पतंजलि दिव्य वटी : यौवनामृत, शिलाजीत रसायन,अश्वगंधा कैप्सूल के लाभ

इस लेख में पतंजलि आयुर्वेद द्वारा निर्मित पतंजलि दिव्य वटी , क्वाथ और कैप्सूल की जानकारी दी गयी है | साथ ही यह भी बताया गया है की इन औषधियों का सेवन कैसे करें और क्या परहेज रखें ? इस लेख में पतंजलि आयुर्वेद के निम्नलिखित उत्पादों की जानकारी दी गयी है |

  • पतंजलि दिव्य वटीयौवनामृत के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य वटी वृक्कदोषहर के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य वटी शिलाजीत रसायन के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य वटी स्त्रीरसायन के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य वटी हृदयामृत के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य अश्वगंधा कैप्सूल के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य अश्वशिला कैप्सूल के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य शिलाजीत कैप्सूल के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य अश्मरीहर क्वाथ के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य कायाकल्प क्वाथ के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य पीड़ान्तक क्वाथ के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य मेधा क्वाथ के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य वृक्कदोषहर क्वाथ के लाभ और सेवन विधि
  • पतंजलि दिव्य सर्वकल्प क्वाथ के लाभ और सेवन विधि

पतंजलि दिव्य वटी यौवनामृत, वृक्कदोषहर, हृदयामृत, स्त्रीरसायन के लाभ :

पतंजलि दिव्य वटी Patanjali divya vati capsule kwath benefits

Patanjali Products

पतंजलि दिव्य यौवनामृत वटी :

मुख्य घटक :

जावित्री, जायफल, केशर, सफेद मूसली, स्वर्ण भस्म, कौंच के बीज, अकरकरा, बलाबीज, शतावर, मकरध्वज आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • ढ़लती आयु या थके कमजोर शरीर वालों के लिए यह अत्यन्त बलवर्धक और पुष्टिकारक है।
  • यह वटी दिल और दिमाग को शक्ति देने वाली, शुक्राणु अल्पता तथा शरीर में स्फूर्ति बढ़ाने वाली और वाजीकारक है।
  • नशीली वस्तु का सेवन किए बिना शुक्राणुवर्धक, अत्यन्त बलवर्धक, पुष्टिकारक, वाजीकरण, ओज, तेज, कान्तिवर्धक, नपुसकता नाशक व शक्ति देने वाली सर्वोत्तम औषध है।

यौवनामृत वटी सेवनविधि तथा मात्रा : 1 या 2 गोली प्रात: नाश्ते व सायं खाने के बाद दूध के साथ सेवन करें।

पतंजलि दिव्य वृक्कदोषहर वटी के लाभ :

मुख्य घटक :  ढाकफूल, पित्तपापडा, पुनर्नवामूल, पाषाणभेद, वरुण छाल, कुलथी, अपामार्ग, कासनी, पीपल छाल, नीम छाल, मकोयदाना, गोखरू दाना, अमलतास गूदा, बलामूल आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इसका सेवन वृक्कदोष, शोथ, मूत्राश्मरी आदि में लाभदायक होता है।
  • Chronic Renal failure की बीमारी में लाभ मिलता है।
  • सेवनविधि व मात्रा : आवश्यकतानुसार एक से दो गोली दिन में दो बार वृक्कदोषहर क्वाथ से लेने से विशेष लाभ मिलता है।
  • नोट : इसका सेवन चिकित्सक को परामर्शानुसार करना उचित रहेगा।

पतंजलि दिव्य शिलाजीत रसायन वटी के लाभ :

मुख्य घटक : शिलाजीत, अश्वगन्धा, भूमि आँवला, त्रिफला आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इस वटी का प्रभाव वातवाहिनी नाडी तथा वृक्क (मूत्र-पिण्ड) एवं वीर्यवाहिनी शिराओं पर विशेष होता है।
  • यह वातसायंक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक है। इसके सेवन से स्वप्नदोष, प्रमेह, श्वेतप्रदर आदि में विशेष लाभ होता है।

सेवनविधि व मात्रा : 2–2 गोली दूध अथवा गुनगुने जल के साथ भोजनोपरान्त लें।

पतंजलि दिव्य स्त्रीरसायन वटी के लाभ :

वटी मुख्य घटक : श्वेत चन्दन,कमल, दारू हल्दी, मुलेठी, पारस पीपल, बला बीज, आँवला, अशोक, नागकेशर, अश्वगंधा, देवदारु, शुद्ध गुग्गुलु आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • सम्पूर्ण स्त्री रोगों जैसे श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, मासिकधर्म की अनियमितता या कटि-पेडू की पीड़ा आदि में विशेष लाभप्रद है।
  • अतिमासिकस्राव में विशेष उपयोगी है। कुछ समय सेवन करने से समस्त स्त्रीरोग दूर हो जाते हैं।
  • चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ना, आँखों के नीचे कालिमा, हर समय शरीर में थकान व आलस्य । जैसे विकारों को दूर करने में स्त्रीरसायन वटी अत्यधिक सहायक है।

सेवनविधि व मात्रा : 1 से 2 गोली दिन में दो से तीन बार खाने के बाद दूध या पानी से लें।

पतंजलि दिव्य हृदयामृत वटी के लाभ :

मुख्य घटक : अर्जुन छाल, अमृता, अश्वगन्धा, रास्ना, निर्मुण्डी, पुनर्नवा, चित्रक, नागरमोथा आदि का घनसत् (एक्सट्रेक्ट), हीरक भस्म, अकीक पिष्टी, संगेयशव पिष्टी, मुक्ता पिष्टी,चाँदी भस्म, शिलाजीत सत्व शुद्ध गुग्गुलु आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इसके सेवन से हृदय को ताकत मिलती है। इससे हृदय की धमनियों के अवरोध (ब्लॉकेज) दूर होते हैं। बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल का नियमन होता है।
  • बार-बार उठने वाले हृदय शूल (एञ्जाइना) में भी यह तुरन्त प्रभावकारी है।
  • हृदय की कोशिकाओं को क्रियाशील बना देती है। बेचैनी, घबराहट को दूर कर हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाती है।
  • यह हृदय को अन्दर आई हुई अवरुद्धता (ब्लोंकोज) को दूर करको हृदय को स्वस्थ रखने में अत्यन्त सहयोगी है।
  • यदि आप हृदय का ऑपरेशन करा चुके हैं तो भी हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आप दिव्य हृदयामृत वटी का सेवन कर सकते हैं।

मात्रा व अनुपान :

  • 1 से 2 गोली प्रात: व सायं दूध या गुनगुने पानी अथवा अर्जुन छाल के क्वाथ के साथ लें। अर्जुन छाल 2 से 3 ग्राम लेकर उसको एक कप दूध व एक कप पानी में पकाएं और जब एक कप शेष रह जाय तब छानकर पीना या अर्जुन क्वाथ (काढ़ा) पानी में पकाकर पिया जा सकता है।
  • यदि आप हृदय के लिए एलोपैथिक औषध प्रयोग कर रहे हैं तो जैसे-जैसे हृदयामृत के सेवन से आपका हृदय स्वस्थ होता जाए वैसे-वैसे अंग्रेजी औषधियों को डॉक्टर के परामर्श से कम कर दें।

पतंजलि दिव्य अश्वगंधा कैप्सूल के लाभ :

मुख्य घटक : अश्वगंधा घनसत् इत्यादि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इसके सेवन से शारीरिक दुर्बलता, मानसिक तनाव, अनिद्रा आदि रोगो में लाभ होता है।
  • यह मस्तिष्क तथा हृदय को बल प्रदान करता है।
  • यह स्नायु दौर्बल्य तथा वात विकारों को दूर करने वाली श्रेष्ठ औषधि है।

अश्वगंधा का सेवन कैसे करें = 1 से 2 कैप्सूल प्रतिदिन प्रात:-सायं नाश्ते या खाने के बाद दूध या जल के साथ सेवन करें।

पतंजलि दिव्य अश्वशिला कैप्सूल के लाभ :

मुख्य घटक : अश्वगंधा घनसत्, शिलाजीत सत् इत्यादि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • यह थकान, तनाव, यौन दौर्बल्य, अस्थमा, जोड़ों का दर्द, मधुमेह जन्य दौर्बल्य, धातु रोग, मूत्र-विकार तथा शारीरिक दौर्बल्य में लाभप्रद है।
  • यह यौन विकारों को दूर करने की निरापद व प्रभावशाली औषधि है।
  • इसमें उपस्थित अश्वगन्धा तनाव व थकान को दूर करता है तथा शिलाजीत शुक्रधातु का पोषण कर मधुमेह तथा यौन दौर्बल्य को दूर कर जीवनीय शक्ति का संचार करता है।
  • यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

पतंजलि शिलाजीत कैप्सूल का सेवन कैसे करे -: 1 से 2 कैप्सूल दिन में 2 बार दूध के साथ भोजन के उपरान्त सेवन करें।

पतंजलि दिव्य शिलाजीत कैप्सूल के लाभ :

मुख्य घटक : शिलाजीत सत् इत्यादि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इसका सेवन क्लैब्य (नपुंसकता ), स्नायु-विकारों एवं रक्तमेह (यदि शुगर का स्तर बढ़ा हो तो) में अति लाभकारी होता है।
  • यह मूत्र-विकारों में लाभकारी है।
  • जिनको उच्च रक्तचाप की समस्या हो तो उन्हे इसे कम मात्रा में या चिकित्सक के परामर्शानुसार सेवन करना चाहिए।
  • यह मासपेशियों को ताकत प्रदान करता है।
  • यह यौन-दुर्बलता, वातज-विकारों, कफज-विकारों, धातुरोगों तथा मूत्र-विकारों में लाभप्रद व जीवनीय-शक्ति को बढ़ाने वाला है।

सेवनविधि व मात्रा : 1 से 2 कैप्सूल दिन में 2 बार दूध के साथ भोजन के उपरान्त सेवन करें।

पतंजलि दिव्य अश्मरीहर क्वाथ के लाभ :

मुख्य घटक : पाषाणभेद, वरुण, पुनर्नवा, गोक्षुर।

मुख्य गुण-धर्म :

  • दिव्य अश्मरीहर क्वाथ आयुर्वेद में वर्णित मूत्रल एवं अश्मरी भेदन वनस्पतियों से निर्मित है। इसका सेवन मुख्य रूप से वृक्काश्मरी में अति लाभदायक है।
  • अश्मरीहर क्वाथ का प्रयोग पिताश्मरी में भी किया जाता है। इसके अतिरिक्त समस्त मूत्र-विकारों जैसे मूत्रकृच्छू, मूत्रदाह आदि में भी इसका सेवन लाभकारी है।

सेवनविधि व मात्रा : एक चम्मच या 5 ग्राम क्वाथ को लेकर 400 मिली पानी में पकाएं। जब एक चौथाई शेष रह जाय तब छानकर ठण्डा करके प्रात: सायं खाली पेट लें।

पतंजलि दिव्य कायाकल्प क्वाथ के लाभ :

मुख्य घटक : मुख्य घटक : गिलोय, चिरायता, कुटकी, चन्दन, देवदारु, उषब, द्रोणपुष्पी आदि।

मुख्य गुण-धर्म : .

  • इस क्वाथ का सेवन सब प्रकार के चर्मरोग, एग्जिमा, कुष्ठ, श्लीपद आदि रोगों में अत्यन्त लाभकारी है।
  • इससे पेट भी साफ होता है। मोटापा कम करने में भी यह सहयोग करता है।
  • चर्मरोग के लिए कायाकल्प वटी और मोटापे के लिए मेदोहर वटी के साथ इसका सेवन करें।

सेवनविधि :

  • 5 से 10 ग्राम क्वाथ को लगभग 400 मिली पानी में पकाकर जब लगभग 100 मिली शेष रह जाय तब छानकर प्रात: खाली पेट व रात्रि को भोजन से लगभग 1 घण्टा पहले पिएं। इसका स्वाद कड़वा है।
  • यदि आपको मधुमेह नहीं है तो शहद या मिश्री मिलाकर भी पी सकते हैं। यदि काढ़ा अधिक मात्रा में न पीया जाय, तो ज्यादा उबालें और कम जल शेष रहने पर छानकर पीयें।
  • नोट : क्वाथ को पकाने से पहले लगभग 8-10 घण्टे भिगोकर रखना अधिक गुणकारी होता है।

पतंजलि दिव्य पीड़ान्तक क्वाथ के लाभ :

मुख्य घटक : पिप्पली मूल, निर्मुण्डी, अश्वगन्धा, रास्ना, नागरमोथा, एरण्डमूल, सोंठ, अजवायन,

मुख्य गुण-धर्म :

  • जोड़ों का दर्द, गृध्रसी (सियाटिका), गठिया आदि सभी प्रकार की वेदनाओं व शोथ में लाभप्रद है।

प्रयोग-विधि एवं मात्रा :

  • 5 से 10 ग्राम क्वाथ को लगभग 400 मिली पानी में पकाएँ। जब लगभग 100 मिली शेष रह जाय तब छानकर प्रात: खाली पेट व रात को सोते समय पिएं।
  • किसी भी वातसायंक औषध को काढ़े के साथ सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। अतिशोथ व पीड़ा के लिए क्वाथ स्नान व सिकाई से भी विशेष लाभ होता है।

क्वाथ स्नान-विधि :

  • रोगानुसार दिये गये क्वाथ से यदि वाष्प (भाप) लेनी हो तो निर्दिष्ट औषध को 1से1.5 लीटर पानी में प्रेशर कुकर में डालकर पकाएँ। जब सीटी से वाष्प निकलने लगे, तब सीटी को हटाकर उसके स्थान पर गैस वाला रबड़ का पाइप लगा दें तथा पाइप के दूसरे सिरे से निकलती हुई वाष्प से रोगयुक्त स्थान पर वाष्प दें। पाईप के जिस सिरे से वाष्प निकलती है वहाँ कपड़ा लगाकर रखें, अन्यथा गुनगुने जल के छींटे शरीर को जला सकते हैं। उचित समय तक वाष्प लेने के बाद शेष बचे गुनगुने जल से पीड़ायुक्त स्थान पर सिकाई करें।
  • यदि वाष्प न लेना हो तो औषध को आवश्यकतानुसार 3-4 लीटर पानी में पकाएँ। जब उबलते हुए लगभग आधा पानी शेष रह जाए तो गुनगुने जल को कपड़े आदि के माध्यम से लेकर रोगयुक्त स्थान की सिकाई करें।

पतंजलि दिव्य मेधा क्वाथ के लाभ :

मुख्य घटक : ब्राह्मी, शंक पुष्पी, अश्व गंधा, जटा मांसी, मल कंगिनी, सौफ, गाजावा (गोजिह्वा) आदि।

मुख्य गुण-धर्म : जीर्ण शिरशूल, माईग्रेन (अर्धावभेदक), निद्राल्पता, अवसाद (डिप्रेशन) में अत्यन्त । लाभप्रद है। इसके सेवन से घबराहट दूर होती है तथा यह स्मृतिवर्धक है।

सेवनविधि व मात्रा : इसका काढ़ा बनाकर प्रात: व सायं पिएं। साथ में मेधावटी का सेवन करने से शीघ्र लाभ मिलता है।

पतंजलि दिव्य वृक्कदोषहर क्वाथ के लाभ :

मुख्य घटक : पाषाणभेद, गोखरू, पुनर्नवामूल, कुलथी, वरुणछाल आदि।

मुख्य गुण-धर्म :

  • इसका सेवन हमारे उत्सर्जन तन्त्र को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यह मूत्रल, शीतल व शोथहर है।
  • इसके सेवन से गुर्दे की पथरी तथा मूत्राशय की पथरी टूट-टूटकर निकल जाती है। जिनको बार-बार पथरी बनने की शिकायत हो, इसका सेवन करने पर निश्चित रूप से पथरी बननी बन्द हो जाती है।
  • इससे गुर्दे के अन्दर का इन्फैक्शन व अन्य विकार दूर होते हैं। पित्ताशय की पथरी में भी यह लाभप्रद है।

सेवनविधि व मात्रा : – दो चम्मच (लगभग 10 ग्राम) की मात्रा में क्वाथ लेकर उसे डेढ़ गिलास (आधा लीटर) पानी में पकाएँ तथा 1/4 भाग शेष बचने पर छानकर प्रात: खाली पेट तथा दोपहर को भोजन को 5-6 घण्टे बाद खाली पेट ले। इसको साथ अश्मरीहर रस को सेवन से विशेष लाभ होगा।

पतंजलि दिव्य सर्वकल्प क्वाथ के लाभ:

मुख्य घटक : पुनर्नवा, भूमिआँवला, अमलतास, मकीय आदि।

मुख्य गुण-धर्म : –

  • इस क्वाथ के सेवन का प्रभाव हमारे यकृत् को सबल बनाता है। जिससे यकृत् अपना कार्य सुचारु रूप से करने लगता है।
  • आजकल के दूषित खाने तथा दूषित पेयों (कोल्ड ड्रिक्स, चाय, कॉफी) आदि के माध्यम से शरीर के अन्दर जहरीले रसायन एकत्र होकर यकृत् की क्रियाशीलता को कम या नष्ट कर देते हैं। फलत: शरीर बीमारियों का घर हो जाता है और पीलिया उसकी अत्यन्त जटिल स्थिति Hepatitis B तथा C जैसी असाध्य अवस्था में पहुँच जाता है। सर्वकल्प क्वाथ यकृत् से सम्बन्धित उपरोक्त Hepatitis B तथा Cजैसी जीर्ण अवस्थाओं से बचाकर यकृत् को क्रियाशील बनाता है।
  • इसके सेवन से पोलिया (पाण्डु), यकृत् की वृद्धि, सूजन, मूत्राल्पता, सर्वांङ्ग-शोथ तथा पेट व पेडू में दर्द होना, भोजन का पाचन न होना, भूख न लगना आदि समस्त विकार दूर होते हैं।

सेवनविधि व मात्रा : 1 चम्मच (लगभग 5 ग्राम) क्वाथ को एक गिलास पानी (लगभग 300 मिली) में पकाकर 100 मिली जल बचने पर छानकर खाली पेट पिएं। इसी प्रकार सायंकाल खाने से एक घण्टा पहले या रात्रि को सोते समय लें। यदि पेट साफ नहीं होता हो तो पकाते समय उसमें 8-10 मुनक्का भी डाल लें।

Reference – इस पोस्ट में पतंजलि आयुर्वेद दवाओ की समस्त जानकारी बाबा रामदेव जी के दिव्य आश्रम प्रकाशन की पुस्तक (आचार्य बाल कृष्ण द्वारा लिखित “औषधि दर्शन”, मई २०१६ के २५ वें संस्करण से ली गई है)

Disclaimer – यह जानकारी केवल आपके ज्ञान वर्धन और दवाओ की जानकारी के लिए है | बिना चिकित्सक के परामर्श के दवाइयों का सेवन नहीं करना चाहिए |

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