जानें हाई रिस्क प्रेगनेंसी किसे कहते है तथा इसके मुख्य कारण क्या है ?

हाई रिस्क प्रेगनेंसी डेफिनिशन : उच्च जोखिम गर्भावस्था क्या है?  

  • उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था उसे कहते है जिसमें माँ या शिशु या दोनों में सामान्य गर्भावस्था की तुलना में अधिक जटिलता (कॉम्प्लीकेशन्स) विकसित होने की सम्भावना होती है। इसका मतलब यह की हाई रिस्क प्रेगनेंसी वाली गर्भवती स्त्री को अन्य सामान्य गर्भवती स्त्रियों की अपेक्षा ज्यादा समस्याओ का सामना करना पड़ता है और उन्हें अधिक सावधान रहना पड़ता है तथा अधिक डॉक्टरी निगरानी की जरुरत पडती है | इस आर्टिकल में हम हाई रिस्क प्रेगनेंसी किसे कहा जाता है, इसके प्रमुख कारण क्या है ये बताएँगे | आगे आने वाले अपने लेखो में हम इन सब कारणों को एक-एक करके विस्तार से समझायेंगे तथा यह भी बतायेंगे की एक उच्च जोखिम गर्भावस्था में क्या सावधानियां रखी जाए तथा इन समस्याओ से कैसे निपटा जाए | इस विषय पर हम चार से पांच अर्टिकल पब्लिश करेंगे, तो आइये सबसे पहले यह समझते है की आखिर हाई रिस्क प्रेग्नेंसी होती क्या है तथा बड़ी उम्र में गर्भावस्था में होने वाले कॉम्प्लीकेशन्स से कैसे निपटा जाये |

हाई रिस्क प्रेगनेंसी के कारण :

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हाई रिस्क प्रेगनेंसी सिम्पटम्स

  • हाई रिस्क प्रेगनेंसी के प्रमुख कारणों में माँ का बहुत कम उम्र की होना या ज्यादा उम्र की होना, बहुत कमजोरी या अधिक मोटी होना, जुड़वां बच्चे गर्भ में होना, एचआईवी पॉजिटिव, बेकाबू ब्लड प्रेशर, एक से अधिक बार गर्भपात, शिशु का वजन निर्धारित वजन से कम होना, बच्चे का धीमी गति से विकास, मधुमेह, पीसीओडी (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज),टीबी ,पीलिया, थायराइड जैसे रोगो का होना शामिल है।
  • हमारे देश मे खून की कमी और सेहत की अनदेखी से महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की चपेट में तेजी से आ रही हैं। इसमें खून में हिमोग्लोबिन का स्तर 5 से कम रह जाता है, जबकि महिलाओं में इसका लेवल 10 से 12 होना चाहिए।
  • अधिक शराब, स्मोकिंग करने से भी कई बार गर्भवस्था में जोखिम बढ़ जाता है |
  • कुछ ऐसे कारण भी है जो गर्भावस्था से पहले ही महिला में मौजूद होते है- जैसे हाई ब्लड प्रेशर या पहला बच्चा सर्जिकल से हुआ हो । इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान कुछ कारण अचानक भी पैदा हो सकते हैं। इसमें गर्भावस्था से होने वाला उच्च तनाव,रक्त स्त्राव या गर्भावस्था की डायबिटीज आदि शामिल है।
  • इसके अलावा बच्चे के कारण भी गर्भावस्था में जोखिम हो सकते हैं जैसे कि बच्चे में कोई जन्मजात बीमारी हो। कभी-कभी पूरी तरह से स्वस्थ शिशु भी गर्भाशय में अपनी शारीरिक कमजोरी के कारण हाई रिस्क में आ जाते हैं जैसे कि सामान्य रूप से बच्चे गर्भाशय में ऊपर की ओर होते हैं किन्तु कोई शिशु क्षैतिज रूप (Horizontal) से लेटा हो तो भी जोखिम बढ़ जाता है ।
  • हाई रिस्क प्रेगनेंसी में समय से पहले (37 सप्ताह) प्रसव शुरू हो सकता है। ये कारण प्रसव से जुड़े कहे जाते हैं। लेकिन ये कारण ज्यादातर बड़ी उम्र की गर्भवती स्त्री में देखे जाते हैं या उन स्त्रियों में, जिन्होंने बहुत मुश्किल से गर्भधारण किया हो।
  • कुछ समय पहले और आज की तुलना में आजकल गर्भावस्था और शिशु जन्म दोनों ही बहुत सुरक्षित है हालाँकि कई महिलाओं के लिये गर्भावस्था बहुत जोखिम भरी होती है।

अधिक उम्र में गर्भधारण से होने वाली हाई रिस्क प्रेगनेंसी की जानकारी

  • पैंतीस वर्ष या उससे अधिक उम्र में गर्भधारण करने को ‘एल्डरली प्राइमी’ कहा जाता है। आजकल महिलाओं शिशु जन्म को टालने और तीस वर्ष की उम्र में गर्भधारण की आदत बढ़ती जा रही है। ऐसी महिलाओ को ही हाई रिस्क प्रेगनेंसी के कॉम्प्लीकेशन्स का सामना अधिक करना पड़ता है जिसके कारण उनकी गर्भावस्था युवा महिलाओं के मुकाबले कठिन होती है।
  • उच्च तनाव, मधुमेह और थाइराइड आदि कुछ ऐसी बीमारियाँ हैं जो कि बड़ी उम्र की प्रेगनेंट स्त्रियों में आमतौर पर देखी जाती हैं।
  • इन सबके अतिरिक्त कुछ और भी कारण हैं। जिनकी वजह से हाई रिस्क प्रेगनेंसी वाले मामले बढ़ रहे हैं। कुछ दशको पहले तक जो लड़कियाँ जो किसी गंभीर बीमारी जैसे हृदय विकार या रक्त स्त्राव के साथ जन्म लेती थीं, वे या तो विवाह की उम्र में पहुँचने के पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती थीं या विकलांग के रूप में अविवाहित रहकर ही जीवन गुजार देती थीं। लेकिन आधुनिक उन्नत चिकित्सीय सुविधाएँ होने से ऐसी स्त्रियाँ खराब स्वास्थ्य के बावजूद भी गर्भवती होती है जिससे उनको हाई रिस्क प्रेगनेंसी का सामना करना पड़ता है |
  • गर्भवती स्त्री की उम्र जितनी अधिक होगी, गर्भावस्था के दौरान जटिलता का जोख़िम उतना ही अधिक होगा। फिर भी जैसे ही महिला और उसके परिवार को बढ़े हुए जोख़िम का पता चल जाये तो ऐसी स्त्रियों को गर्भावस्था के दौरान पूरा सहारा देना चाहिए। ऐसी अवस्था में डाउन्स सिन्ड्रोम एक बहुत बड़ी जटिलता है।
  • 45 वर्ष की महिला के मामले में हर 40 में 1 महिला में डाउन्स सिन्ड्रोम से ग्रसित बच्चा होने की संभावना होती है। जबकि 40 वर्ष से कम उम्र की महिला के बच्चे में यह आशंका 100 में 1 होती है। डाउन्स सिन्ड्रोम से ग्रसित बच्चे जन्म के साथ ही कई विकृतियाँ लेकर आते हैं और इनका विकास भी देर से होता है। इसलिए इन्हें खास देखभाल के साथ उचित प्रशिक्षण की जरूरत होती है।
  • अधिक उम्र की महिला में गर्भावस्था के दौरान पहले से मौजूद बिमारियों जैसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह, संकुचनीय (contraction) या गर्भावस्था मधुमेह होने की सम्भावनाएं अधिक होती है। इसी प्रकार महिला रोग जैसे कि फाइब्राइड्स की सम्भावना भी अपेक्षाकृत अधिक उम्र की महिलाओं में अधिक होती है।
  • अधिक उम्र की महिला में उर्वरता (Fertility) भी एक समस्या हो सकती है और उसे ठीक करने के लिये चिकित्सीय सहायता की आवश्यकता हो सकती है किन्तु गर्भधारण के बाद भी उसके लिये गर्भावस्था को सरलता और सुरक्षित तरीके से अंजाम तक पहुँचाना मुश्किल हो सकता है। ऐसी अवस्था में गर्भपात या असामान्य शिशु की आशंका बढ़ जाती है।
  • अगर महिला को गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप हो जाता है तो शिशु में आंतरिक गर्भाशय वृद्धि में रुकावट आती है और शिशु बौना पैदा हो सकता है । यदि उसका रक्तचाप तेजी से बढ़ता है तो उसका जीवन ही खतरे में पड़ सकता है। उसको दौरे आ सकते हैं और उसके किडनी और लीवर जैसे अंगों में गड़बड़ी आ सकती है । कोगुलेशन कैसकेड जो कि खून के बहने को नियत्रित करती है, वह भी हिल जाती है। फलस्वरूप अत्यधिक रक्त स्त्राव माँ और शिशु दोनों के जीवन के लिए ख़तरनाक हो सकता है। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि ऐसी महिलाओं की अच्छी प्रसव पूर्व देखभाल की जाये। इनकी जटिलताओं को रोकना सम्भव नहीं लेकिन जल्दी पहचान हो जाने से माँ और शिशु के लिये सुरक्षित डिलीवरी सुनिश्चित कर सकते है। फिर भी सारी संभव सावधानियों के बावजूद हाई रिस्क प्रेगनेंसी के इन ख़तरों को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता है । यह एक ऐसा सच है जिसे माँ और उसके परिवार को स्वीकार करना पड़ेगा।
  • हाई रिस्क प्रेगनेंसी में प्रसव हमेशा आसान नहीं होता है। वास्तव में हाई रिस्क प्रेगनेंसी तथा वयस्क माताओं में समय पहले प्रसव पीड़ा की घटनाएं अधिक होती हैं। जब वह वास्तव में प्रसव के लिये जाती है जो असामान्य प्रसव पीड़ा की आशंका अधिक होती है। कभी-कभी प्रौढ़ बच्चेदानी निष्क्रिय हो जाती है और वह जरुरी संकुचन नहीं करती है, अतः शिशु को जन्म नलिका में धकेलने वाली शक्ति खत्म हो जाती है और प्रसव प्रक्रिया स्थगित हो जाती है। गर्भाशय का मुँह भी पूरी तरह नहीं खुल पाता और बच्चा जन्म नालिका में अटक जाता है। और तब ऑपरेशन द्वारा डिलेवरी की सम्भावना बढ़ जाती है। डिलेवरी के बाद भी बच्चेदानी ठीक तरह से नहीं सिकुड़ती और रक्त स्त्राव (प्रसवोत्तर हैमरेज) की आशंका बनी रहती है। दुग्धस्राव और स्तनपान भी एक चुनौती है। हालांकि सारी समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं |
  • इसलिये महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बड़ी उम्र में गर्भावस्था की योजना बनाने से पहले अपने डॉक्टर से अवश्य सलाह लें। पूरी तरह सेहत का मूल्यांकन करने के बाद गर्भधारण के लिये आगे बढना चाहिए इसके लिए डॉक्टर आपको कुछ जांचो की सलाह देंगे। यदि आप पहले से कोई दवा ले रही हैं तो आपके डॉक्टर उनको शिशु के विकास के रुकावट होने पर बदल सकते हैं। अपनी खुराक बेहतर करके, व्यसनों को छोड़कर, अपनी जीवन शैली बदलकर और अपना स्वास्थ्य बढ़ाकर अपनी और अपने अजन्मे बच्चे की सहायता करिये। स्थिति जैसी भी हो परंतु यह अनिवार्य है कि अच्छे नतीजे प्राप्त करने के लिये उचित प्रबन्धन की जानकारी आवश्यक है।

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