टीबी की बीमारी में भोजन : जानिए लाभदायक फल और सब्जियां

क्षय रोग, तपेदिक, या टी.बी से सब एक ही बीमारी के अलग-अलग नाम हैं | क्षय का मतलब होता है गल जाना और इस रोग में वास्तव में यही होता है, जहाँ भी टी.बी होता वह हिस्सा खोखला हो जाता है, खराब हो जाता है। टीबी की बीमारी में सही भोजन का चुनाव इसलिए बेहद जरुरी हैं क्योंकि जब तक शरीर को सही पोषण नहीं मिलेगा तब तक मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं बढ़ेगी जो इस रोग के विषाणुओं को खत्म करने के लिए बेहद जरुरी है | इस आर्टिकल में हम केवल उन फलों और सब्जियों के विषय में बतायेंगे जो टीबी की बीमारी में रोगी को खानी चाहिए |

टीबी की बीमारी में कौन-कौन से फल और सब्जियां खाएं

b ki bimari me fruits and vegetables टीबी की बीमारी में भोजन : जानिए लाभदायक फल और सब्जियां

टीबी की बीमारी में फल और सब्जियां

  • अंगूर– टीबी की बीमारी में अंगूर का सेवन करना चाहिए यह मरीज के लिए बहुत फायदेमंद है |
  • मुनक्का-मुनक्का, पीपल, देशी शक्कर ये तीनों समान भाग पीस कर एक चम्मच सुबह-शाम खाने से (टी.बी .) में होने वाली खाँसी से आराम मिलता है।
  • नारियल–रोजाना 25 ग्राम कच्चा नारियल खाने से या पीस कर पीने से टीबी के कीटाणुओं का नाश होता है तथा फेफड़ों को ताकत मिलती है।
  • टीबी की बीमारी में खजूर खाना भी फायदेमंद होता है -आठ खजूर दो बार खाना टीबी रोगियों के लिए लाभदायक है।
  • लौंग-लौंग का सेवन भी टी बी रोग में फायदेमंद है। यह भोजन के बाद लें।
  • गाजर-टी.बी में गाजर का रस पीना लाभदायक है, इसमें भोजन के सभी सन्तुलित तत्त्व होते हैं।
  • केला—केले के पेड़ का ताजा रस या सब्जी बनाने वाला कच्चा केला टीबी की बीमारी में मरीज को लाभ देता है। जिसे टी.बी हो चुका हो, कष्टदायक खाँसी होती हो, जिसमें अधिक मात्रा में बलगम निकलता हो रात को इतना पसीना आता हो कि सब कपड़े भीग जायें, साथ ही बहुत तेज बुखार रहता हो, दस्त आते हों, भूख न लगती हो, उनको केले के मोटे तने के टुकड़े का रस निकाल और छानकर एक-दो ताजा कप रस हर दो घण्टे बाद घूंट घूंट करके पिलाया जाये। तीन दिन यह रस बराबर पिलाने से रोगी को बहुत लाभ होगा। दो माह तक इस चिकित्सा से टी.बी की बीमारी में बहुत फायदा मिल सकता है। केले का रस हर 24 घण्टे के बाद ताजा ही निकालना चाहिए।
  • 8-10 केले के पत्ते 200 मिली लीटर पानी में डालकर पड़ा रहने दें। इस पानी को छानकर एक बड़ा चम्मच दिन में तीन बार पिलाते रहने से फेफड़ों में जमी गाढ़ी बलगम पतली होकर निकल जाती है। केले के पत्ते का रस शहद में मिलाकर टीबी की बीमारी में रोगी को पिलाते रहने से भी उसके फेफड़ों के घाव भर जाते हैं और फेफड़ों से खून आना रुक जाता है। केले के तने न हों तो केले के पत्तों का रस इसी प्रकार काम में ले सकते हैं।
  • प्याज– टीबी की बीमारी में मरीजो के लिए बहुत सालों पहले इंगलैण्ड के डॉ. पर्स कच्चा प्याज बताया करते थे। डॉ. डब्ल्यू.सी. मिनचेन ने कहा है कि शरीर पर टी बी के कीटाणुओं के हमले को प्याज का रस खत्म कर देता है। कच्चे प्याज को खाने से भी समान प्रभाव होता है। यह स्वास्थ्यरक्षक, कीटाणुनाशक है। कच्चे प्याज पर नमक डालकर खाने से टीबी की बीमारी में लाभ होता है।
  • तपेदिक रोग में बलगम आना बन्द करने के लिये चौथाई कप प्याज का रस इतना ही पानी मिला कर पीयें। छोटे-छोटे टुकड़े करके एक गिलास पानी में डाल कर उबालें। आधा पानी रहने पर छान कर पिलायें। बलगम आना बन्द हो जायेगा।
  • टीबी की बीमारी में लहसुन भी है बहुत काम की चीज – डॉ. ई.पी. एन्शूज होम्योपैथ ने लिखा है कि लहसुन खाने वालों को टी.बी नहीं होता। इसके प्रयोग से क्षय के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। टी.बी के मरीजो के लिए लहसुन एक वरदान है। हर प्रकार के तपेदिक को दूर करने के लिए लहसुन अमृत से कम नहीं है। लहसुन में सल्फ्यूरिक एसिड अच्छी मात्रा में होता है, जो टी बी के कीटाणुओं को खत्म करता है।
  • फेफड़े की टीबी में लहसुन के प्रयोग से कफ गिरना कम होता है रात को निकलने वाले पसीने को रोकता है, भूख बढाता है और नींद भरपूर लाता है। फेफड़े में क्षय होने पर लहसुन के रस से रुई डुबोकर इसे सूंघना चाहिए ताकि साँस के साथ मिलकर इसकी गन्ध फेफड़ों तक पहुँच जाय। इसे बहुत देर तक सूंघना रहना चाहिए। इसकी तेज़ महक ही है, जो प्रबल-से-प्रबल कीटाणुओं, कृमियों तथा टी.बी जैसे रोगों को मिटाती है। खाना खाने के बाद लहसुन का सेवन भी करना चाहिए।
  • आंतों में टी.बी रोग होने पर लहसुन का रस आठ बूंद 12 ग्राम पानी में पिलायें ।
  • लौकी– ताजा लौकी पर जौ के आटे का लेप करें तथा कपड़ा लपेटकर आग में दबा दें। जब भुर्ता हो जाये तो पानी निचोड़ कर अपनी क्षमता के हिसाब से पीते रहें। एक महीने पिलाने से टीबी की बीमारी में मरीज को बहुत फायदा मिलेगा |
  • मक्का— जिन लोगो को शुरुवाती टीबी हैं उन्हें मक्का की रोटी खानी चाहिए।
  • अखरोट–अखरोट और लहसुन समान मात्रा में पीसकर गाय के घी में भूनकर सेवन करने से टीबी की बीमारी में लाभ होता है।
  • शहद– 25 ग्राम शहद, 100 ग्राम मक्खन में मिलाकर रोगी को देना चाहिए।
  • दूध–एक गिलास दूध में 5 पीपल डाल कर उबालें और फिर ठंडा होने पर चीनी डालकर रोजाना सुबह-शाम पीयें। इससे खाँसी, जुकाम, दमा, फेफड़े की कमजोरी, शुरुवाती टी.बी में लाभ होता है।
  • नींबू – टीबी में जिन्हें लगातार बुखार रहता हो, उन्हें 11 पत्ती तुलसी, नमक, जीरा, हींग, एक गिलास गरम पानी में नींबू का रस 25 ग्राम मिलाकर तीन बार कुछ दिन पीना चाहिए।
  • सेब– सेब खाना टीबी की बीमारी में लाभदायक है। आँतों, पेट और मस्तिष्क के लिए लाभदायक है।
  • आम– एक कप आमरस में 60 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम दो बार रोजाना पीयें। रोजाना तीन बार गाय का दूध पीयें। इस प्रकार 21 दिन करने से टीबी की बीमारी में विशेष लाभ होता है।
  • यदि आप टी.बी का उपचार ले रहे है तो अपने खानपान में बदलाव करने से पहले अपने चिकित्सक से सलाह जरुर लें|

हालाँकि तपेदिक रोग के कारण, लक्षण और इस बीमारी के रोगी को “क्या खाना चाहिए और क्या नहीं” यह पहले ही बता चुके है फिर भी संक्षेप में एक नज़र इसके कारणों पर डाल लेते है |

टीबी की बीमारी के लक्षण-

  • रोगी को खाँसी रहना, दिन-रात बुखार बने रहना और शाम को बुखार बढ़ना, भूख की कमी, छाती में दर्द, साँस लेने में कष्ट, दुर्बलता और शरीर की कमजोरी बढ़ते जाना, पीला कफ, कभी-कभी कफ में रक्त आना, खाँसी से गले में घाव होकर आवाज बैठ जाना, रात को पसीना आना ये सब यक्ष्मा के लक्षण है।
  • यह बीमारी बड़ों से अधिक बच्चों में पायी जाती है। बच्चों के नाजुक फेफड़े व कोमल साँस की नलियाँ, टी.बी . जीवाणुओं के लिए आसान शिकार होती हैं। बच्चों में टी.बी . के लक्षण वयस्कों से अलग नहीं हैं। कई बार तो भूख न लगना, वजन गिरना, अधिक थकावट, हल्का बुखार ही केवल लक्षण दिखते हैं। बार-बार जुखाम, खाँसी व साँस की बीमारी होने वाले बच्चों में टीबी की बीमारी का इलाज बहुत जरुरी है। गले में गाँठे (कंठमाला) बच्चों में टी.बी का एक खास लक्षण है।
  • शरीर के प्रभावित अंग : सबसे अधिक टी.बी . का असर फेफड़ों पर होता है। अन्य प्रभावित होने वाले अंगों में हड्डियाँ, आँते, टांसिल्स, चमड़ी, गुर्दे व प्रजनन-अंग सम्मिलित हैं। आँतो की टी.बी में पेट में गैस का गोला बनना, बदहजमी, पेट फूलना, खास लक्षण हैं। गुर्दो की टी.बी में पेशाब में खून आना और गुर्दो में सूजन आना खास संकेत हैं। टीबी की बीमारी से बचाव के लिए शिशुओ को बी.सी.जी. का टीका एक बार लगवाने से जीवन भर टी.बी से बचाव होता है। यह टीका एक दिन की उम्र के शिशु से लेकर जीवन भर कभी भी लगाया जा सकता है। एक्स-रे कराने से इस रोग का पता लग जाता है।
  • टीबी की बीमारी के कारण :- टी.बी के टुबरकिल बैसीलस नामक जीवाणु रोगी के कफ या थूक में होते हैं, जिनसे यह रोग हवा, पानी, दूध द्वारा फैलता है। दूषित हवा, गीले स्थान, साँस के साथ धूल कण जाना, शक्ति से ज्यादा मेहनत, अधिक सन्तान को जन्म देना, शराब पीना, टी.बी के रोगी के द्वारा आदि कारणों से यह रोग फैलता है।
  • टी बी का इलाज – टीबी की बीमारी के उपचार में सबसे मुख्य बात यह है कि दवा एक दिन भी नहीं छोड़नी चाहिए, अधिकतर रोगी डेढ़ दो-महीनो बाद जब टी.बी के लक्षण खत्म होने लगते हैं, तब दवा लेना बंद कर देते हैं। इसीलिए धीरे-धीरे आगे चलकर ऐसे रोगियों में कई जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं व कई बार ये जानलेवा साबित हो सकती हैं। चिकित्सक के बताए अनुसार नियमित रूप से निर्धारित समय तक इलाज सुचारु रूप से किया जाए तो रोग से पूरी तरह छुटकारा मिल जाता है व बीमारी जड़ से खत्म हो जाती है।
  • टीबी की बीमारी में भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए, बल्कि भोजन को ही चिकित्सा समझना चाहिए। सूर्य का प्रकाश, स्वच्छ हवा, पौष्टिक भोजन तथा पूरा आराम मिलना रोगी के लिए सबसे जरुरी है। शराब और धूम्रपान से सख्त परहेज रखना चाहिए। टी.बी . के रोगियों को ऊपर बताई गई चीजें देने से बहुत लाभ होता है |

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