मधुमेह की एलोपैथिक दवा के लाभ, साइड इफेक्ट्स तथा इनके सेवन में सावधानियां

इस आर्टिकल में हम आधुनिक चिकित्सा प्रणाली यानि एलोपैथिक के माध्यम से उपचार लेने वाले रोगियों को मधुमेह की एलोपैथिक दवा के सेवन से जुडी जानकारियां देंगे जिसमे इन दवाओ के लाभ, साइड इफेक्ट्स, इनको कब और किन हालात में सेवन करना चाहिए ? तथा इनके साइड इफ़ेक्ट से बचने के लिए किन-किन सावधानियों का पालन करें यह बतायेंगे | नोट :- यहाँ दी गई एलोपैथिक दवा के नाम केवल आपको समझाने के उद्देश्य से दिए गए है इनका सेवन बिना डाक्टरी की सलाह के बिलकुल ना करें |

जब किसी टाइप-2 डायबिटीज के रोगी की शुगर व्यायाम, खानपान में सुधार और वजन ठीक कर लेने के बावजूद भी सामान्य नहीं हो पाती, उस समय उपचार के लिए अधिकतर मरीज एलोपैथिक दवा का सेवन करते है जो तुरंत लाभ देने में कामयाब भी साबित होती हैं। लेकिन कई बार समय बीतने पर यह दवाएँ अपना असर खो देती हैं। ऐसे में दवा बदलना या उसकी मात्रा को बढ़ाना जरूरी हो जाता है। जैसा कि सभी दवाओं के साथ होता है, इन दवाओं के साथ भी कुछ छोटी-छोटी सावधानियाँ अमल में लानी जरूरी हैं। तो आइये सबसे पहले शुगर की इन अंग्रेजी दवाओ का परिचय करवाते है |

मधुमेह की एलोपैथिक दवा :

Madhumeh ki allopathy dava goli labh side effects मधुमेह की एलोपैथिक दवा के लाभ, साइड इफेक्ट्स तथा इनके सेवन में सावधानियां

मधुमेह की दवाइयां

  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा या शुगर की अंग्रेजी दवा का इतिहास कुछ ही दशक पुराना है। ऐसी पहली दवा की खोज सन् 1949 में हुई थी और यह सल्फा के एक रसायन से तैयार की गई थी। रासायनिक संरचना के आधार पर इसे सल्फोनिलयूरिया का नाम दिया गया था। तब से इसके कई रूप सामने आ चुके हैं- क्लोरप्रोपामाइड, टॉलब्यूटामाइड, ग्लाइबेनक्लेमाइड, ग्लाइपीजाइड, ग्लाइक्लाजाइड और ग्लाइमेपेराइड। ये दवाएँ मधुमेह की एलोपैथिक दवा का सबसे बड़ा और उपयोगी समूह है।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा का दूसरा ग्रुप कई प्रकार की मिली-जुली दवाओं का ग्रुप है। इनमें प्रमुख हैं-मेग्लीटीनाइड एनालोग दवारेपाग्लीनाइड, बाइग्वानाइड दवाएँ मेटफॉर्मिन और फेनफॉर्मिन, अल्फा ग्लूकोसाइडेस इन्हीबिटर दवा एकरबोस तथा थायाजोलीडीनडायोन दवाएँ रोजीग्लीटाजोन और पायोग्लीटाजोन।
  • हर दवा की अपनी उपयोगिता और सीमाएँ हैं। लेकिन यह दवाएँ केवल टाइप-2 डायबिटीज के उपचार में ही काम आती हैं।
  • जिन रोगियों की ब्लड शुगर व्यायाम, खानपान में सुधार और मोटापा कम करने पर भी सामान्य नहीं हो पाती, उन्हें यह दवाएँ दी जाती हैं।
  • हालाँकि टाइप-2 डायबिटीज में भी कुछ स्थितियों में इन्हें लेने से काम नहीं चलता; जैसे, जब शुगर बहुत अधिक बढ़ जाये, लीवर या किडनी ठीक से काम न कर रहे हों, मरीज का कोई बड़ा ऑपरेशन होना हो, गंभीर चोट लगी हो, रोगी को टी.बी. हो जाए या मधुमेह की एलोपैथिक दवा अपने आप की असर दिखाना बंद कर दें। इन सभी स्थितियों में मधुमेही को इंसुलिन लेनी पड़ती है फिर दवा से काम नहीं चलता है ।
  • ये दवाएँ उन महिलाओं को भी नहीं दी जातीं जो गर्भवती होती हैं। टाइप-1 डायबिटीज के रोगियों के लिए भी इनकी कोई उपयोगिता नहीं होती क्योंकि मधुमेह की एलोपैथिक दवा तभी मदद कर पाती हैं जब शरीर में इंसुलिन बन रहा हो भले ही कम मात्रा में बन रहा हो ।

मधुमेह की एलोपैथिक दवा के विभिन्न प्रकार

  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा : सल्फोनिलयूरिया ग्रुप
  • ये दवाएँ सामान्य वजन के टाइप-2 डायबिटीज रोगियों के लिए सबसे अच्छी साबित होती हैं। इनके प्रभाव से एक तो अग्न्याशय से इन्सुलिन के निकलने की क्रिया ठीक हो जाती है, दूसरा इंसुलिन का असर भी पहले से तेज हो जाता है। यह दवा भोजन करने से आधा घंटा पहले ली जाती है। इसे लेने के बाद यदि भोजन करने में देर हो जाए, तो ब्लड शुगर खतरनाक ढंग से कम हो सकती है। इसीलिए इस दवा के साथ समय पर भोजन करने की आदत डाल लेना बहुत जरूरी होता है। इन दवाओं के साथ यह कमी भी अक्सर देखी गई है कि पाँच-छः वर्ष ठीक-ठाक काम करने के बाद इनका असर धीरे-धीरे घटने लगता है। हर साल कोई 10 से 20 प्रतिशत रोगियों में दवा असर करना बंद कर देती है। ऐसे में कोई नई दवा या फिर इंसुलिन शुरू करनी पड़ती है।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा : बाइग्वानाइड ग्रुप
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा इंसुलिन के असर को तो बेहतर बनाती ही हैं। इन्हें लेने से ग्लूकोज़ को कोशिकाओं में घुसने में आसानी भी हो जाती है। दूसरा, ये लीवर से निकलकर खून में आनेवाले ग्लूकोज़ की मात्रा पर भी कंट्रोल रखती हैं। खास बात यह है कि इन्हें लेने से इंसुलिन की मात्रा नहीं बढ़ती; इसीलिए ब्लड शुगर के कम होने का कोई खतरा नहीं होता। मधुमेह की एलोपैथिक दवा मेटफॉर्मिन ही प्रमुख रूप से काम आती है। यह वजन कम करने में भी सहायक साबित होती है और लाइपिड घटकों के स्तर को भी सही स्तर पर बनाए रखती है। इसे लेने से शरीर की बड़ी धमनियों पर डायबिटीज के साइड इफ़ेक्ट भी कम होते हैं। यह दवा भोजन के साथ ली जाती है। इसे लेने से पेट फूलने लगे तो दवा भोजन के बाद लेने से यह परेशानी खत्म हो सकती है।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा : एकरबोस तथा ग्वारगम
  • भोजन करने के तुरंत बाद ब्लड शुगर यदि बहुत बढ़ जाता हो, तब भोजन के साथ या तो एकरबोस या ग्वारगम लेने की सलाह दी जाती है। ग्वारगम एक प्राकृतिक पदार्थ है, जबकि एकरबोस अल्फा-ग्लूकोसाइडेस दवा है। इसे लेने से आँतों से ग्लूकोज़ खून में जज्ब होने की गति धीमी हो जाती है और ब्लड शुगर का संतुलन पहले के मुकाबले बेहतर हो जाता है। करेला, नीम, जामुन और मेथी भी अपने इसी गुण की वजह से ब्लड शुगर का संतुलन बेहतर बनाते हैं। अपने आप में इनका ब्लड शुगर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसीलिए डायबिटीज के उपचार में यह किसी हद तक ही उपयोगी हो पाते हैं।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा : थायाजोलीडीनडायोन दवाएँ
  • ये दवाएँ भी इंसुलिन का असर बढ़ाती हैं। इनके प्रभाव से खून में लाइपिड घटकों का स्तर भी अधिक स्वास्थ्यकारी बन जाता है—ट्राइग्लिसराइड की मात्रा कम होती है और एच.डी.एल. कोलेस्टेरॉल बढ़ता है। यह भी याद रखें की मधुमेह की एलोपैथिक दवा शरीर में इंसुलिन के होने पर ही काम कर पाती हैं, उसके बिना नहीं।
  • यह दवाएँ सल्फोनिलयूरिया वर्ग की दवा के साथ भी दी जा सकती हैं। दोनों का मिलाजुला असर उतना ही अच्छा है जैसा कि सल्फोनिलयूरिया दवा के साथ मेटफॉर्मिन लेने पर। इन दवाओं का फायदा उन भारी शरीर के लोगों के लिए है, जिनके शरीर में इंसुलिन काफी मात्रा में होती है।
  • दवा का असर शुरू होने में कम से कम दो से चार हफ्ते लगते हैं। और पूरा असर होने में 11 हफ्ते लग जाते हैं। थायाजोलीडीनडायोन दवाओं के साथ सबसे बड़ी कमी यह है कि ये कभी-कभी लीवर पर बुरा साइड इफ़ेक्ट कर सकती हैं। इसीलिए इन्हें शुरू करते हुए और फिर कुछ-कुछ महीनों बाद लीवर की जाँच करवाते रहना जरूरी होता है। इसके लिए – ब्लड टेस्ट-लिवर फंक्शन टेस्ट किए जाते हैं।
  • ये दवाएँ शरीर पर दूसरे साइड इफेक्ट्स भी डाल सकती है जैसे – वजन बढ़ सकता है, पेट में अधिक गैस बन सकती है और मेटफॉर्मिन के साथ लेने पर सिर दर्द, जोड़ों में दर्द, पेशाब में खून आने जैसी समस्या आ सकती है।

मधुमेह की एलोपैथिक दवा का चयन

  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा का चुनाव में हर डॉक्टर की अपनी मर्जी हो सकती है, जो उसके अनुभव और ज्ञान पर निर्भर करता है। लेकिन इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं :

भारी शरीर वाले रोगियों के लिए मधुमेह की एलोपैथिक दवा

  • यदि भोजन करने के बाद की (पोस्ट-प्रेडियल) ब्लड शुगर, खाली पेट की (फास्टिंग) ब्लड शुगर से बहुत अधिक हो, तो भोजन के साथ ग्वारगम लेना लाभकारी होता है। ग्वारगम एक प्राकृतिक पदार्थ है। इसे लेने से ग्लूकोज़ आँतों से खून में धीमी गति से जज्ब होता है और ब्लड शुगर संतुलन में आ जाती है। ग्वारगम बाजार में नॉरसूलिन और डायटेयम के नाम से मिलती है।
  • दवा के रूप में प्रायः मेटफॉर्मिन को प्राथमिकता दी जाती है। अगर इससे ब्लड शुगर नियंत्रण में नहीं आ पाती तो टॉलब्यूटामाइड, ग्लाइपीजाइड या रोजीग्लीटाजोन दवा भी जोड़ दी जाती है। यदि ब्लड शुगर न सिर्फ भोजन के बाद बल्कि खाली पेट भी अधिक हो, तो प्रायः फेनफॉर्मिन दी जाती है। दवा का टाइम-डीलेड (टी.डी.) रूप शरीर में देर तक काम करता है, इसीलिए उसे प्राथमिकता दी जाती है।

सामान्य वजनवाले रोगियों के मधुमेह की एलोपैथिक दवा

  • सामान्य वजनवाले रोगियों को मधुमेह की एलोपैथिक दवा में प्रायः सल्फोनिलयूरिया समूह की ही कोई दवा दी जाती है। लेकिन आँख के पर्दे में डायबिटीज के साइड इफेक्ट्स आने लगें, तो ग्लाइक्लाजाइड को प्राथमिकता दी जाती है।

मधुमेह की एलोपैथिक दवा के कुछ नियम यह भी है

  • मधुमेह की कुछ एलोपैथिक दवा को नीचे दी गई परिस्थितियों में नहीं दिया जाता है। इसके कुछ साधारण नियम इस प्रकार हैं :
  • यदि खाली पेट होने पर ब्लड शुगर 200 mg/dl या अधिक रहे, तो टॉलब्यूटामाइड उपयोगी नहीं होती है ।
  • ऐसे रोगी जो ठीक समय से भोजन नहीं कर पाते या जो वृद्ध हैं और जिनकी देखभाल करनेवाला कोई नहीं, उन्हें क्लोरप्रोपामाइड नहीं दी जाती। क्लोरप्रोपामाइड के साथ यह कमी है कि इसे लेने से ब्लड शुगर अचानक बहुत गंभीर रूप से घट सकती है।
  • रोज शराब पीने वालों और हृदय-रोगियों के लिए भी क्लोरप्रोपामाइड नहीं दी जाती है ।
  • यदि खाली पेट के समय ब्लड शुगर ठीक रहे, तो ग्लाइबेनक्लेमाइड लेना ठीक नहीं।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा ग्लाइबेनक्लेमाइड से ब्लड शुगर खतरनाक ढंग से गिर सकती है।
  • रोज शराब पीने वाले डायबिटिक के लिए मेटफॉर्मिन लेना भी ठीक नहीं है ।

कई मरीजो में मधुमेह की एलोपैथिक दवा के बेअसर होने के कारण

  • टाइप-2 डायबिटीज के कुछ मरीजों में कोई एक या अधिक डायबिटीज-रोधी दवा पहले दिन से ही काम नहीं करती। ऐसी स्थिति में ब्लड शुगर को संतुलन में लाने के लिए किसी दूसरी दवा का सहारा लेना पड़ता है। यह दवा का ‘प्राइमरी फेल्योर” कहलाता है।
  • पर इसके विपरीत यह स्थिति काफी देखने में आती है कि कई मधुमेह की एलोपैथिक दवा कुछ सालों तक कामयाब रहने के बाद अचानक ही अपना असर खो देती है। उसकी मात्रा बढ़ाने से भी यह काम नहीं कर पाती। यह दवा का ‘सेकेंडरी फेल्योर’ है। ऐसी स्थिति में यह दवा बंद करके दूसरी कोई दवा आजमाई जाती है। जिन मरीजों में कोई भी दवा असर नहीं करती, उनमें इंसुलिन शुरू करने की जरूरत पड़ती है।
  • सेकेंडरी फेल्योर के अन्य कारण – मधुमेही का अधिक वजन बढ़ना > व्यायाम छोड़ देना > दवा ठीक से न लेना > दवा आधी-अधूरी मात्रा में लेना > कोई और दवा जैसे स्टीरॉयड लेने से मधुमेह की एलोपैथिक दवा का बेअसर होना > शरीर में कोई इंफेक्शन या कोई और रोग हो जाए > मरीज को अधिक तनाव हो |

मधुमेह की एलोपैथिक दवा के सेवन में सावधानी

  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा का कौन सा प्रकार मरीज के लिए सबसे बेहतर साबित होगा और उसे आप कितनी मात्रा में लें यह रोगी की उम्र वजन शुगर लेवल जैसे अन्य बहुत सारे कारणों पर निर्भर होता है। हर रोगी की दवा की जरूरत अलग-अलग होती है। किसी दूसरे रोगी की देखा-देखी या कहे में आकर दवा या उसकी मात्रा न बदलें।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा के बारे में यह जानकारी होना भी जरूरी है कि ये गोलियाँ बहुत-सी दवाओं के साथ रि-एक्शन कर जाती हैं, जिससे इनका असर घट-बढ़ सकता है। कुछ दवाएँ जिन्हें लोग खुद ही केमिस्ट की दुकान से खरीदकर लेना शुरू कर देते हैं जैसे कि खाँसी- जुकाम, बुखार, दर्द और सूजन की दवाएँ और ऐंटिबायोटिक तथा शराब पीने वाले मरीजो को भी यह परेशानी हो सकती है। इसीलिए जब कभी किसी दूसरी दवा की जरूरत हो, तो डॉक्टर से पूछकर ही दवा शुरू करें।
  • कुछ अन्य दवाएँ मधुमेह की एलोपैथिक दवा का असर तेज भी कर देती हैं। इससे अचानक ही ब्लड शुगर बहुत कम होने का डर होता है। यह स्थिति खतरनाक साबित हो सकती है।
  • मधुमेह की एलोपैथिक दवा का असर तेज करनेवाली प्रमुख दवाएँ हैं : एस्प्रिन; सूजन कम करने वाली दवाएँ जैसे फिनाइलब्यूटाजोन; सल्फनोमाइड्स; ऐंटिबायोटिक क्लोरेमफेनीकोल; रक्तचाप कम करने वाली और कुछ खास हृदय रोगों में काम में लाए जानेवाली बीटा-ब्लॉकर दवाएँ जैसे प्रोप्रेनालॉल; अवसाद-रोधक दवाएँ (एम.ए.ओ. इन्हीबिटर्स); एनाबॉलिक स्टीराएड; खून पतला करनेवाली दवा कॉमारीन; और शराब ।
  • इसके विपरीत कुछ दवाएँ ऐसी हैं जो मधुमेह की एलोपैथिक दवा का असर कमजोर करती हैं। इनमें प्रमुख हैं : मिरगी में दी जानेवाली दवाएँ–फिनोबाटोन (ल्यूमीनाल, गार्डिनाल) और फेनीटोअन (डाइलेंटिन); टी.बी. की दवाएँ-रिफेम्पीसीन और आई.एन.एच., पेशाब की मात्रा बढ़ानेवाली दवाएँ, कार्टिकोस्टीराएड्स; तथा लंबे समय से शराब का सेवन।

आप इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर मधुमेह की एलोपैथिक दवा का भरपूर लाभ उठा सकते है | एलोपैथिक दवाओं की खास बात यह है की ये दवाएं जल्दी असर दिखाती है परंतु यह भी उतना ही सच है की इनके साइड इफेक्ट्स भी बहुत अधिक होते है जिनके ज्यादातर कारणों को हम इस आर्टिकल में बता चुके है | हमारा सुझाव यह है की यदि आप इंसुलिन निर्भर मधुमेह से पीड़ित नहीं है तो अपनी जीवनचर्या में सुधार लाइए जैसे सही खानपान, भरपूर व्यायाम आदि और इसके बाद जो थोड़ी बहुत कमी होगी वह आयुर्वेदिक दवा की मदद से पूरा कीजिये इससे आप मधुमेह के साथ एक स्वस्थ जीवन जी सकते है | Tags- Tips to Help You Take Your Diabetes Medications.

अन्य सम्बंधित पोस्ट

Leave a Reply