जानिए क्या होती है हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी ? Health Insurance Portability

इन दिनों पोर्टेबिलिटी नामक शब्द काफी चलन में है। किसी एक कंपनी से ग्राहक सेवा ले रहा है और यदि उस सेवा से वह संतुष्ट नहीं है तो किसी दूसरी कंपनी से सेवा ले सकता है, इसे पोर्टेबिलिटी कहा जाता है। यदि आपकी मोबाइल कंपनी आपको संतोषजनक सेवा नहीं दे रही है, तब आपके पास किसी दूसरी कंपनी से संपर्क करने का विकल्प बचता है। यह दूसरी कंपनी आपको सेवा जरुर देती थी, परंतु आपको नंबर बदलना पड़ता था। बदले हुए नंबर को अपने लोगों तक पहुँचाना बड़ा ही टेढ़ा काम होता था। जब ग्राहकों की शिकायतें हद से ज्यादा बढ़ गईं तब ट्राय यानी ‘टेलीकॉम रेग्युलेटरी अॅथोरिटी’ ने पोर्टेबिलिटी की घोषणा कर दी। अब नंबर बदले बगैर आपको दूसरी मोबाइल कंपनी की पूरी सेवा मिलती है। बस यही सुधार अब Health insurance में भी है आप यदि अपनी इंश्योरेंस कंपनी से संतुष्ट नहीं है तो हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी (Health Insurance Portability) सुविधा के जरिये उसे बदल सकते है |

2009 में मेडिक्लेम तथा हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों ने प्रीमियम में अचानक वृद्धि कर दी। कुछ कंपनियों ने इसे 200 से 300 प्रतिशत तक बढ़ाया था। जिन लोगों का वार्षिक प्रीमियम 18-19 हजार रुपए था उनका री-न्युअल प्रीमियम बढकर 52 से 54 हजार हो गया। इससे जिन बीमा ग्राहकों की उम्र 50 वर्ष से अधिक हो गई थी, उनके सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई। प्रीमियम अदा न करने पर पॉलिसी ब्रेक होने का खतरा तथा नो क्लेम बोनस की जमा राशि हाथ से निकल जाने की समस्या पैदा हो गई थी । नई पॉलिसी लेना चाहें तो दोबारा डॉक्टरी जाँच जरुरी थी । प्री-एक्झिस्टिंग एलिमेंट्स के लिए 3 से 4 वर्ष का समय और लगता । इन तमाम परेशानियों के चलते आई.आर.डी.ए. ने गंभीरतापूर्वक विचार किया और प्रीमियम की वृद्धि को 30 से 40 प्रतिशत तक सीमित किया। इसी समय हेल्थ इंश्योरेंस में पोर्टेबिलिटी के मुद्दे पर गहरी चर्चा हुई। मोबाइल पोर्टेबिलिटी की तरह हेल्थ इंश्योरेंस को भी पोर्टेबल बनाने की माँग जोर पकड़ने लगी और आई.आर.डी.ए. ने 1 जुलाई, 2011 से हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी जारी की | इन सभी कारणों से इंश्योरेंस कंपनी को बदलना पॉलिसीधारक के लिए झंझट का काम बन गया था। इसी के चलते हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी की माँग जोर पकड़ने लगी।

अब परेशान पॉलिसीधारक अपनी कंपनी बदलकर आसानी से दूसरी कंपनी में अपनी पॉलिसी का नवीनीकरण करवा सकते हैं। इस सुविधा के तहत नो क्लेम बोनस, वेटिंग पीरियड फॉर प्री-एक्झिस्टिंग एलिमेंट आदि लाभ ज्यों-के-त्यों बने रहेंगे। हेल्थ इंश्योरेंस की पोर्टेबिलिटी, हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी के लिए बहुत बेहतरीन सुविधा है, फिर भी यह सब उतना आसान नहीं जितना देखने में लगता है। तो आइये समझते है हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के बारे में |

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के मुख्य बिंदु

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी ? Health Insurance Portability

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी

  • मौजूदा पॉलिसी की नवीनीकरण तिथि से कम से कम 45 दिन पहले, आप हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के लिए अप्लाई कर सकते है। यदि पॉलिसीधारक ऐसा नहीं कर पाता है, तो यह तय करने के लिए बीमाकर्ता कंपनी पर निर्भर करता है कि वह पोर्टेबिलिटी के लिए आवेदन पर विचार करेगी या नहीं ।
  • बीमाधारक व्यक्ति हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के लिए तभी आवेदन कर सकता है जब उसकी मौजूदा पॉलिसी चालू (एक्टिव) हो ।
  • बीमा बेचने वाली कंपनी को आईआरडीए द्वारा संचालित एक पोर्टल के माध्यम से 7 कार्य दिवसों के भीतर विवरण देना होता है | एक बार जब बीमा कंपनी सभी विवरण प्राप्त कर लेती है, तो उसे पॉलिसी को 15 दिनों के भीतर अंडरराइट करने का निर्णय लेना होगा। यदि ऐसा करने में कंपनी विफल रहती है, तो ग्राहक का हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के लिए आवेदन स्वीकार करने के लिए कंपनी बाध्य होगी
  • आप अतिरिक्त कवर लेने के लिए भी पोर्टेबिलिटी का विकल्प अपना सकते हैं। अगर आपकी कंपनी ने आपसे पारदर्शिता नही रखी है। मेडिकल इमरजेंसी के दौरान आपको कोई छिपी हुई शर्त पता चलती है तो आप ठगा सा महसूस करते हैं। ऐसे समय में भी पोर्टेबिलिटी का आपके पास विकल्प है।
  • आपने किसी जनरल इंश्योरेंस कंपनी से पॉलिसी ले रखी है और अब आप स्पेशलाइज्ड हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी में जाना चाहते हैं तो भी पोर्टेबिलिटी को अपना सकते हैं।

हेल्थ इंश्योरेंस मेडिक्लेम पॉलिसी की पुरानी शर्ते ये थी

  • मेडिक्लेम हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी का हर साल नवीनीकरण कराना पड़ता है। नो-क्लेम, प्री-एक्झिस्टिंग एलिमेंट कवर, वेटिंग पीरियड आदि उसी इंश्योरेंस कंपनी के पास होने से वहीं नवीनीकरण कराना पड़ता था ।
  • एक बार तय की गई कंपनी तथा प्रोडक्ट को बदला नहीं जा सकता था ।
  • यदि नई कंपनी की पॉलिसी लेना चाहें, तब वह नई प्रपोजलवाली पॉलिसी होगी। उसके प्रस्ताव को इसी नजर से देखा जाएगा। उस कंपनी की पॉलिसी तथा उसका इतिहास और उसकी सेवा के फायदे की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था ।
  • यदि ग्राहक की उम्र 45 से 50 वर्ष के बीच है। तब दोबारा डॉक्टरी जाँच कराओ, रिपोर्ट पेश करो, प्री एक्झिस्टिंग एलिमेंट के लिए 3 से 4 साल तक रुको आदि-आदि झंझटें होती थी ।

हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी में कुछ अडचने ये होती हैं

  • प्रत्येक कंपनी की मेडिक्लेम हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी की रचना अलग-अलग तरीके से होती है। उनके नियम तथा शर्ते भिन्न-भिन्न होती हैं। यदि सभी कंपनियों की पॉलिसियों में समानता रहेगी, तब ही पोर्टेबिलिटी से लाभ होगा।
  • बीमा कंपनियां युवा और स्वस्थ व्यक्ति को बीमा बेचना अधिक पसंद करती हैं। इसलिए, हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी अपनाने में बड़ी उम्र के व्यक्ति के लिए मुश्किल होती है क्योंकि एक नई बीमा कंपनी बुजुर्ग व्यक्ति को कवर करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी ।
  • यदि पॉलिसीधारक की उम्र 50 वर्ष से अधिक है, उसका चिकित्सीय इतिहास गंभीर है, तब नई कंपनी ऐसा जोखिम क्यों स्वीकारेगी?
  • हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी के समय यदि फिर से अंडरराइटिंग किया गया, तब जोखिम बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है। तब नई कंपनी जोखिम का खतरा क्यों स्वीकारेगी?
  • नई कंपनी ग्राहक द्वारा पॉलिसी लेने के बाद यदि कोई गंभीर शर्ते जारी करती है अथवा पहले दो वर्षों तक प्रीमियम की रकम छोटी रखने के बाद अचानक बढ़ा देती है, तब बीमाधारक के पास क्या विकल्प है? पॉलिसीधारक पोर्टेबिलिटी के आधार पर कितनी बार कंपनियाँ बदलता रहेगा?
  • भले ही हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी एक वरदान लगता होगा, फिर भी उसका उपयोग सीमित है। यह विषय उलझनों से भरा है। भविष्य में उसका उपयोग अवश्य होगा, इसमें कोई शक नहीं।
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