लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण तथा इसकी जांच कैसे होती है ?

लंग या फेफड़ें का कैंसर एक आक्रामक तथा घातक रोग है जिसमें लंग्स के सेल्स की अनियंत्रित बढ़ोतरी  होती है। 90%-95% लंग कैंसर छोटी और बड़ी श्वास नलिकाओं (bronchi and bronchioles) के इपिथीलियल कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं। इसीलिए इसे ब्रोंकोजेनिक कारसिनोमा भी कहते हैं। प्लूरा (लंग्स के बाहरी खोल) से उत्पन्न होने वाले कैंसर को मीजोथालियोमा कहते हैं। फेफड़े के कैंसर का मेटास्टेसिस बहुत तेजी होता है यानि यह बहुत जल्दी फैलता है और यह शरीर के किसी भी अंग में फैल सकता है। यह बहुत जानलेवा रोग माना जाता है। इसका उपचार भी बहुत मुश्किल है।

फेफड़े का कैंसर ज्यादातर वृद्धावस्था में होता है। लगभग 70% रोगी इलाज के समय 65 वर्ष से बड़े होते हैं, सिर्फ 3% रोगी 45 वर्ष से छोटे होते हैं। 1930 से पहले यह रोग बहुत कम होता था। लेकिन जैसे जैसे धूम्रपान का प्रचलन बढ़ता गया, इस रोग की व्यापकता में बढ़ोतरी होती चली गई।

लंग कैंसर मुख्यतः दो प्रजाति के होते है। 1) स्मॉल सेल कैंसर (SCLC) और 2) नोन स्मॉल सेल कैंसर (NSCLC)। यह वर्गीकरण कैंसर की सूक्ष्म संरचना के आधार पर किया गया है। इन दोनों तरह के कैंसर की मेटास्टेसिस और उपचार भी अलग-अलग होता है।

लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण

लंग कैंसर के शुरुआती लक्षण तथा इसकी जांच कैसे होती है ? Lung cancer symptoms test janch

  • इस रोग में कई तरह के लक्षण होते हैं जो ट्यूमर और मेटास्टेसिस की स्थिति पर निर्भर करते हैं। प्रारंभिक अवस्था में सामान्यतः कैंसर के स्पष्ट और गंभीर लक्षण नहीं होते हैं।
  • लक्षणहीन फेफड़े के कैंसर के 25% रोगियों का निदान किसी अन्य प्रयोजन से करवाये गये एक्सरे या सी.टी स्केन से होता है।
  • ज्यादातर एक्सरे या सीटी स्कैन में एक सिक्के के आकार की एक छाया कैंसर को दिखाती है। अक्सर इन रोगियों को इससे कोई लक्षण नहीं होता है। ट्यूमर से संबंधित लक्षण ट्यूमर की अभिवृद्धि और लंग में उसके फैलाव के कारण साँस लेने में बाधा उत्पन्न होती है, जिससे खांसी, श्वासकष्ट (Dyspnoea), सांस में खरखराहट (wheezing), छाती में दर्द, खांसी में खून आना (hemoptysis) जैसे लक्षण हो सकते हैं।
  • यदि ट्यूमर किसी नाड़ी का जकड़ लिया है तो कंधे में दर्द जो बांह के पिछले हिस्से तक फैल जाता है (called Pancoast’s syndrome) या ध्वनियंत्र (vocal cords) में लकवे के कारण आवाज में कर्कशता (hoarseness) आ जाती है।
  • यदि ट्यूमर ने भोजन नली पर आक्रमण कर दिया है तो खाना निगलने में दिक्कत (dysphagia) हो सकती है। यदि ट्यूमर किसी बड़ी श्वास नली को अवरुद्ध कर देता है तो लंग का वह हिस्सा सिकुड़ जाता है, उसमें संक्रमण (abscesses, pneumonia) हो सकता है।

मेटास्टेसिस से संबंधित लक्षण

  • फेफड़े का कैंसर तेजी से रक्त-वाहिकाओं या लिम्फ-वहिकाओं द्वारा दूर स्थित अंगो में पहुँच जाता है। बोन, एडरीनल ग्रंथि, मस्तिष्क और लीवर मेटास्टेसिस के मुख्य स्थान हैं। यदि इस कैंसर का मेटास्टेसिस हड्डियों में हो जाता है तो उस स्थान पर बहुत तेज दर्द होता है। यदि कैंसर मस्तिष्क में पहुँच जाता है तो सिरदर्द, दौरा, नजर में धुँधलापन, स्ट्रोक के लक्षण जैसे शरीर के कुछ हिस्सों में कमजोरी या सुन्नता आदि लक्षण हो सकते हैं।

पेरानीओप्लास्टिक लक्षण

  • इस कैंसर में कई बार कैंसर कोशिकाएं हार्मोन की तरह कुछ रसायनों का स्त्राव करती हैं, जिनके कारण कुछ विशेष लक्षण होते हैं। ये पेरानीओप्लास्टिक लक्षण प्रायः स्माल सेल कार्सिनोमा में होते हैं, परंतु किसी भी प्रजाति के कैंसर में भी हो सकते हैं। कुछ स्माल सेल कार्सिनोमा (NSCL) ऐडीनोकोर्टिकोट्रोफिक हार्मोन (ACTH) का स्त्राव करते हैं, जिसके फलस्वरूप ऐडरीनल ग्रंथियां ज्यादा कोर्टिजोल हार्मोन बनाती हैं और रोगी में कशिंग सिंड्रोम रोग के लक्षण हो सकते हैं। इसी तरह कुछ नोन स्माल सेल कार्सिनोमा (NSCLC) पेराथायरॉयड हार्मोन जैसा रसायन बनाते हैं, जिससे रक्त में कैल्शियम का स्तर बढ़ जाता है।

अन्य लक्षण

  • जैसे कमजोरी, वजन कम होना, थकावट, डिप्रेशन और मूड स्विंग (Mood swing) हो सकते हैं। यदि रोगी को निम्न लक्षण हों तो तुरंत चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए।
  • तेज खांसी आती हो या पुरानी खांसी अचानक बढ़ जाए।
  • खांसी में खून आना।
  • छाती में दर्द।
  • तेज ब्रोंकाइटिस या बार-बार श्वसन पथ में संक्रमण हो रहा हो।
  • अचानक वजन कम हुआ हो या थकावट होती हो।
  • श्वासकष्ट या सांस लेने में घरघराहट होती हो।

पूछताछ और रोगी की जाँच से चिकित्सक को अक्सर कुछ लक्षण और संकेत मिल जाते हैं, जो कैंसर की तरफ इंगित करते हैं। वह धूम्रपान, खांसी, सांस लेने में कोई तकलीफ, श्वसन-पथ में कोई रुकावट, संक्रमण आदि के बारे विस्तार से जान लेता है। त्वचा या म्युकस मेंब्रेन का नीला पड़ना रक्त में ऑक्सीजन की कमी का संकेत देता है। नाखुनों के आधार का फूल जाना चिरकारी फेफड़े के रोग को दर्शाता है।

फेफड़ो के कैंसर की जाँच

छाती का एक्सरे  

  • फेफड़े संबंधी किसी भी नये लक्षण के लिए छाती का एक्सरे पहली आसान जांच है। कई बार लंग के एक्सरे में दिखाई देने वाली छाया कैंसर का संदेह मात्र पैदा करती है। लेकिन एक्सरे से यह सिद्ध नहीं होता है कि यह छाया कैंसर की ही है। इसी तरह लंग में कैल्सिफाइड नोड्स (calcified nodules) या बिनाइन (सुदम) ट्यूमर जैसे हेमर्टोमा एक्सरे में कैंसर जैसे ही दिखाई देते हैं। इसलिए अंतिम निदान हेतु अन्य परीक्षण किये जाते हैं।

सी.टी. स्केन (computerized tomography or CAT)

  • फेफड़े के कैंसर तथा मेटास्टेटिक कैंसर की जाँच के लिए छाती, पेट और मस्तिष्क का सी.टी. स्केन किया जाता है। यदि छाती के एक्सरे में कैंसर के संकेत स्पष्ट दिखाई नहीं दें या गांठ के आकार और स्थिति की पूरी जानकारी नहीं मिल पाये तो सी.टी. स्केन किया जाता है। सी.टी. स्केन द्वारा ली गई तस्वीरें सामान्य एक्सरे से अधिक साफ़ और निर्णायक होती हैं। सी.टी. प्रायः उन छोटी गाठों को भी पकड़ लेता है, जो एक्सरे में दिखाई नहीं देती हैं। प्रायः सी.टी. स्केन करने के पहले रोगी की शिरा में रेडियो ओपैक कॉन्ट्रास्ट दवा छोड़ दी जाती है, जिससे अंदर के अवयव और ऊतक और उनकी स्थिति ज्यादा साफ और उभर कर दिखाई देती है। कॉन्ट्रास्ट दवादेने के पहले सेन्सिटिविटी टेस्ट किया जाता है। कई बार इससे ऐलर्जी के लक्षण जैसे खुजली, पिश्ती, त्वचा में चकत्ते आदि हो सकते हैं। पेट के सी.टी. स्केन से लीवर और ऐडरीनल ग्रंथि के मेटास्टेसिस कैंसर का पता चलता है। सिर के सी.टी.स्केन से मस्तिष्क के मेटास्टेसिस कैंसर का पता चलता है।

एम.आर.आई. (Magnetic resonance imaging)

  • एम.आर.आई. ट्यूमर (Tumor) की स्पष्ट और विस्तृत छायांकन के लिए अधिक उपयुक्त है। एम.आर.आई. चुम्बक, रेडियो तरंगों और कम्प्यूटर की मदद से शरीर के अंगों का छायांकन करती है। सी.टी.स्केन की तरह ही रोगी को एक चलित शैया पर लेटा दिया जाता है और छल्लाकार मशीन में से गुजारा जाता है। इसके कोई पार्ष्व प्रभाव नहीं हैं और विकिरण का जोखिम भी नहीं है। इसकी तस्वीरें अधिक विस्तृत होती हैं और यह छोटे सी गांठों को भी पकड़ लेती है।

पोजिट्रोन इमिशन टोमोग्रोफी (PET Scaning)

  • यह सबसे संवेदनशील, विशिष्ट और मंहगी जांच है। इसमें रेडियोएक्टिव लेबल्ड मेटाबोलाइट्स जैसे फ्लोरीनेटेड ग्लूकोजका प्रयोग किया जाता है और ट्यूमर के चयापचय, वाहिकावर्धन (vascularization), ऑक्सीजन की खपत और ट्यूमर की अभिग्रहण स्थिति (receptor status) की सटीक, विस्तृत, बहुरंगी और त्रिआयामी तस्वीरें और जानकारी मिलती है। जहाँ सी.टी. और एम.आर.आई. सिर्फ ट्यूमर की संरचना की जानकारी देते हैं,  वहीं पी.ई.टी. ऊतकों की मेटाबोलिक गतिविधि और क्रियाशीलता की भी सूचनाएं देता है। पी.ई.टी. स्केन ट्यूमर की अभिवृद्धि की जानकारी भी देता है और साथ में यह भी बता देता है कि ट्यूमर किस प्रकार की कैंसर कोशिकाएं से बना है। इसमें रोगी को एक रेडियोएक्टिव (short half-lived radioactive drug) दवा दी जाती है और दो छाती के एक्सरे जितना रेडियेशन दिया जाता है। यह दवा अन्य ऊतकों की अपेक्षा ऑक्सीजन का ज्यादा उपयोग करने बाले ऊतकों (जैसे कैंसर) में अधिक एकत्रित होती है, जो दी गई दवा पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए ग्लूकोज (ऊर्जा का सामान्य स्त्रोत) मिली रेडियोएक्टिव दवा बतलाएगी कि किन ऊतकों ने ग्लूकोज का तेजी से उपभोग किया जैसे विकासशील और सक्रिय ट्यूमर। पी.ई.टी. स्केन को सी.टी. स्केन से जोड़ कर संयुक्त मशीन पीईटी-सीटी भी बना दी गई है। यह तकनीक  कैंसर का चरण निर्धारण पी.ई.टी. से अधिक बेहतर करती है और कैंसर के निदान में एक वरदान साबित हुई है।

बोन स्केन

  • बोन स्केन द्वारा हड्डियों के चित्र कम्प्यूटर के स्क्रीन या फिल्म पर ले लिए जाते हैं। चिकित्सक बोन स्केन यह जानने के लिए करवाते हैं कि लंग कैंसर हड्डियों तक तो नहीं पहुँच गया है। इसके लिए रोगी की शिरा में एक रेडियोएक्टिव दवा छोड़ी जाती है। यह दवा हड्डियों में उस जगह एकत्रित हो जाती है जहाँ मेटास्टेसिस कैंसर ने जगह बना ली है। मशीन का स्केनर रेडियोएक्टिव दवा को ग्रहण कर लेता है और हड्डी का चित्र फिल्म पर उतार लेता है।

बलगम (स्पूटम) की कोशिकीय जांच  

  • लंग कैंसर का अंतिम निदान तो रोगविज्ञानी ट्यूमर या कैंसर कोशिकाओं की सूक्ष्मदर्शी जांच के बाद ही करता है। इसके लिए एक सरल तरीका बलगम की सूक्ष्मदर्शी जांच करना है।यदि ट्यूमर फेफड़े के मध्य में स्थित है और साँस की नली तक बढ़ चुका है तो बलगम में कैंसर कोशिकाएं दिखाई पड़ जाती हैं। यह सस्ती और जोखिम-रहित जांच है। लेकिन इसका दायरा सिमित है, क्योंकि बलगम में हमेशा कैंसर कोशिकाएं नहीं दिखाई देती है। कई बार साधारण कोशिकाएं भी संक्रमण या आघात के कारण कैंसर कोशिकाओं की तरह लगती हैं।

ब्रोंकोस्कोपी 

  • नाक या मुँह द्वारा श्वासनली में प्रकाश स्त्रोत से जुड़ी पतली और लचीली फाइबर ओप्टिक नली (ब्रोंकोस्कोप) डाल कर श्वसन-पथ और फेफड़े का अवलोकन किया जाता है। ट्यूमर दिखाई दे तो उसके ऊतकों का नमूना ले लिया जाता है।ब्रोंकोस्कोपी से प्रायः बड़ी साँस की नलियों और फेफड़े के बीच में स्थित ट्यूमर आसानी से देखे जा सकते हैं। इसमें रोगी को तकलीफ और दर्द होता है इसलिए नींद या बेहोशी की सुई लगा दी जाती है। यह जांच अपेक्षाकृत सुरक्षित है, फिर भी अनुभवी विशेषज्ञ द्वारा की जानी चाहिए। यदि ट्यूमर दिखाई दे जाए और उसका नमूना ले लिया जाये तो कैंसर का जाँच संभव हो जाता है। इस जांच के बाद कुछ रोगियों को 1 या 2 दिन तक खांसी में गहरा भूरा खून आ सकता है।  इसकी गंभीर जटिलताओं में रक्तस्त्राव होना, रक्त में ऑक्सीजन कम होना, हार्ट ऐरिदमिया आदि हो सकते हैं।

सुई द्वारा कोशिकीय जांच Fine needle aspiration Cytology    

  • यह सबसे सामान्य जांच है जिसमें सोनोग्राफी या सी.टी. स्केन के दिशा निर्देश में एक पतली सुई को लंग में कैंसर की गांठ तक घुसाई जाती है और सूक्ष्मदर्शी जांच हेतु कोशिकाओं के नमूने ले लिए जाते हैं। यदि कैंसर की गांठ फेफड़े के बाहरी हिस्सें में स्थित है और जहाँ ब्रोंकोस्कोप नहीं पहुँच पाता है, तब यह तकनीक बहुत उपयोगी साबित होती है। इसके लिए छाती की त्वचा में सुन्न करने की सुई लगाई जाती है। उसके बाद छाती में एक लम्बी सुई कैंसर की गांठ तक घुसाई जाती है। सोनोग्राफी या सी.टी. स्केन की मदद ट्यूमर तक सुई घुसाना आसान हो जाता है और फिर सुई में सिरिंज लगा कर कोशिकाओं को खींच लिया जाता है। लेकिन कभी कभी रोगविज्ञानी सही जगह से ऊतक लेने में कामयाब नहीं हो पाता है। इस तकनीक में न्यूमोथोरेक्स होने का जोखिम रहता है।

थोरेकोसिंटेसिस  

  • कभी कभी कैंसर फेफड़े के बाहरी आवरण, जिसे प्लूरा कहते हैं, तक भी पहुँच जाता है और इस कारण फेफड़े और छाती के बीच के स्थान, जिसे प्लूरल केविटी कहते हैं, में तरल (called a pleural effusion) इकट्ठा हो जाता है। इस तरल को सुई द्वारा निकाल कर सूक्ष्मदर्शी से कैंसर कोशिकाओं की जांच की जाती है। इस तकनीक में भी न्यूमोथोरेक्स का थोड़ा जोखिम रहता है।

ऐलोपेथी इलाज में फेफड़े के कैंसर का मुख्य उपचार सर्जरी ओपरेशन कैंसर की गांठ को निकाल देना होता है | कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी या इनका संयुक्त उपचार है। उपचार संबंधी निर्णय कैंसर के आमाप, स्थिति, अभिवृद्धि, विस्तार, मेटास्टेसिस और रोगी की उम्र तथा उसके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

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