोजिटिव हों तो ऐसा खून बिलकुल ना लें।
  • व्यावसायिक रक्तदाताओं से रक्त न लेकर सगे संबंधी का रक्त दान में लें। विषाणु से संक्रमित वाहक व्यक्ति अपने रेजर, टूथब्रश इत्यादि अलग रखें।
  • हेपेटाइटिस बी और अन्य गंभीर रोगों से बचने बाहर यौन संपर्क में सावधानियाँ बरतें, कंडोम का इस्तेमाल करें।
  • इंजेक्शनों द्वारा नशे लेने वाले व्यक्ति डिस्पोजेबल सीरिंज का प्रयोग करें या नशा को छोड़ दें तो बेहतर है।
  • दाढ़ी अपने आप घर पर ही बनाएँ अथवा सैलूनों में नए ब्लेड और उचित एंटीसेप्टिक घोल का इस्तेमाल करवाएँ।
  • गर्भवती माताएँ होने वाले बच्चे को ऑस्ट्रेलिया एंटीजनयुक्त रोग का टीका अवश्य लगवा दें।

हेपेटाइटिस बी ठीक होता है की नहीं ?

  • इस बीमारी के इलाज को लेकर अक्सर सवाल पूछे जाते है की क्या हेपेटाइटिस बी का इलाज संभव है ? -हेपेटाइटिस ‘ए’ की तरह इस बीमारी का भी विशेष इलाज नहीं है। इस रोग में भी वही सावधानियाँ अपनाते हैं और दवाएँ देते हैं, जो हेपेटाइटिस ‘ए’ के साथ दी जाती है। जानिए एच.आई.वी एड्स कैसे होता है, कारण
  • कई रोगी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते। ये क्रोनिक हेपेटाइटिस के शिकार हो जाते हैं। इसके बाद सावधानी न रखी जाए तो यकृत की स्वस्थ कोशिकाएँ भी रोगग्रस्त होकर मर जाती हैं, जिससे यकृत अपना कार्य नहीं कर पाता। इनके अलावा कुछ मरीज एक बहुत ही गंभीर स्थिति में पहुँच जाते हैं, जिसे फल्मिनेटिंग हेपेटिक फेल्योर कहते हैं। इसमें यकृत की बहुत सी कोशिकाएँ (40 प्रतिशत से अधिक) मर जाती हैं और उसमें व्यपजनन (Degeneration) भी हो जाता है। इस स्थिति में रोगी को पागलपन, मतिभ्रम, उन्माद, अर्ध बेहोशी इत्यादि तकलीफें होती हैं। यह भी अवश्य पढ़ें – पीलिया कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

हेपेटाइटिस बी की जाँच :

  • बाहरी लक्षणों के अलावा “ऑस्ट्रेलिया एंटीजन” जाँच से 10-15 मिनट में ही रोग या संक्रमण का पता चल जाता है। लेकिन रोग की पूरी स्थिति जानने के लिए (हेपेटाइटिस ‘ए’ के साथ) सभी जाँचें कराई जाती हैं।

सब प्रकार के हेपेटाइटिस को फ़ैलाने वाले दो प्रकार के विषाणु होते है। इनमें एक रक्त द्वारा संक्रमण से फैलता है, जबकि दूसरा पानी, दूध, भोजन, मल द्वारा इस बीमारी को फैलाता है |

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