गर्भावस्था की पहली तिमाही में देखभाल

गर्भावस्था में पहले तीन महीनो को गर्भावस्था की पहली तिमाही कहा जाता है यद्यपि कई महिलाओं को पहली तिमाही में कोई समस्या नहीं होती परंतु कुछ अन्य महिलाओं के लिए पूरा गर्भकाल परेशानियों से भरा हो सकता है। जी-मिचलाने और थकान की दुनिया में आपका स्वागत है। कई महिलाओं को पहली तिमाही में ही इतनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है कि वे यह सोचने लगती है कि बाकी तिमाहियों का समय कैसे गुजरेगा। लेकिन यह जी-मिचलाना और अनमनापन कुछ समय के लिए ही होती है।

गर्भावस्था की पहली तिमाही में अपने शारीरिक बदलाव समझें

गर्भावस्था की पहली तिमाही में देखभाल - Pregnancy Care Tips

गर्भावस्था की पहली तिमाही में देखभाल

  • वैसे तो पूरी गर्भावस्था अवधि के दौरान आपका शरीर परिवर्तनों की एक श्रृंखला से गुजरता है ताकि बढ़ते हुए शिशु की आवश्यकताओं और प्रसव की तैयारी में सामंजस्य बैठाया जा सके।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में गर्भस्थ स्त्री के हीमोग्लोबिन स्तर में कुछ गिरावट हो सकती है। इसीलिए सामान्यतः ज़्यादातर महिलाओं को गर्भावस्था अवधि के दौरान आयरन की अतिरिक्त खुराक दी जाती है।
  • गर्भाशय के बढ़े हुए आकार के कारण मूत्राशय पर दबाव पड़ता है, परिणामस्वरूप कई गर्भवती महिलाओं को ऐसा महसूस होता है कि उन्हें बार बार यूरिन जाना पड़ता है।
  • गर्भ का तीसरा महीना आने पर अक्सर महिलायें प्राय: जी मिचलाना, पेट फूलने और अपच की शिकायत करती हैं। लेकिन गर्भावस्था की पहली तिमाही वह दौर है जब शिशु के अंग विकसित हो रहे होते हैं और ऐसी किसी भी चीज़ के इस्तेमाल से बचना चाहिए जिससे अंगों की वृद्धि में रुकावट या पैदायशी विकृति होने का ख़तरा हो। इसीलिए ज़्यादातर डॉक्टर- ऐसी शिकायतों से जूझ रही महिलाओं को किसी दवा के प्रयोग का परामर्श नही देते है |
  • जैसे-जैसे गर्भावस्था आगे बढ़ती है, ये लक्षण स्वतः ही गायब हो जाते हैं या होने वाली माँ को इनकी आदत हो जाती है।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में पर्याप्त मात्रा में फ़ल, हरी सब्ज़ियाँ एवं रेशेदार आहार के सेवन से जहाँ कब्ज़ की शिकायत दूर करने में सहायता मिलती है, वहीं इससे प्राकृतिक रूप से शरीर की आवश्यक विटामिन और पोषण प्राप्त होता है।

गर्भावस्था की पहली तिमाही में पेट के निचले हिस्से में दर्द होना

  • यह वह लक्षण है जिससे प्रत्येक गर्भवती महिला डरती है और प्राय: अस्पताल के चक्कर लगाती है। लेकिन आप सभी भयग्रस्त महिलाओं को तनाव में आने की कोई आवश्यकता नहीं है। पेट के निचले हिस्से में दर्द होना एक सामान्य शिकायत है और अधिकतर यह खतरनाक नहीं होती है।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में प्राय: अचानक हुई शारीरिक हरकत, जैसे एकाएक खड़ा होने या सोते समय करवट बदलने के कारण गर्भवती महिला को पेट के निचले हिस्से में एक ओर जकड़न या तनाव महसूस हो सकता है जो कभी-कभी दाँयी जाँघ की ओर भी बढ़ सकता है।
  • लेकिन आपको उस समय सावधान हो जाना चाहिए जब आपको होने वाला दर्द लगातार होने के बजाए ऐंठन वाला हो ऐसे दर्द की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए तथा इसपर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • याद रखें, कि पीठ के सभी दर्द खतरनाक नहीं होते। गर्भावस्था की पहली तिमाही में हार्मोन संबंधी कुछ निश्चित बदलाव होते हैं जिसके कारण पीठ के लिगामेंट सहित विभिन्न लिगामेंट ढीले हो जाते हैं। ऐसा प्राकृतिक कारणों से होता है ताकि प्रसव के समय उपयुक्त फैलाव हो सके और शिशु सुगमता से बाहर आ सके।

गर्भावस्था की पहली तिमाही में क्या करें, क्या न करें ?

क्या करें

  • यदि आप थकान का अनुभव कर रही हों, तो जितना संभव हो सके, आराम करें।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में यदि आपका जी मिचला रहा हो तो समय-समय पर थोड़ी मात्रा में आहार लें (जिनमें कम मसाले युक्त भोजन अधिक हो)
  • पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ग्रहण करती रहें।
  • खाने के पहले फल और सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोंये।
  • स्वच्छ पानी पिये (जो उबला हो या जल शुद्धीकरण यंत्रों द्वारा स्वच्छ किया गया हो)
  • जब तक कि आपकी गर्भावस्था में कोई उच्च जोखिम कारण न हो या डॉक्टर द्वारा मना न किया गया तो सामान्य कामकाज और व्यायाम जारी रखें।
  • कोई भी असामान्य लक्षण जैसे रक्त स्त्राव, होने पर तत्काल डॉक्टर को दिखायें।

क्या न करें

  • पहली तिमाही में वज़न अधिक या कम होने की चिंता न करें।
  • डॉक्टर के परामर्श के बिना कोई भी दवा न लें।
  • किसी किताब या वेबसाइट में दिये गए परामर्श के अनुसार आहार नियम या व्यायाम की शुरूआत न करें। वेबसाइट या किताब में दी गयी जानकारी सामान्य हालात को ध्यान में रखकर दी गयी होती है परंतु सभी गर्भस्थ स्त्रियों की स्थिति सामान्य नही होती है इसलिए अपने डाक्टर के सम्पर्क में रहे |
  • कोई भी अज्ञात क्रीम न लगायें। (विटामिन ‘ए’ अथवा रेटीनोइक ऐसिड शिशु के लिए विशेष रूप से हानिप्रद हो सकती हैं)
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में स्वयं को अधिक नाजुक न बनायें।

गर्भावस्था की पहली तिमाही में शारीरिक जाचें

  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में के दौरान आपको कई जाँचों और परीक्षणों से गुजरना पड़ सकता है ताकि डॉक्टर आपकी दशा की निगरानी कर सके। इन जाँचों को कराने के तीन महत्वपूर्ण उद्देश्य होते हैं, यद्यपि इन जाँचों में हर तिमाही के अनुसार परिवर्तन हो सकता है।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में आपकी गर्भावस्था की निगरानी के लिए अल्ट्रासोनोग्राफ़ी मुख्य उपकरण हैं। ये जाँच पूरी तरह सुरक्षित होती है तथा गर्भस्थ शिशु पर विपरीत प्रभाव डाले बिना कितने भी बार करायी जा सकती है लेकिन बिना किसी ठोस कारण के अल्ट्रासोनोग्राफ़ी नहीं करायी जानी चाहिये।
  • अल्ट्रासोनोग्राफ़ी कराये जाने काफी विशिष्ट संकेत होते हैं। इसका प्रयोग शिशु की सही उम्र, उसके विकास व स्वास्थ्य को तय करने के लिए किया जाता है। इसका इस्तेमाल होने वाली माँ के अंगों के मूल्यांकन तथा यदि उसे किसी समस्या का अनुभव हो रहा हो, तो उस असामान्यता की जाँच के लिए भी किया जा सकता है।
  • तकनीकी रूप से आपको पहली तिमाही में सिर्फ़ 2 अल्ट्रासोनोग्राफ़ी कराने की आवश्यकता होती है। सबसे पहली अल्ट्रासोनोग्राफ़ी का प्रयोग गर्भाशय में एक जीवन्त शिशु की उपस्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है।
  • Blood Group सभी व्यक्तियों को अपने ब्लड ग्रुप की जानकारी अवश्य होनी चाहिये। यदि किसी महिला को जीवन में एक बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है तो वह प्रसव उपरांत अवधि में पड़ती है और ऐसा प्रसव उपरांत रक्त स्त्राव के कारण होता है।
  • संपूर्ण हीमोग्राम (होमोग्लोबिन एवं संपूर्ण रक्त गणना)- हीमोग्लोबिन स्तर के ज्ञात होने से महिला के रक्त में ऑक्सीजन वहन क्षमता का सही-सही अंदाज़ा लगता है।
  • गर्भावस्था के दौरान प्राकृतिक रूप से महिला का रक्त पतला हो जाता है। ऐसा उसके शरीर में आये परिवर्तनों के कारण होता है। अत: यदि गर्भावस्था के पूर्व महिला का हीमोग्लोबिन स्तर 12 ग्राम प्रतिशत है तो गर्भावस्था अवधि के दौरान यह गिरकर 5 या 11 ग्राम प्रतिशत हो सकता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है तथा इसे लेकर चिंता करना आवश्यक नहीं है।
  • रक्त शुगर जाँच (उपवास एवं भोजन पश्चात अथवा रेन्डम या ग्लाइकोसीलेटेड हीमोग्लोबिन, स्क्रीनिंग जाँच)
  • वास्तव में, गर्भावस्था मधुमेह या डायबिटीज़ को जन्म देने वाली हो सकती है और एक पूरी तरह स्वस्थ्य महिला गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज़ की शिकार हो सकती है। जाहिर है, बढ़ा हुआ शुगर का स्तर माँ और शिशु दोनों के लिए अच्छा नहीं है।
  • वी.डी.आर.एल. जाँच सिफिलिस हेतु करायी जाती है। सिफिलिस एक यौन संक्रामक रोग है जो माँ और शिशु दोनों को प्रभावित कर सकता है। यदि माँ की जाँच रिपोर्ट में सिफिलिस संक्रमण पाया जाता है तो उसे पेनिसिलीन या अन्य ऐंटीबॉयोटिक देकर बीमारी का उपचार किया जा सकता है।
  • एच बी एस ए जी की जाँच हेपेटाइटिस बी का पता लगाने के लिए करायी जाती है जो पेट या लिवर से जुड़ा संक्रमण है। यदि माँ हेपेटाइटिस से प्रभावित है तो यह संक्रमण उसके शिशु को भी हो सकता है।
  • एच.सी.वी. की जाँच हेपेटाइटिस सी की पहचान हेतु की जाती है। इसी प्रकार एच.आई.वी. एड्स की जाँच के लिए किया जाता है |
  • टी.एस.एच. या कम्प्लीट थायरॉइड प्रोफाइल सामान्य मूत्र जाँच सर्वप्रथम इससे संक्रमण का पता लगता है। मूत्र मार्ग संक्रमण होने से महिला को समय पूर्व प्रसव होने का ख़तरा रहता है तथा ऐसे संक्रमणों का उपचार आवश्यक है।
  • सी.आर.एल – डॉक्टर इस समय आपकी ग्रीवा की जांच भी कर सकती हैं। गर्भावस्था की पहली तिमाही में आपके शिशु को सिर से नितंब तक मापा जाता है। इसके क्राउन रंप लैंग्थ (सी.आर.एल.) कहा जाता है। पहली तिमाही में सी.आर.एल. एकदम सटीक होती है |
  • मूत्र मार्ग के संक्रमण के उपचार हेतु सामान्यतः ऍटीबायोटिक दवाई दी जाती हैं।
  • जिस महिला को गर्भावस्था के दौरान बहुत ज़्यादा जी मिचलाने एवं उल्टी की शिकायत हो, उसे हाइपरमसिस ग्रेविडारम भी हो सकता है। यह वह दशा है जिसमें महिला का चयापचय तंत्र प्रभावित होता है।
  • मूत्र परीक्षण द्वारा कीटोन अंशों का पता लगाया जा सकता है जो इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। इनके अलावा अन्य शारीरक जांचें आपकी डाक्टर सुझा सकती है जो व्यक्ति विशेष की स्थिति पर निर्भर करता है |

गर्भावस्था की पहली तिमाही में खान पान संबंधी कुछ आम सावधानियाँ  

  • भलीभांति पका हुआ खाद्य पदार्थ ग्रहण करें। सुनिश्चित करें कि फल और सब्जियों को सेवन करने के पूर्व उन्हें अच्छी तरह से धो लिया गया हो। इन्हें बिना पकाए ही सेवन करें
  • मांस का सेवन के पूर्व भली-भांति पका हुआ हो। कच्चे अंडे से बनी मेयोनेज के सेवन से बचे |
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में दिन में तीन बार डटकर खाने के बजाए थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ खाते रहें। बे स्वाद और गंध रहित चीजों को कम मात्रा में सेवन करना आसान होता है। गर्भावस्था की पहली तिमाही में आपका वजन कम हो सकता है, लेकिन चिंता न करें, गर्भावस्था के प्रारंभिक दौर में यह एक सामान्य बात है |

गर्भावस्था में त्वचा में क्या-क्या परिवर्तन हो सकते हैं?

  • गर्भावस्था के दौरान आपकी त्वचा में कई परिवर्तन हो सकते हैं। त्वचा पर गहरे धब्बे पड़ना या हाइपरपिग्मेंटेशन सबसे ज़्यादा कष्टप्रद हो सकता है।
  • महिलाओं के चेहरे पर भूरे धब्बे पड़ने शुरू हो जाते हैं। सूर्य या पराबैगनी किरणों (UV) के संपर्क में आने से यह समस्या बढ़ सकती है,
  • एक अच्छी सनस्क्रीन क्रीम, जो यू वी ए तथा यू वी बी के प्रति प्रभावी हो तथा जो एस पी एफ-20 या उससे अधिक हो, के प्रयोग से धब्बों की रोकथाम या उन्हें कम करने में सहायता मिलती है।
  • धब्बों के गहरे रंग के अनुसार इनका उपचार क्रीम, त्वचा पील क्रीम या पिग्मेंट लेजर पद्धति द्वारा किया जा सकता है। इनमें से कुछ उपचार गर्भावस्था के दौरान भी किए जा सकते हैं लेकिन कुछ उपचारों के लिए प्रसव होने तक इंतजार करने की आवश्यकता है।
  • गर्भावस्था के दौरान महिला के पेट पर कभी-कभी सफेद रेखायें उभर आती हैं। गर्भावस्था के बाद के दौर में उदर की त्वचा में तेजी से खिचाव होता है, इसलिये त्वचा की भीतरी परत में मौजूद इलास्टिन फाइबर टूट जाते हैं। इसके साथ-साथ त्वचा की ऊपरी परत के पतला हो जाने से ये त्वचा पर स्ट्रेच माक्र्स के रूप में उभर कर आते है।
  • गर्भावस्था की पहली तिमाही में पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ग्रहण करने एवं विटामिन ई व ऐलोवेरा मिश्रित मॉइश्चराइजर के प्रयोग से कुछ हद तक इन Stretch marks को कम करने में सहायता मिलती है।
  • आवश्यकता पड़ने पर, आपके त्वचा रोग विशेषज्ञ आपको सूजनरोधी क्रीम के इस्तेमाल का परामर्श भी दे सकते हैं।
  • Stretch marks के रंग (लाल, सफेद या काले) और उनकी गहनता के आधार पर उपचार किया जाता हे | त्वचा की दशा करे आधार पर उपचार विकल्पों में रेटिनोइक ऐसिड वाली क्रीम, त्वचा पील, त्वचा न होने वाला आंशिक लेजर उपचार, त्वचा को कसने वाली प्रणाली इत्यादि शामिल हैं।
  • तिल और मुँहासे भी त्वचा से जुड़ी एक अन्य समस्या है जिसका सामना कुछ गर्भवती महिलाओं को करना पड़ता है। गर्भावस्था के दौरान स्रावित हुए हार्मोन आपकी तैलीय ग्रंथियों का आकार बढ़ा देते है। इन ग्रंथियों की नली जाम हो सकती है जिससे मुँहासे उभर आते हैं। यदि आपकी त्वचा में पहले से ही मुँहासे रहे हों तो इनकी संख्या और आकार में वृद्धि हो सकती है।
  • हल्के साबुन रहित क्लीनज़र का दिन में 3-4 बार एवं उसके बाद दिन में 2 बार एल्कोहल रहित टोनर (या आप ग्लिस्रीन और गुलाब जल के मिश्रण का प्रयोग कर सकती हैं) के प्रयोग से मुँहासे दूर हो सकते हैं। जीवाणुरोधी एन्टीबेक्टीरियल एजेन्ट युक्त क्लीनजर अत्यंत तैलीय त्वचा के लिए लाभदायक साबित हो सकते हैं।
  • 150 में से एक महिला में गर्भावस्था के दौरान खुजली वाली घमौरियां (खुश्की) ये खुश्की और खुजली सामान्यतः उदर क्षेत्र में शुरू होती है और जल्द ही भुजाओं, पैरों और कभी-कभी पीठ तक फैल जाती है चकतों और धब्बों में दूसरी तिमाही के दौरान बढ़ोतरी होती है तथा प्रसव के उपरांत ये समाप्त हो जाते हैं। और अधिक जानकारी के लिए पढ़ें यह पोस्ट – गर्भावस्था में त्वचा और बालों की देखभाल के लिए टिप्स |
  • वैसे तो इसकी पूरी तरह से रोकथाम संभव नहीं है, लेकिन हल्के साबुन रहित शॉवर जैल या ओटमील बॉडी वॉश, अच्छा मॉइश्चराइजिंग लोशन के इस्तेमाल तथा दिन में 10-12 गिलास पानी पीने से त्वचा भलीभांति नम रहेगी जिससे खुजली में कमी एवं खुश्की के विस्तार की रोकथाम होगी।
  • कैलामाइन, एलोवेरा और हल्के तरल पैराफीन युक्त आरामदायक लोशन लगाने से भी आपको सुकून मिलेगा।

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