एनजाइना रोग के कारण, लक्षण तथा आधुनिक उपचार

असहनीय छाती का दर्द इोलने वाले एनजाइना के मरीजों की रक्त-धमनियों में वसा या कोलेस्टेरॉल जम जाने, उनमें रक्त के थक्के के फंस जाने अथवा उनमें सँकरापन आ जाने के कारण धमनियाँ रूक जाती हैं, जिसके कारण हमेशा धड़कने वाले हृदय को पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं मिल पाता, जिसके कारण सीने के दर्द से रोगी तडप उठता है। चिकित्सकीय भाषा में इसे एनजाइना पेक्टोरिस कहा जाता है।

एनजाइना पेक्टोरिस इस बात का संकेत है कि हृदय संकट में है। हृदय या छाती के इस दर्द की अनदेखी आगे चलकर दिल के दौरे के रूप में बदल जाती है। एनजाइना पेक्टोरिस की गंभीर स्थिति रिफ्रेक्टिव एनजाइना पेक्टोरिस है, जिसमें मरीजों के अधिक समय तक जीवित रहने की संभावना बहुत कम होती है; क्योंकि ऐसे मरीजों को हृदयपेशीय रक्ताल्पता (मायोकार्डियल इस्कीमिया) हो जाती है, जिसमें दिल की नसों में खून का प्रवाह नहीं होता और दिल को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे मरीज को तेज दर्द और घबराहट होती है।

इस विषय पर हुए अध्ययनों में पाया गया है कि 90 प्रतिशत मामलों में सँकरी हृदय धमनी या धमनियों में अचानक रक्त के थक्के फंस जाने के कारण दिल को दौरा पड़ता है। सँकरी या रुकी धमनी या धमनियों में रक्त-प्रवाह बंद हो जाने के कारण हृदय को काम करने के लिए ऑक्सीजन और ग्लूकोज रूपी खुराक नहीं मिल पाती है । इसके कारण हृदय की मांसपेशियों की कोशिकाएँ खत्म होने लगती हैं, जिसका परिणाम दिल के दौरे (एक्यूट मायोकार्डियल इंफ्रेक्शन) के रूप में होता है।

एनजाइना के लक्षण

एनजाइना रोग के कारण, लक्षण तथा आधुनिक उपचार angina ke lakshan karan bachav ke liye tips

एनजाइना ह्रदय रोग की जानकारी

  • चलने-फिरने, व्यायाम करने, सीढ़ी चढ़ने अथवा पहाड़ पर चढ़ने से छाती में दर्द होना, साँस फूलना और पसीना आना दिल की बीमारी के सामान्य लक्षण हैं।
  • दिल के दौरे के दौरान सीने में बहुत तेज दर्द उठता है। यह दर्द छाती के बिलकुल बीच के भाग (वक्षास्थि) के ठीक नीचे से शुरू होकर आस-पास के हिस्सों में फैल जाता है। कुछ लोगों में यह दर्द छाती के दोनों तरफ फैलता है, लेकिन ज्यादातर लोगों में यह बाईं तरफ अधिक फैलता है। यह दर्द हाथों और अँगुलियों, कंधों, गरदन, जबड़े और पीठ तक पहुँच सकता है।
  • छाती में जलन महसूस होना, घबराहट, बेचैनी, सीने में भारीपन महसूस होना, जकड़न, चक्कर आना, दबाव, सिकुड़न, आपको छाती के पीछे दर्द होने की संभावना है, लेकिन यह आपके कंधे, हाथ, गर्दन, गले, या पीठ में भी फैल सकता है।
  • कई बार दर्द छाती के बजाय पेट के ऊपरी भाग से उठ सकता है; लेकिन नाभि के नीचे और गले के ऊपर का दर्द दिल के दौरे के लक्षण नहीं होते है। हालाँकि अलग-अलग मरीजों में दर्द की तेजी एवं दर्द का दायरा अलग-अलग होता है।
  • कई लोगों को इतना तेज दर्द होता है कि मानो जान निकली जा रही हो, जबकि कुछ मरीजों खास तौर पर मधुमेह एवं उच्च रक्तचाप के मरीजों को कोई लक्षण या दर्द के बिना ही दिल का दौरा पड़ता है।
  • कई लोगों को दर्द के साथ साँस फूलने, उलटी होने और पसीना छूटने जैसे लक्षण भी प्रकट होते हैं। हालाँकि कुछ मरीजों, खासकर डायबिटीज के मरीजों, में बिना कोई लक्षण के भी दिल की बीमारी हो जाती है।
  • डायबिटीज के मरीजों में से 25 से 30 प्रतिशत तथा सामान्य लोगों में 10 प्रतिशत की दिल की बीमारी के कोई लक्षण प्रकट नहीं होने के बावजूद उन्हें दिल की बीमारी हो जाती है। दिल का दौरा पड़ने पर 25 से 30 प्रतिशत लोगों की अचानक मृत्यु हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि इन लोगों की किसी हृदय रक्त धमनी में 20 से 30 प्रतिशत रुकावट होती है, इसलिए न तो कोई लक्षण प्रकट होता है और न ही एनजाइना होता है। इनमें अचानक ‘क्लॉटिंग’ हो जाती है, जिससे अचानक ही दिल का दौरा पड़ जाता है।
  • खून में लंबे समय तक कोलेस्ट्रोल की अधिकता, धुम्रपान,ज्यादा वसा युक्त खानपान, मोटापा आदि   एनजाइना का कारण बनता है |
  • एनजाइना रोकथाम के लिए कदम और दिल के दौरे के दौरान मरीज को और उसके आसपास के लोगो को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए यह हमने पिछले लेखो में विस्तार से बता दिया था | पढ़ें यह पोस्ट – हार्ट अटैक के लक्षण, कारण, बचाव और फर्स्ट एड

एनजाइना (एंजाइना) की जाँच

  • हृदय धमनियों में रुकावट का पता लगाने के लिए सामान्य ई. सी.जी. की जाती है, जिसमें यह पता चलता है कि बैठने या लेटने की स्थिति में मरीज की ई.सी.जी. में क्या परिवर्तन हुए हैं। इससे पुराने हार्ट अटैक या नाड़ियों में रक्त की कम सप्लाई का भी पता चल जाता है।
  • एनजाइना के रोगी में हृदय धमनी में 60 से 80 प्रतिशत अवरोध (ब्लॉकेज) होता है। इन रोगियों का ट्रेड मील टेस्ट करना जरूरी होता है, क्योंकि इसी से ब्लॉकेज की सही स्थिति का पता चलता है। ट्रेड मील टेस्ट करने के लिए रोगी को ई.सी.जी. लगाकर पट्टे पर लिटाया जाता है और ‘टार्गेट हार्ट रेट’ से यह पता किया जाता है कि हृदय पर कितना दबाव पड़ रहा है। इसमें ई.सी.जी. में हृदय में आए बदलाव का पता चल जाता है।
  • बेटल टेस्ट स्ट्रेस हैवियन नामक आधुनिक तकनीक में मरीज के रक्त में रेडियो सक्रिय पदार्थ डालकर गामा कैमरे से हृदय की रंगीन तसवीर ली जाती है। इसके बाद एंजियोग्राफी की जाती है। एंजियोग्राफी में हृदय की धमनियों में दवा डालकर इसकी एक्स-रे ली जाती है।
  • हृदय में एक नाड़ी दाहिनी तरफ तथा दो नाड़ियाँ बाई तरफ होती हैं। एंजियोग्राफी से यह पता चल जाता है कि नाड़ियों में ब्लॉकेज है या नहीं। अगर ब्लॉकेज है तो किस नाड़ी में है, कितनी नाड़ियों में है, कितना प्रतिशत है, कितनी लंबाई में है और कितनी जगह पर है। इसी के आधार पर यह तय किया जाता है कि बैलूनिंग करनी है, ऑपरेशन करना है या दवा से इलाज करना है।
  • इस तरह एंजियोग्राफी हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज पता करने का सबसे अच्छा तरीका है। कुछ वर्ष पहले तक एंजियोग्राफी बहुत खतरनाक मानी जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। एंजियोग्राफी करने से 10 हजार लोगों में से 1 व्यक्ति की मौत हो सकती है या उसे कोई समस्या हो सकती है।
  • एंजियोग्राफी करने में 10-50 मिनट का समय लगता है। इसमें व्यक्ति को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है। वैसे एकाध मामलों में व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ सकता है।
  • एंजियोग्राफी के दौरान एक दवा हृदय धमनियों में डाली जाती है। इस दवा की मात्रा करीब 50-60 सी.सी. होती है। इसके बाद कई दिशाओं में धमनियों की ‘एक्स-रे’ तसवीरें ली जाती हैं। लेकिन इसका पता लगाने की परंपरागत तकनीक-एंजियोग्राफी इतनी महँगी और मुश्किल है कि ज्यादातर लोग एंजियोग्राफी कराने से बचना चाहते हैं अथवा और कोई विकल्प न रहने पर ही अंतिम समय में एंजियोग्राफी कराते हैं, तब तक स्थिति गंभीर हो चुकी होती है।
  • मेट्रो हार्ट इंस्टीच्यूट ने दिल की रक्त-धमनियों में जमाव का समय से पहले ही पता लगाने के लिए अत्यंत सरल एवं सस्ती विधि विकसित कर ली है, इसे “Metro coronary screening’ नाम दिया गया है और इसकी मदद से रक्त-धमनियों में 50 प्रतिशत से भी कम की रुकावट का पता लगाया जा सकता है।
  • रक्त-धमनियों में रुकावट का समय से पहले पता लग जाने से मरीज खान-पान पर नियंत्रण रखकर तथा नियमित व्यायाम करके हृदय रोगों पर काबू रख सकता है।

एनजाइना तथा ब्लोकेज के उपलब्ध आधुनिक उपचार

  • एनजाइना के उपचार में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि कितनी नसों में ब्लॉकेज है और कितनी मात्रा में है।
  • अगर रोगी की रक्त-धमनियों में रक्त के थक्के के कारण ब्लॉकेज है तो कितने क्षेत्र में दिल का दौरा पड़ सकता है? दिल का दौरा पड़ने पर कितना खतरा हो सकता है?
  • उदाहरण के लिए, अगर दाहिनी धमनी की एक शाखा में ब्लॉकेज हो और रोगी को एनजाइना हो तो उसकी कोई अहमियत नहीं है। अगर इस नाडी में ब्लॉकेज या क्लॉटिंग हो भी गई तो रोगी की छाती में हलका दर्द होगा, मामूली सा हार्ट अटैक होगा और रोगी ठीक हो जाएगा। लेकिन अगर ब्लॉकेज मुख्य नाड़ी की शुरुआत में हो और ब्लॉकेज 70 प्रतिशत से अधिक हो तो उसमें क्लॉट होने पर रोगी को बड़ा हार्ट अटैक हो सकता है, यहाँ तक कि इसमें रोगी की मृत्यु भी हो सकती है; क्योंकि हार्ट अटैक के 7-10 प्रतिशत रोगियों की मौत हो जाती है।
  • अगर एक-दो नाड़ियों में ब्लॉकेज हो तो एंजाइना का इलाज एंजियोप्लास्टी, बैलूनिंग या स्टेटिंग द्वारा की जाती है। अगर तीनों नाड़ियों में ब्लॉकेज हो तो बाईपास सर्जरी का सहारा लेना पड़ जाता है।
  • अगर ब्लॉकेज का आकार एक-डेढ़ मिलीमीटर से छोटा हो तो लेजर तकनीक से हृदय की मांसपेशियों में कई छेद करके उनमें वैकल्पिक रक्त की आपूर्ति की जाती है।
  • लेजर तकनीक में हृदय की मांसपेशियों में तीन से चार माइक्रोन व्यास के 10 से 15 बारीक छेद किए जाते हैं। ये छिद्र उसी क्षेत्र में किए जाते हैं, जहाँ रक्त की आपूर्ति करनी होती है।
  • लेकिन लेजर तकनीक उन्हीं रोगियों में अपनाई जाती है जिनमें अन्य तकनीकों का इस्तेमाल या तो नहीं हो सकता या अन्य तकनीकें कारगर साबित नहीं हो । स्टेंट आने के बाद से एंजियोप्लास्टी में यह खतरा बहुत कम हो गया है। इससे पहले बैलूनिंग करने पर छह महीने के बाद हृदय की धमनियों में दोबारा अवरोध उत्पन्न होने की संभावना 35-40 प्रतिशत लोगों में होती थी, लेकिन स्टेंट डालने पर 15-20 प्रतिशत लोगों में ही ऐसी संभावना होती है।
  • चूँकि स्टेंट के बाद बैलूनिंग अथवा बाईपास करना मुश्किल होता है, इसलिए 15-20 प्रतिशत रोगियों में अवरोध पैदा होने की आशंका को भी दूर करने का प्रयास हो रहा है।
  • यह देखा गया है कि जिस तरह कैंसर के मरीजों को रेडियो थेरैपी दी जाती है, उसी तरह से अगर स्टेंट पर इरीडियम या स्ट्रांसियम जैसे रेडियो सक्रिय पदार्थ बहुत कम मात्रा में लेपित कर दिए जाएँ तो स्टेंट डालने के बाद रक्त वाहिनियों में दोबारा अवरोध पैदा होने की आशंका पहले की तुलना में घटकर आधी, करीब 8 प्रतिशत, रह जाती है। इस तरह सावधानी से एंजियोप्लास्टी करने पर, ताकि दोबारा अवरोध होने की आशंका 10 प्रतिशत से कम हो, कई मामलों में बाईपास सर्जरी करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • एंजियोप्लास्टी के बाद मरीज अधिक-से-अधिक एक सप्ताह में सामान्य हो जाता है, जबकि बाईपास सर्जरी में मरीज को सामान्य होने में दो से तीन महीने लग जाते हैं।
  • इन तकनीकों एवं कारगर उपचार विधियों की उपलब्धता के बावजूद हृदय रोगों से बचे रहने के लिए सावधानी बरतना ही उचित है।
  • नियमित व्यायाम करके, वजन पर नियंत्रण रखकर, धूम्रपान न करके, ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखकर, कम नमक का सेवन करके तथा तनाव से दूर रहकर हृदय रोगों से काफी हद तक बचे रहना संभव है।
  • एनजाइना दिल के दौरे का शुरुवाती लक्षण है। इसलिए अगर समय पर इसकी पहचान करके बंद हृदय की रक्त-धमनियों को खोलने के उपाय शुरू कर दिए जाएँ तो दिल के दौरे अथवा मरीज की मृत्यु की आशंका को दूर किया जा सकता है।
  • सामान्य तौर पर बाईपास सर्जरी अथवा कोरोनरी आर्टरी बाईपास ग्राफ्ट (सी.ए. बी.जी.), स्टेंट और स्टेंट के बिना बैलून एंजियोप्लास्टी अर्थात् परक्यूटेनियस, ट्रांसल्यूमिनल कोरोनरी एंजियोप्लास्टी (पी.टी.सी.ए.) जैसी विधियों का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
  • हाल में इसके गंभीर रोगियों के इलाज के लिए लेजर आधारित ट्रांस मायोकार्डियल रिवैसकुलराइजेशन (टी.एम.आर.) तकनीक का विकास हुआ हैं। जाने क्या है बाईपास सर्जरी-Open Heart & Bypass Surgery
  • आज कोरोनरी एंजियोप्लास्टी के क्षेत्र में विकसित विभिन्न नवीनतम तकनीकों की मदद से बिना हृदय की सर्जरी की आवश्यकता समाप्त हो गई है। आज ऑपरेशन के बिना एक या एक से अधिक धमनियों में बहुत अधिक सँकरापन को पूरी कामयाबी के साथ दूर किया जा सकता है और मरीज को दोबारा जीवन दिया जा सकता है।
  • इन धमनियों में सँकरापन कम होने पर दवाइयों, खान-पान में सुधार लाकर एवं दिनचर्या में बदलाव लाकर स्थिति पर काबू पाने की कोशिश की जाती है लेकिन जब सँकरापन 70 प्रतिशत या उससे अधिक हो तो इसे जल्द से जल्द दूर करना पड़ता है, क्योंकि ऐसे में रोगी को दिल का जानलेवा दौरा पड़ने का खतरा रहता है। यह भी पढ़ें – हृदय रोग के कारण,लक्षण और बचाव की जानकारी
  • कोरोनरी एंजियोप्लास्टी के लिए जाँघ के ऊपरी हिस्से में खास दी जगह, (ग्रोइन क्षेत्र) से गुजरनेवाली फिमोरल धमनी में पतली ट्यूब की तरह का अत्यंत महीन एवं मुलायम कैथेटर डाला जाता है। यह फ्लोरोस्कोप से जुड़ा होता है, ताकि धमनी की अंदरूनी स्थिति को देखा जा सके। कैथेटर को सरकाते हुए महाधमनी के उस हिस्से तक ले जाया जाता है, जहाँ से हृदय धमनियाँ शुरू होती हैं। जिस धमनी में सँकरापन एवं अवरोध होता है उसमें इसे प्रवेश कराया जाता है। अब इस कैथेटर के भीतर गाइड वायर नामक पतली एवं लचीली तार डाली जाती है। इसे खिसकाकर इसके एक सिरे को हृदय धमनी में ब्लोकेज वाली जगह पर ले जाया जाता है। इस गाइड वायर के जरिए पिचका हुआ गुब्बारा सँकरे स्थान तक ले जाकर फुलाया जाता है, जिससे धमनी के सँकरे स्थान पर दबाव पड़ता है और वसा की परतें दब जाती हैं। इससे उस धमनी में फिर से खून का चलना शुरू हो जाता है। यह कोरोनरी एंजियोप्लास्टी का बुनियादी तरीका है |
  • आजकल विकिरण थेरैपी से मिलती-जुलती तकनीक का इस्तेमाल लेजर रोगियों के इलाज के लिए हो रहा है। यह है लेजर चिकित्सा |
  • लेजर चिकित्सा के लिए कार्बन डाइऑक्साइड लेजर का प्रयोग होता है। इससे उन मरीजों का भी इलाज हो सकता है, जिनकी हृदय की धमनियाँ इतनी रूक जाती हैं कि उन्हें किसी भी पारंपरिक चिकित्सा विधियों से पुनर्जीवित करना मुश्किल होता है। यह उन मरीजों के लिए भी वरदान है, जिन्हें हृदय का दौरा पड़ चुका हो और उन्हें जीवन-दान देने के लिए कई बार बाईपास सर्जरी की जा चुकी हो। इस तकनीक की मदद से हृदय की मांसपेशियों में 1 मिलीमीटर व्यास के छिद्र बनाए जाते हैं। इसके लिए मरीज को बेहोश करके छाती के बाई ओर छेद करके हृदय तक पहुँचने का रास्ता बनाया जाता है। हृदय की रुकी नसों का पता लगाकर उस पर लेजर किरणें डाली जाती हैं।
  • धमनी के सँकरे भाग को साफ करने के बाद अकसर यह खतरा बना रहता है कि वहाँ वसा दोबारा न जम जाए। इस समस्या को दूर करने के लिए कोरोनरी स्टेंट का प्रयोग शुरू हुआ है। ये स्टेंट इस्पात अयस्क के बने होते हैं और आकार में गोल होते हैं। इन्हें कोरोनरी एंजियोप्लास्टी की विधि से ही धमनी के सँकरे भाग तक फैलाकर फुला दिया जाता है और उसे वहीं अटकाकर छोड़ दिया जाता है।

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