ऑस्टियोपोरोसिस के कारण, लक्षण, जाँच तथा बचाव की जानकारी

ऑस्टियोपोरोसिस की बीमारी दबे पाँव आकर लोगों को अपना शिकार बनाकर अपाहिज बना देने वाली ऑस्टियोपोरोसिस नामक बीमारी का प्रकोप देश में बहुत तेजी से फैल रहा है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में तकरीबन साढ़े छह करोड़ लोग इस गंभीर अस्थि रोग से पीड़ित हैं और हर साल इसमें 23 लाख नए रोगी जुड़ते जाते हैं। ऑस्टियोपोरोसिस इतनी खामोशी के साथ लोगों को शिकार बनाकर उनकी हड्डियों को खोखला करती रहती है कि हड्डियों के अचानक फैक्चर होने से पहले इसका जरा भी आभास नहीं होता। इसी कारण इसे ‘साइलेंट डिसीज’ का नाम दिया गया आंकड़ो के अनुसार लगभग ढाई करोड़ भारतीय ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त हैं। पश्चिमी देशों के मुक़ाबले भारत में यह समस्या ज्यादा है। एक ताज़ा अध्ययन कहता है कि भारतीय लोग विटमिन डी की कमी से ग्रस्त हैं। यही कारण है कि उनकी हड्डियां कमज़ोर हो रही हैं। यहां हर दस में से लगभग चार स्त्रियों और चार में से एक पुरुष को यह समस्या घेर रही है।

ऑस्टियोपोरोसिस क्या है? – ऑस्टियोपोरोसिस में हड्ड्यिां कमज़ोर हो जाती हैं और फ़ैक्चर्स की आशंका बढ़ने लगती है। लेकिन ये हड्ड्यिां रातों-रात कमज़ोर नहीं होती, यह प्रक्रिया सालों-साल चलती है। उम्र के साथ-साथ शरीर में कई बदलाव होते हैं। 20 की उम्र में शरीर पर जो नियंत्रण होता है, वह 40 की उम्र में नहीं रह सकता। मांसपेशियां उतनी मज़बूत नहीं रहतीं, आंखें कमज़ोर होने लगती हैं, त्वचा चमक खोने लगती है। इसी तरह हड्डियां भी कमज़ोर होने लगती हैं। उम्र के साथ ही बोन मास या डेंसिटी कम होने लगती है। स्त्री-पुरुष दोनों में यह दिखाई देता है, लेकिन स्त्रियों को ऑस्टियोपोरोसिस ज्यादा परेशान करता है। इसका कारण यह है कि मेनोपॉज़ के बाद उनकी हड्डियों में कैल्शियम, विटमिन डी और मिनरल्स की कमी होने लगती है और इससे हड्डियों की डेंसिटी कम होने लगती हैं। प्रौढ़ या वृद्ध लोगों को कूल्हे, घुटने या कंधों में फैक्चर्स की शिकायत होती है। ऐसा ऑस्टियोपोरोसिस की स्थिति में ही होता है।

अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस ) के लक्षण

 ऑस्टियोपोरोसिस के कारण, लक्षण, जाँच तथा बचाव की जानकारी osteoporosis kya hai lakshan karan bachav

ऑस्टियोपोरोसिस

ऑस्टियोपोरोसिस को साइलेंट किलर माना जाता है। दरअसल इसके लक्षण जल्दी नहीं दिखते। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ-साथ हड्डियों या जोड़ों के दर्द उभर सकते हैं।

  • ऑस्टियोपोरोसिस के कुछ सामान्य लक्षण हैं कूल्हे, हाथ या कलाई की हड्डियों में दर्द, पीठ के निचले हिस्से या कमर में दर्द, कमर का झुक जाना या कूबड़ सा निकल आना, गर्दन में दर्द, कूल्हे, रोढ़, पीठ या कलाई की हड्डियों में बिना किसी कारण फ्रेक्चर्स होना या तेज़ दर्द होना।
  • ऑस्टियोपोरोसिस के कारण आम तौर पर तीन हड्डियों में फैक्चर होता है- कूल्हे की हड्डी (नेक ऑफ फीमर), रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) और कलाई की हड्डी (लोअर आर्म बोन)। एक अनुमान के अनुसार, भारत में इस बीमारी के कारण हर साल पाँच लाख महिलाओं में सिर्फ कूल्हे का फ़ैक्चर होता है।
  • ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियों का घनत्व एवं अस्थि मज्जा बहुत कम हो जाती है। साथ ही हड्डियों की बनावट भी खराब हो जाती है, जिससे हड्डियाँ अत्यंत भुरभुरी और कमजोर हो जाती हैं। इस कारण हड्डियों पर हलका दबाव पड़ने या हलकी चोट लगने पर भी वे टूट जाती हैं।
  • कुछ साल पहले तक ऑस्टियोपोरोसिस के कारण हड्डियों में फैक्चर होने पर रोगी की मृत्यु हो जाती थी, खासकर कूल्हे का फ़ैक्चर होने पर चल नहीं पाने तथा बिस्तर पर लेटे रहने के कारण 10 में से 9 लोगों की मृत्यु फैक्चर होने के छह महीने के भीतर ही हो जाती थी। उनकी मृत्यु बेड सोर (शैया व्रण) होने, छाती में संक्रमण होने, पेशाब में संक्रमण होने, पैर की नसों में खून जम जाने आदि के कारण होती थी, लेकिन अब कूल्हे के फ्रेक्चर का ऑपरेशन से इलाज करके मरीज को चलने-फिरने लायक बनाया जाता है, जिससे बेड सोर या दूसरे संक्रमण के होने की आशंका बहुत कम होती है और इस कारण मृत्यु की आशंका 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है।
  • रीढ़ की हड्डी (स्पाइन) में फ़ैक्चर होने पर अधिकतर रोगी को दर्द नहीं होता है, जिससे फ्रेक्चर का पता तुरंत नहीं चल पाता। रीढ़ की हड्डी में फ़ैक्चर होने पर पीठ झुकती चली जाती है और पीठ में कूबड़ निकल जाता है, जिससे रोगी की लंबाई कम हो जाती है। कुछ रोगियों में नसों पर दबाव पड़ने के कारण लकवा होने की भी आशंका होती है।

ऑस्टियोपोरोसिस के कारण

  • धूम्रपान या शराब की लत |
  • खानपान में पौष्टिकता की कमी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार ज़्यादा रिफाइंड खाद्य पदार्थ जैसे सफ़ेद चावल, मैदा, पास्ता, सफ़ेद ब्रेड, सैच्युरेटेड या ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ भी इस समस्या को बढ़ा रहे हैं।
  • कैल्शियम और विटमिन डी की कमी हड्डियों की कमजोरी का कारण बनता है |
  • एस्ट्रोजन स्तर का घटना।
  • कीमोथेरेपी में ओवरीज़ पर टोक्सिक प्रभाव के कारण मेनोपॉज़ जल्दी होता है।
  • एनोरेक्सिया नर्वोसा जैसी बीमारी, जिसमें लड़कियां खाना नहीं खा पातीं।
  • क्रैश डाइटिंग, जिससे हड्ड्यिां कमज़ोर हो जाती हैं।
  • लो बॉडी फैट, जो अधिक और गलत व्यायाम करने वाली स्त्रियों को हो सकता है।
  • लिवर संबंधी परेशानियां, अर्थाराइटिस, डायबिटीज़ की समस्या।
  • शारीरिक गतिविधियां कम होना, जैसे किसी स्ट्रोक के बाद या कोई ऐसी बीमारी, जिसमें चलना-फिरना असंभव हो जाए |
  • हाइपरथायरॉयड और अत्यधिक पसीना आने की समस्या।
  • ओरल स्टेरॉयड्स या एंटी-सीज़र दवाओं का लंबे समय तक सेवन |
  • मेनोपॉज़ के बाद खतरा – भारतीय स्त्रियों में ऑस्टियोपोरोसिस के मामले काफ़ी देखे जा रहे हैं। यूं तो यह समस्या किसी भी उम्र में घेर सकती है, लेकिन वृद्धावस्था में इसकी आशंका अधिक रहती है। 35 की उम्र के बाद बोन डेंसिटी 3 से 2.5 प्रतिशत तक कम होती हैं। स्त्रियों में मेनोपॉज के बाद बोन डेंसिटी को मेंटेन करने के लिए जरूरी हॉर्मोन एस्ट्रोजन के स्तर में कमी आती है। ऑस्टियोपोरोसिस के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन कैल्शियम व विटमिन डी की कमी। इसका सबसे बड़ा कारण हैं। एक और बात यह है कि दर्द के अलावा शुरुआत में इसके कुछ खास लक्षण नज़र नहीं आते। जब बार-बार फ्रेक्चर्स होने लगते हैं, तब पता चलता है कि ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या हो चुकी है। मेनोपॉज़ के बाद 5 से 10 वर्षों में स्त्रियों की बोन डेंसिटी में हर साल 2 से 4 प्रतिशत तक कमी आती है। यानी 55-60 वर्ष की आयु तक बोन डेंसिटी 25-30 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसी कारण कुछ स्त्रियां हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी भी लेती हैं, लेकिन इसका असर भी मेनोपॉज़ के पांच-छह वर्ष तक ही दिखता है।

ऑस्टियोपोरोसिस की जाँच

  • ऑस्टियोपोरोसिस का पता हड्डियों का घनत्व मापकर किया जाता है। इसके लिए सामान्य एक्स-रे, कंप्यूटरीकृत टोमोग्राफी (सी.टी.) स्कैन, अल्ट्रसाउंड बोन डेंसीटोमीटर स्कैन और डेक्सा बोन स्कैन से हड्डियों का घनत्व मापा जाता है। एक्स-रे से ऑस्टियोपोरोसिस का पता तब चलता है, जब हड्डी लगभग आधी खोखली हो चुकी होती है अर्थात् हड्डियों के घनत्व में 40 प्रतिशत से अधिक की कमी होने के बाद ही एक्स-रे से इसका पता चल पाता है, लेकिन अब डेक्सा बोन डेंसीटोमीटर जैसी नई तकनीकों पर आधारित मशीन की बदौलत ऑस्टियोपोरोसिस का प्रारंभिक अवस्था में ही पता लगाना संभव हो गया है।

ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव : ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम

उपचार से बेहतर है बचाव, ऑस्टियोपोरोसिस के मामले में यह कहावत सटीक है। इससे बचने के लिए हड्डियों को मज़बूत खना ही उपाय है। ऐसे रखें हड्डियों को फिट :-

  • ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम के लिए आहार पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। भोजन में कैल्शियम की उचित मात्रा लेनी चाहिए। इसके लिए दूध या दूध से बने खाद्य पदार्थों का भरपूर सेवन करना चाहिए। जो लोग भोजन में कैल्शियम नहीं ले रहे हों, उन्हें 45 साल की उम्र के बाद नियमित रूप से कैल्शियम की गोली लेनी चाहिए। जिन लड़कियों की माँ या दादी को ऑस्टियोपोरोसिस हो चुकी हो, उन्हें बचपन से ही अपने आहार में कैल्शियम की अधिक मात्रा लेनी चाहिए। ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त लोगों को शराब, सिगरेट और कैफीन से दूर रहना चाहिए और नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए।

ऐसे करें बचाव

  • विटमिन डी का सबसे बड़ा स्रोत सूरज है। इसके लिए रोज़ सुबह कम से कम 15 मिनट तक धूप में जरूर बैठे।
  • आहार में कैल्शियम की मात्रा का ध्यान रखें। प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम कैल्शियम स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ज़रूरी है।
  • अगर आपकी उम्र 35 की हो चुकी है तो साल में एक बार कैल्शियम व बोन डेंसिटी टेस्ट ज़रूर कराएं। इसके अलावा कंप्लीट हेल्थ चेक-अप कराते रहें।
  • डायबिटीज़ या अन्य खराब लाइफस्टाइल की वजह से होने वाली बिमारियों से बचें।
  • खानपान पौष्टिक होना चाहिए। विटमिन सी, डी, ई, एंटी-ऑक्सीडेंट्स और ओमेगा 3 फैटी एसिड्स में ऑस्टियोपोरोसिस से लड़ने के गुण छिपे हैं। यह पढ़ें – मजबूत हड्डियों के लिए खाएं ये फल और सब्जियां
  • शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। सुबह की ब्रिस्क वॉक, जॉगिंग, डांस, वेट ट्रेनिंग और स्विमिंग से हड्डियों को मज़बूती प्रदान की जा सकती है। 30 की उम्र के बाद रोज़ कम से कम 70 मिनट का वर्कआउट ज़रूरी है। जिम जाते हों तो किसी कुशल ट्रेनर की देख रेख में ही एक्सरसाइज़ शुरू करें।
  • नशे, धूम्रपान से दूर रहें और कैफीन का सेवन कम करें। दिन भर में तीन कप से अधिक कॉफी या चाय का सेवन न करें।
  • मलाई-रहित दूध व दही का सेवन करें। दुग्ध उत्पाद कैल्शियम के नैचरल स्रोत हैं।
  • प्रोटीन की अधिकता से बचें। स्त्रियों के लिए नियमित लगभग 50 ग्राम और पुरुषों के लिए 65 ग्राम प्रोटीन पर्याप्त है। इससे अधिक प्रोटीन से कैल्शियम के अवशोषण में परेशानी आ सकती है।
  • यदि कैल्शियम की कमी है तो डॉक्टर की सलाह से कैल्शियम सप्लीमेंटस ले सकते हैं, लेकिन इसे विटमिन डी के साथ लेना ही फ़ायदेमंद होगा।
  • जानिए आर्थराइटिस के प्रकार, लक्षण तथा आधुनिक उपचार
  • तनाव, दबाव व अवसाद से बचें। तनावग्रस्त व्यक्ति अपनी सेहत और खानपान के प्रति लापरवाह हो जाता है। इससे बीमारी का इलाज मुश्किल हो जाता है।

अन्य सम्बंधित लेख

Leave a Reply