बच्चों में डायबिटीज होने के लक्षण, कारण, बचाव तथा सावधानियों की जानकारी

मासूमियत से भरा, खेल-कूद, शरारतों और हँसी-ठिठोली में बीत जानेवाला बचपन भी कभी-कभी डायबिटीज जैसी बीमारी से घिर जाता है। बच्चों में डायबिटीज के अधिकांश मामले टाइप-1 डायबिटीज के होते हैं। यह रोग अग्न्याशय की बीटा-कोशिकाओं के खत्म होने पर होता है इससे शरीर में इंसुलिन का बनना ही बंद हो जाता है और शरीर धीरे-धीरे मधुमेह की चपेट में आने लगता है। यदि ठीक समय से इंसुलिन का इलाज शुरू कर दें तो बच्चा फिर से स्वस्थ रहकर भरा-पूरा जीवन जी सकता है। शुगर लेवल ठीक स्तर पर बने रहने के बाद एक डायबिटिक बच्चा भी अन्य बच्चो की तरह खेल कूद से लेकर पढाई में आगे रह सकता है | कुछ बच्चे तो दोनों में ही अव्वल आकर मधुमेह की बीमारी को धता बता देते हैं। पर डायबिटिक बच्चों के माता-पिता की जिम्मेदारी थोड़ी बढ़ जाती है क्योंकि बच्चों में डायबिटीज होने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह होती है की उन्हें मधुमेह के अनुसार सही खानपान तथा एक स्वस्थ्य लाइफ स्टाइल को अपनाने में समय लगता है। और हाँ, हमारी पुश-बटन जैसी भागदौड़ भरी जीवनशैली के कारण कुछ सालों से किशोरों में टाइप-2 डायबिटीज के मामले भी बढ़ रहे हैं, जिस पर रोक लगाने के लिए हमें स्वास्थ्य के मूल सिद्धांतों के प्रति फिर से जागरूक होने की जरूरत है।

बच्चों में डायबिटीज के कारण, लक्षण :

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बच्चो में मधुमेह

कुछ सालों पहले तक ज्यादातर लोग यह यकीन भी नहीं करते थे की बच्चो को भी मधुमेह हो सकता है चकित होकर पूछा जाता था की, क्या बच्चे को शुगर हो सकता है ? पर आजकल यह एक कडवी सच्चाई बन चुकी है की बच्चों में होने वाले क्रोनिक रोगों में डायबिटीज मुख्य रूप से है। देश में कितने बच्चे इस रोग के साथ जी रहे हैं, इसके कोई निश्चित आँकड़े तो नहीं हैं, पर छुटपुट अध्ययनों में बार-बार यह बात निकलकर सामने आ रही है कि यह संख्या दिनों दिन बढ़ रही है। पहले बच्चों में सिर्फ टाइप-1 डायबिटीज हुआ करती थी, पर अब किशोरों में टाइप-2 डायबिटीज भी दिखनी शुरू हो गई है। यह ठीक है कि टाइप-1 डायबिटीज की उपज पर हमारा वश नहीं है और यह अग्न्याशय की इंसुलिन बनानेवाली कोशिकाओं के नष्ट होने से उत्पन्न होती है, किंतु टाइप-2 डायबिटीज मूल रूप से एक ऐसा रोग है जो हमारी जीवन शैली से अंतरंग जुड़ा है उसकी रोकथाम बहुत कुछ हमारे हाथ में है। 21वीं सदी की पिज़्ज़ा, बर्गर,जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक्स शारीरिक आराम, फूलते हुए भारी-भरकम शरीर यदि अच्छे स्वास्थ्य के नियमों में फिर से ढल जाएँ तो बच्चों में डायबिटीज टाइप-2 की रोकथाम की जा सकती है।

बच्चों में डायबिटीज के लक्षण

  • बच्चों में डायबिटीज के लक्षण अचानक ही शुरू हो जाते हैं। उन्हें खूब प्यास लगने लगती है, बार-बार पेशाब आता है, भूख बहुत बढ़ जाती है, पर वजन घटने लगता है। इस प्रकार बच्चों में मधुमेह के लक्षण ये है – ज्यादा प्‍यास लगना, बार-बार पेशाब लगना, भूख बढ़ना, वजन कम होना, थका हुआ रहना, नजरो का धुंधला होना, चिड़चिड़ापन या जल्दी-जल्दी मूड बदलना, घाव जो अच्छी तरह से ठीक नहीं होते हो, छोटी बच्‍चियों में योनि मेंयीस्ट संक्रमण भी हो सकता है और किशोर लडकियों में पीरियड का ना आना या डेट में बदलाव होना आदि  |
  • माता-पिता की आँखें इस परिवर्तन को देख यह समझ लेती हैं कि उनका बच्चा ठीक नहीं है और डॉक्टर के पास जाने पर रोग का पता चल जाता है।
  • पर कुछ बच्चे इतने खुशकिस्मत नहीं होते। उनमें रोग के बिगड़ने पर ही रोग पहचान में आ पाता है।
  • अधिक शुगर से घिरे शरीर में जब पूरी जैव-रासायनिकी बिगड़ जाती है तो बच्चे पर बेहोशी छा जाती है, और तब पेशाब और रक्त की जाँच से रोग का पता लगता है।

बच्चों में डायबिटीज होने पर उनके माता पिता का अगला कदम क्या होना चाहिए

  • सबसे पहले तो आपके लिए यह जान लेना जरूरी है कि अब तक किसी भी चिकित्सा पद्धति–आयुर्विज्ञान, आयुर्वेद, होम्योपैथी, एक्यूपंक्चर, प्राकृतिक चिकित्सा या किसी भी अन्य चिकित्सा पद्धति के पास ऐसा कोई समाधान नहीं है जिससे यह रोग जड़ से मिट सकता हो। ऐसे सभी दावे गलत और बेमायने हैं जो रोग से छुटकारा दिलाने के सपने दिखाते हैं। उनमें उलझने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि उन्हें आजमाते-आजमाते रोग और अधिक बिगड़ जाता है। इसीलिए जितनी जल्दी हो सके, बच्चे का सही ढंग से इलाज शुरू कर दें।
  • शरीर में इंसुलिन की भरपाई हो जाए, बच्चे के लिए यही सबसे अच्छा है। यदि सही स्तर पर इंसुलिन बना रहे तो उसके बाद एक मधुमेही बच्चा भी दूसरे बच्चो की तरह एकदम सामान्य जीवन जी सकता है तथा वो सब कुछ कर सकता है जो हर माता- पिता का सपना होता है यह भी स्वीकार करना होगा कि अब बच्चा पूरी उम्र इंसुलिन पर रहेगा। इसके लिए उसे तैयार करना और जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाए आत्मनिर्भर बनाना, यह दायित्व अब आपका है।

बच्चों में डायबिटीज होने पर उपचार

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डायबिटीज

  • बच्चों में डायबिटीज के अधिकतर केस टाइप वन के ही होते है | टाइप-1 डायबिटीज में – इंसुलिन की भरपाई ही डायबिटीज के उपचार का सबसे जरुरी पॉइंट है। समय से इंसुलिन लेना, समय से भोजन करना, समय से ब्लड शुगर जाँचना और उसके हिसाब से इंसुलिन की मात्रा घटाना-बढ़ाना—यह अब बच्चे के स्वस्थ रहने के लिए सबसे जरुरी बातों में से है।
  • पर इसके साथ-साथ उसे पौष्टिकता से भरे आहार, व्यायाम, खेल-कूद और ऐसे स्कूल की भी जरूरत है जहाँ टीचर उसकी विशेष जरूरतों के प्रति रचनात्मक सोच रखें और मुश्किल वक्त में उसकी मदद भी कर सकें।
  • Diabetologist (मधुमेह के चिकित्सक) की मदद से आप स्वयं इंसुलिन का टीका लगाना, घर पर ही Blood Glucose Meter से ब्लड शुगर की जाँच करना और इंसुलिन की आवश्यक मात्रा निकालना सीख सकते हैं। यह बहुत आसान है और आपके बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जरूरी भी। फिर जैसे-जैसे बच्चा बड़ा हो, यह सभी काम वह अपने आप सँभाल सकता है।
  • आठ साल का होने पर आप बच्चे को अपने से ब्लड शुगर की जाँच करने की सीख देना शुरू कर सकते हैं और 10 साल के होते-होते यह जिम्मेवारी वह अपने से पूरी कर सकता है।
  • इसी प्रकार जब वह 10 साल का हो जाए तो उसे इंसुलिन का टीका लेने की विधि भी आप सिखा सकते हैं। डायबिटीज में इंसुलिन इंजेक्शन : तरीका, सावधानी,
  • हाईस्कूल में पहुँच चुका किशोर सही जानकारी और ट्रेनिंग पाकर अपने आप ही अपनी ब्लड शुगर मॉनीटर कर अपनी इंसुलिन की मात्रा तय कर टीका ले सकता है। पर उसके टीचर को यह पूरी जानकारी रहनी चाहिए कि बच्चे के लिए समय से सब चीजें करना क्यों जरूरी है और जरा सी असावधानी कैसे हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त में शुगर की कमी ) पैदा कर उसके जीवन को संकट में डाल सकती है।
  • हाइपोग्लाइसीमिया के लक्षणों के बारे में भी उन्हें जानकारी देना चाहिए और यह भी बता देना चाहिए कि ऐसे में स्थिति को सँभालने के लिए क्या उपाय करने होते हैं।
  • बच्चे के खाने की रूपरेखा तैयार करने में आहार विज्ञान विशेषज्ञ (dietitian) के सुझाव लेने से आप उसकी उम्र के हिसाब से कैलोरी और विभिन्न पौष्टिक तत्वों की सही मात्रा जान सकते हैं। यह जानकारी हमारी वेबसाइट पर खास तौर पर बड़े विस्तार से दी गई है आप उन्हें पढ़ें सबसे नीचे लिंक दिए गए है।
  • कुछ बंदिशों के बावजूद, खानपान में कुछ नए नए बदलाव लाकर आप अपने बच्चे को भोजन के प्रति बोर होने से भी बचा सकते हैं। कभी-कभार थोड़ी सी टॉफी, चॉकलेट, मिठाई देने में भी हर्ज नहीं है । ये सभी कार्बोहाइड्रेट हैं, बस इनके साथ यह सीमा है कि सिवाए कैलोरी के यह कुछ और नहीं देते है ।

बच्चो में टाइप-2 डायबिटीज

  • किशोरों में हुई टाइप-2 डायबिटीज के लिए इंसुलिन की कम ही जरूरत पड़ती है। यह रोग ज्यादातर बिगड़ी हुई जीवन-शैली से होता है जिसमे मोटाप सबसे बड़ा कारण है और मोटापे का मुख्य कारण है बर्गर, पिज़्ज़ा, चोकलेट, कोल्ड ड्रिंक्स, चिप्स, आइसक्रीम या अन्य नए-नए फ़ास्ट फ़ूड इन सब चीजो से बच्चे को दूर रखकर टाइप-2 डायबिटीज को कंट्रोल किया जा सकता है।
  • साथ ही कुछ नियमित व्यायाम, योगासन, संतुलित भोजन और केवल वजन घटाने से ही ब्लड शुगर सामान्य हो जाता है, पर कुछ को मधुमेह की गोलियों की भी जरूरत पड़ती है।

डायबिटिक बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य पर नजर रखें।

  • ब्लड शुगर के बढ़े रहने का खामियाजा भुगते बिना शरीर नहीं रह पाता। कुछ साल बाद शरीर के अनेक महत्त्वपूर्ण अंग–आँखें, गुर्दे, तंत्रिकाएँ, दिल और धमनियाँ-डायबिटीज की वजह से बीमार पड़ जाते हैं। उन्हें बचाने के लिए ब्लड शुगर पर बेहतर से बेहतर कंट्रोल रखना जरूरी होता है। पर साथ ही, अंगों के स्वास्थ्य की जाँच-परीक्षा भी जरूरी होती है। इसके बारे में यहाँ बताया गया है – डायबिटीज के साइड इफेक्ट्स तथा मधुमेह में अन्य बीमारियाँ

डायबिटिक बच्चे की मनोवैज्ञानिक देखरेख

  • मधुमेही बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए यह यह बहुत जरुरी है कि माता-पिता और परिवार के लोग बच्चे को दूसरे बच्चों की ही तरह पालें-पोसें और उसे सामान्य ढंग से बढ़ने का अवसर दें। यह सहज, रचनात्मक रवैया बच्चे में आत्मविश्वास जगाता है और उसे जीवन में समान रूप से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
  • बच्चे को अनावश्यक ही किसी चीज से दूर रखना, उस पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाना, किसी से कम समझना उसके आत्म विश्वाश को ठेस पहुँचाता है और उसमें हीन-भाव जगा सकता है जिसका नुकसान कभी पूरा नहीं हो पाता।

बच्चों में डायबिटीज और खेलकूद

  • बच्चों में डायबिटीज होने पर उन्हें खेल से दूर रखना गलत है। यह बच्चा भी अपनी उम्र के दूसरे बच्चों के साथ सभी प्रकार के खेलों और व्यायाम में हिस्सा ले सकता है। हाँ, उसे अपनी रूटिन के लिए जरुर जागरूक रहना चाहिए । खेल में इतना न डूब जाए कि समय से भोजन न कर सके या इंसुलिन लेने में देर हो जाए।
  • खेलना और व्यायाम करना बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं। बच्चा किसी खेल में बहुत अच्छा हो तो उसे इसमें आगे बढ़ने का पूरा अवसर दें। अब तक बहुत से डायबिटिक बच्चे अपने रोग को हराते हुए अपनी मेहनत और लगन से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी बने हैं और अपना नाम रौशन करने में कामयाब हुए हैं। क्रिकेट, तैराकी, हॉकी, फुटबॉल, टेनिस, दौड़, साइकलिंग-जिस भी खेल में बच्चे की रुचि हो, उसे खेलने से न रोकें |

बच्चों में डायबिटीज और स्कूल

  • डायबिटिक बच्चा भी दूसरे बच्चों की तरह सामान्य स्कूल में जा सकता है। पर इसके लिए स्कूल-प्रशासन और अध्यापकों का रचनात्मक रवैया होना जरूरी है। कई बार यह देखा यह जाता है कि लगभग सभी बड़े और तथा पब्लिक स्कूल भी डायबिटिक बच्चे को दाखिला देने में ना-नुकूर करते हैं और जब तक उन पर दबाव नहीं डाला जाता, बच्चे को एडमिशन नहीं करते।
  • उनको इस रवैये में सुधार लाने की जरूरत है। उन्हें यह समझना चाहिए कि डायबिटिक बच्चे की प्रतिभा दूसरे बच्चों से कम नहीं होती और उसे बढ़ावा देना उनका फर्ज है।
  • माता-पिता के लिए भी यह जरूरी है कि वे स्कूल-प्रशासन और टीचर को बच्चे के रोग के बारे में पूरी जानकारी दें और उसकी खास जरूरतों के संबंध में पहले से बता दें।
  • स्कूल-प्रशासन के पास माता-पिता और बच्चे के डॉक्टर का टेलिफोन नंबर भी होना चाहिए जिससे कि जरूरत पड़ने पर समय से संपर्क किया जा सके।

बच्चों में डायबिटीज होने पर कुछ सावधानियां भी है जरुरी

  • डायबिटीज से बच्चे के जीवन में दो प्रकार के संकट खड़े हो सकते हैं हाइपोग्लाइसीमिया, जिसमें ब्लड शुगर बहुत घट जाती है और डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस, जिसमें ब्लड शुगर बहुत बढ़ जाती है और पूरे शरीर की जैव-रासायनिकी उथल-पुथल हो जाती है हालाँकि ये दोनों परिस्थितियाँ बड़ी उम्र के मधुमेही के साथ हो सकती है ।
  • इन दोनों के बारे में माता-पिता, परिवार-जन तथा स्कूल में भी स्पष्ट जानकारी होना जरूरी है।
  • हाइपोग्लाइसीमिया ब्लड शुगर के घटने से बच्चे का जीवन संकट में पड़ सकता है। यह समस्या अधिक इंसुलिन लेने, समय से भोजन न करने, थोड़ा भोजन करने या फिर एकदम खूब शारीरिक मेहनत करने से पैदा होती है।
  • ब्लड शुगर कम होने पर अचानक ही बच्चे को चक्कर आने लगते हैं, बदन काँपने लगता है, पसीना आने लगता है, बहुत कमजोरी आ जाती है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, और उसका दिमाग ठीक से काम नहीं कर पाता। कभी लगता है कि जैसे वह नशे में है।
  • स्थिति तुरंत सँभाली न जाए तो बहुत जल्द बच्चे पर बेहोशी गहराने लगती है। इस इमरजेंसी से निपटने के लिए तुरंत ही बच्चे को ग्लूकोज, बिस्कुट या कोई भी मीठी चीज दे दें। इससे कुछ ही मिनटों में खून में शुगर की मात्रा ठीक हो जाती है और बच्चे को आराम आ जाता है। पर स्थिति अधिक गंभीर हो और बच्चा बेहोश हो गया हो, तो तुरंत ही उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। ऐसे में बच्चे को ग्लूकागोन का इंजेक्शन और नस से ग्लूकोज़ देकर जान बचाने की जरूरत होती है। लेकिन यह सुनिश्चित करना आपकी जिम्मेदारी है की ये समस्या कम ब्लड शुगर होने से हुई है या अधिक होने से इसके लिए Blood Glucose Meter से पहले रक्त की जाँच जरुर कर लें|

डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस

  • दूसरी इमरजेंसी ब्लड शुगर के बहुत बढ़ने से पैदा होती है। इसे डायबिटिक कीटो-एसिडोसिस कहते हैं। शरीर में इंसुलिन की कमी होने से कोशिकाओं को ग्लूकोज़ नहीं मिल पाता है | शरीर भीतर जमा वसा और प्रोटीन को तोड़कर ग्लूकोज़ बनाने लगता है, शरीर में एसिड इकट्ठे होने लगते हैं, खून में कीटोन आ जाते हैं और यूरिन में भी कीटोन आने लगता है।
  • इसके बाद शरीर के भीतर पानी की कमी हो जाती है, रक्त में अम्ल बढ़ जाता है यह इमरजेंसी तभी उभरती है जब बच्चा ठीक से इंसुलिन नहीं लेता, या शरीर में कोई तेज संक्रमण होने पर भी इंसुलिन बढ़ाई नहीं जाती है |
  • इसके लक्षण ये है – बच्चे को खूब प्यास लगती है, बार-बार पेशाब आता है, नजर धुंधली हो सकती है, पेट में दर्द उठ सकता है, मितली और उल्टियाँ परेशान कर सकती हैं, साँस से सड़े हुए फलों जैसी एसीटोन की बदबू आती है, जुबान सूख जाती है और साँस तेज हो जाती है। यह एक गंभीर इमरजेंसी है जिसमें बिना कोई समय गवाएं बच्चे को तुरंत अस्पताल में एडमिट करना पड़ता है।

अंत में आपको ये समझना जरुरी है की बड़ी उम्र के डायबिटिक और बच्चों में डायबिटीज होने पर मुख्य अंतर यही है की एक मधुमेही बच्चा अपने आप से कई जरुरी बातों का ख्याल नहीं रख पाता है और अकसर इंसुलिन की कमी या शुगर की अधिकता दोनों में से किसी भी एक परेशानी से बार-बार जूझता रहता है | जैसा की हमने हमेशा आपको यह सुझाव दिया है की मधुमेह की बीमारी को कंट्रोल करने के लिए बस तीन चीजो का ध्यान रखना है एक सही खानपान, थोडा सा व्यायाम, समय से दवा का सेवन | इनमे “भोजन” सबसे जरुरी फैक्टर है |

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