स्वाइन फ्लू के लक्षण, कारण, जाँच, बचाव और स्वाइन फ्लू का टीका

स्वाइन फ्लू एक खतरनाक संक्रामक बीमारी है, पाँच दशक पहले अमेरिका के न्यूजर्सी में इस तरह का रोग फैला था। अभी दुनियाभर में तीन लाख के लगभग और भारत में पाँच हजार के आसपास रोगियों का पता चला है और हजारों रोगियों की मृत्यु भी इस गंभीर संक्रामक रोग से हो चुकी है। अकेले मेक्सिको में सैकड़ों रोगियों की मौत इस संक्रामक रोग से हुई है।  जब यह रोग देश में आया तो यहाँ सावधानी बतौर हवाई अड्डों पर भी रोग की जाँच शुरू की गई। अमेरिका से लौटे हैदराबाद के 23 वर्षीय एक रोगी में स्वाइन फ्लू की सबसे पहले पुष्टि हुई थी, फिर उसकी माँ में भी इस रोग के लक्षण पाए गए। मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, बंगलौर, कलकत्ता, वडोदरा, अहमदाबाद, पुणे एवं भोपाल तथा अन्य शहरों से भी इस रोग के लक्षणों वाले सैकड़ों मरीजों की जानकारी मिली है। इसका मतलब यह है कि भारत में यह रोग तेजी से फैला था, क्योंकि यहाँ भी प्रतिदिन हजारों विदेशी यात्रियों का आना-जाना है और बचाव के तरीकों की जानकारी के अभाव में यह तेज़ संक्रामक रोग बढ़ता ही चला गया।

स्वाइन फ्लू क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह रोग इंफ्लुएंजा (Hy, Ny) नाम से जाना जाता है। वास्तव में अभी यह तय भी नहीं हो सकता है कि इस तरह का फ्लू भी सुअरों में पाया जाता है या केवल विषाणु सुअरों में पाए गए हैं। यह अब साफ़ हो चूका है कि इस रोग के विषाणु सुअरों के अलावा पक्षियों, घोड़ों, कुत्तों, घरेलू मुर्गे–मुर्गियों में भी पाए जाते हैं। इस तरह यह कहना कि स्वाइन फ्लू केवल सुअरों द्वारा ही फैलता है, पूरी तरह सही नहीं है। हाँ, अलग-अलग जंतुओं में इस रोग के पाए जानेवाले विषाणुओं की संरचना में थोड़ा अंतर पाया गया है। जैसे-पक्षियों में एस 5, एन-1 एंटीजन युक्त स्टेंस खोजा गया है। पक्षियों में पाए जाने वाले इस तरह के विषाणु से एवियन फ्लू होता है, लेकिन सुअर का पका मांस खाने से यह रोग नहीं होता, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।

संक्षेप में हम स्वाइन फ्लू या इंफ्लुएंजा या एच-1, एन-1 को कुछ इस तरह परिभाषित कर सकते हैं-”यह एक सांस लेने के दौरान प्रयोग होने वाले अंगो में होने वाला तेज संक्रमण है, जो इंफ्लुएंजा के एच-1, एन 1 प्रकार के विषाणुओं द्वारा होता है और इस रोग में एकदम से तेज बुखार, खाँसी, पेशियों में दर्द और कमजोरी महसूस होती है। गले में खराश और साँस लेने में तकलीफ; न्यूमोनिया जैसे लक्षण भी मिल सकते हैं और रोगी गंभीर अवस्था में पहुँच जाता है।

स्वाइन फ्लू के लक्षण

स्वाइन फ्लू लक्षण जाँच Swine influenza

स्वाइन फ्लू

  • स्वाइन फ्लू का संक्रमण होने के तुरंत बाद रोग के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, बल्कि ये लक्षण 18 से 72 घंटे बाद दिखाई देने शुरू होते हैं।
  • स्वाइन फ्लू के लक्षणों में पहला लक्षण गले और नाक पर नजर आता है |
  • रोग का विषाणु (टाइप ए, एच-1, एन-1) श्वसन संस्थान में पहुँचकर सांस लेने वाली नलिकाओं में सूजन उत्पन्न करते हैं। साथ ही इनकी कोशिकाओं के स्तर को भी नष्ट कर देते हैं। इस कारण साँस नलिकाओं में जीवाणुओं का भी संक्रमण हो जाता है, फिर रोगी को बुखार, नाक बहना, शरीर में दर्द, खाँसी-बलगम में खून आ सकता है। कमजोरी, थकन, भूख में कमी, सिरदर्द, जी मिचलाना, उलटी होना, ठंड लगना, साँस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं। गले में खराश पैदा हो सकती है और गले की गाँठे भी बढ़ सकती हैं।

स्वाइन फ्लू के कारण : स्वाइन फ्लू कैसे होता है ?

  • इस रोग का विषाणु आर्थो मिक्सो वाइरेडी परिवार का है। इसके तीन उप प्रकार होते हैं-टाइप-ए, टाइप-बी और टाइप-सी। इन तीनों विषाणुओं के विषाणु विष अलग-अलग तरह के होते हैं। जैसे कि स्वाइन फ्लू में एच-1, एन-1 (Hy, Ny) सरफेस एंटीजन पाया गया है। इंफ्लुएंजा ‘ए’ वाइरस अन्य विषाणुओं से अलग तरह का होता है। स्वाइन फ्लू का कारण वाइरस ‘ए’ के प्रकार को ही माना गया है। (इसमें एच-1, एन-1 सरफेस एंटीजन होता है) जबकि वाइरस-बी दुर्लभ रूप में ही मिलता है तथा वाइरस ‘सी’ सुअरों में नहीं पाया जाता है।
  • जैसा कि ऊपर बताया गया है कि फ्लू या इंफ्लुएंजा के स्रोत प्रमुख रूप से जानवर एवं पक्षी होते हैं। इनमें सुअर, कुत्ते, बिल्लियाँ एवं पालतू मुर्गियाँ इत्यादि शामिल हैं। इन जीव-जंतुओं में वैज्ञानिकों ने फ्लू के विषाणु पाए हैं और इन विषाणुओं में ‘एच’ एवं ‘एन’ नामक प्रतिजन विष होता है। ये विषाणु जब सांस के माध्यम से मनुष्य के शरीर में पहुँचते हैं तो गंभीर रोग (फ्लू) उत्पन्न करते हैं।

स्वाइन फ्लू संक्रमण का स्रोत

  • संक्रमण के स्रोत रोगी के अलावा कुछ स्वस्थ दिखनेवाले मनुष्य भी हो सकते हैं। संक्रमित व्यक्ति की नाक के स्राव में रोग के विषाणु होते हैं। जो खाँसी के साथ या रुमाल और तौलिए जैसे कपड़ों के द्वारा अन्य स्वस्थ व्यक्ति में प्रवेश कर सकते हैं। स्वाइन फ्लू के वाइरस या विषाणु रोग के लक्षण मिलने से एक दो दिन पहले और 1 से 2 दिन बाद तक रोगी में मिलते हैं। इसलिए इस समय के अंदर रोगी अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को भी संक्रमण का शिकार बना सकता है। अतः रोगी से दूरी बनाए रखनी चाहिए एवं सुरक्षा के लिए मास्क इत्यादि का प्रयोग करना चाहिए।

स्वाइन फ्लू से कौन-कौन व्यक्ति रोगग्रस्त हो सकते हैं?

  • यह फ्लू सभी उम्र के व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है, परंतु 18 महीने से कम के बच्चों और 65 वर्ष से ऊपर के वृद्धों एवं मधुमेह, गुरदों के रोगियों और हृदय रोगियों में इस रोग के कारण अधिक मृत्यु होती पाई गई हैं। ऐसे लोगों को अधिक खतरे वाले समूह में रखा गया है, क्योंकि इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। इसलिए इनके ऊपर बीमारी का असर जल्दी और ज्यादा होता है। अस्पतालों एवं लैब में काम करने वाले डॉक्टर, नर्से और अन्य कर्मचारी भी सावधानी के अभाव में स्वाइन फ्लू से ग्रसित हो सकते हैं।

स्वाइन फ्लू को बढ़ानेवाले कारण

  • सघन आबादी वाले शहरों, मेलों, उत्सव स्थलों में स्वाइन फ्लू के फैलने और बढ़ने की आशंका अधिक होती है। इसी तरह स्कूलों और जहाजों में भी संक्रमण की गुंजाइश अधिक होती है। विदेश यात्रा और विदेशियों के संपर्क से भी यह रोग उस दशा में हो सकता है, जब रोग से पूरा विश्व प्रभावित हो अथवा संबंधित देश में रोग फैल रहा हो।
  • स्वाइन फ्लू के वायरस का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में खाँसी अथवा सांस के द्वारा फैलता है। होता यह है कि रोगी की खाँसी में रोग के रोगाणु छोटी बूंदों के रूप में रहते हैं। संपर्क में आनेवाला व्यक्ति श्वसन क्रिया के माध्यम से इन्हें अपने अंदर खींच लेता है और उसे रोग हो जाता है। रोगी के साथ रहने से भी यह रोग हो सकता है। रोगी की वस्तुओं के इस्तेमाल और नजदीक संपर्क से भी रोग हो सकता है।

स्वाइन फ्लू की जाँच

  • स्वाइन फ्लू की पहचान केवल लक्षणों के आधार पर नहीं होती। लैब में विषाणु का परीक्षण कर रोग को निर्धारित किया जाता है; लेकिन इस विषाणु की प्रयोगशाला में जाँच बहुत कठिन होती है। जाँच की सुविधा भारत में इंफ्लुएंजा सेंटर पाश्चर इंस्टीट्यूट कुनूर (दक्षिण भारत), हापकिन इंस्टीट्यूट मुंबई, स्कूल ऑफ ट्रापिकल मेडिसिन कोलकाता तथा ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली और ऑर्ड फोर्स मेडिकल कॉलेज, पुणे तथा इंस्टीट्यूट आयु-वायरोलॉजी, पुणे में उपलब्ध है।
  • स्वाइन फ्लू की जाँच के लिए रोगी के रक्त के 2 नमूने भेजे जाते हैं। रोगी के इतिहास में उसका विदेशियों या स्वाइन फ्लू के रोगी से संपर्क की जानकारी भी देना जरुरी होता है। अब भोपाल जैसे शहरों में जाँच की सुविधा उपलब्ध हो रही है।

स्वाइन फ्लू का इलाज

  • स्वाइन फ्लू के रोगी को अस्पताल में भरती करना ठीक रहता है, जिसमे उसे एक अलग कमरे में रखा जाता है, जिससे वह अन्य व्यक्तियों को रोग न बाँट सके। चूँकि इस रोग के टीके के असर की कुछ सीमाएँ होती हैं। इसलिए विषाणु प्रतिरोधी दवाएँ रोगी को दी जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए निर्देशों के अनुसार एंटी वायरल दवा केवल गंभीर मरीजों को दी जाती हैं। राइमेंटीडाइन या टेमी फ्लू नामक विषाणुरोधी दवाएँ रोग में असरकारक साबित हुई हैं। इससे रोगी की जान बच जाती है और तकलीफ में भी आराम मिलता है।
  • ऑक्सीजन एवं अन्य दवाएँ भी चिकित्सक के परामर्श अनुसार दी जाती है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इलाज का पूरा असर तभी होता है, जब इलाज रोग की पहचान कर 48 घंटे के भीतर शुरू कर दिया जाए। जल्दी ही इलाज से रोगी की मृत्यु भी नहीं हो पाती हैं।
  • स्वाइन फ्लू के रोगी की देखभाल करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों और मिलने-जुलनेवाले लोगों को मास्क पहनकर रोगी के कमरे में प्रवेश करना चाहिए एवं खाँसते वक्त रोगी मुँह पर कपड़ा रखे।

एच-1 एन-1( स्वाइन फ्लू ) से बचाव

  • जब विश्व में यह रोग सामूहिक रूप से फैलता है तो रोग पर पूरी तरह से नियंत्रण कर पाना मुश्किल होता है, क्योंकि आज पूरे विश्व के देशों के लोग परस्पर एक-दूसरे के देशों की यात्रा करते हैं और ये लोग इस तरह के रोगों को अन्य देशों में फैलाने में सहायक बनते हैं। रोग से बचाव के लिए निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए
  • नए लोगों या विदेशियों से गले मिलने, हाथ मिलाने, चुंबन आदि से बचें।
  • ऑफिस या सार्वजनिक बिल्डिंग, में व्यक्तियों के बीच पर्याप्त दूरी हो। इससे स्वाइन फ्लू के संक्रमण की संभावना कम होती है।
  • जब यह रोग फैल रहा हो, तब लोग भीड़ भरे स्थानों से बचें और अपने बच्चों को भी बचाएँ।
  • यात्रा एवं भीड़ में मुंह पर मास्क का प्रयोग करें या नाक और मुंह पर रुमाल रखें।
  • खाँसते या छींकते समय भी चेहरे को रुमाल या तौलिए से ढकें रोगी ऐसे वक्त मुँह को ढक लें।
  • ऊपर बताए गए फ्लू के लक्षण मिलने पर तुरंत चिकित्सक को दिखाकर इलाज शुरू करें।
  • जब रोग फैल रहा हो तो घरेलू पालतू जानवरों और पक्षियों से सीधे संपर्क से बचें।
  • ऐसे देशों की यात्रा न करें, जहाँ स्वाइन फ्लू फैल रहा हो ।
  • साबुन से कई बार हाथ धोएँ।
  • फार्म में स्वस्थ वातावरण में पाले गए सूअर के मांस या सूअरों से प्राप्त अन्य खाद्य पदार्थ (जैसे बेकन, सॉसेज) खाएं।
  • कच्चे मांस को पकाये हुए या खाने के लिए तैयार खाद्य पदार्थ से दूर रखें |
  • कच्चे मांस को तैयार करने के लिए एक अलग चौपिंग बोर्ड और चाकू का इस्तेमाल करें |
  • कच्चे मांस को संभालने के बाद अपने हाथों को तुरंत धो लें|
  • कच्चे मांस के साथ संपर्क के बाद और बर्तन और सतहों को तुरंत स्वच्छ और कीटाणुरहित करें |
  • स्वाइन फ्लू के लक्षण मिलने पर रोगी को शीघ्र सुविधापूर्ण अस्पताल में भरती करें, ताकि उससे अन्य लोगों में रोग न फैले और उसे उचित व पर्याप्त इलाज मिल सके। रोगी से सीधे संपर्क से बचें और मास्क का उपयोग करें।
  • Hand sanitizer का प्रयोग करें खासकर जब आप बसों, रेल या ऐसे किसी स्थान पर यात्रा करते हों | मानसून के सीजन में कई दूसरी बिमारियों से बचाव के लिए भी इसका प्रयोग आपको कई संक्रामक बिमारियों से बचा सकता है |

स्वाइन फ्लू से बचाव का टीका (इंजेक्शन)

  • इंफ्लुएंजा ‘ए’ या फ्लू से बचाव का सबसे कारगर हथियार है इसका टीका। टीके शरीर में रोग प्रतिरोधक शक्ति पैदा करते हैं। जब रोग के विषाणुओं का शरीर पर संक्रमण होता है तो शरीर पूर्व के टीकों द्वारा उत्पन्न प्रतिरोधक क्षमता के बलबूते पर रोग के विषाणुओं को खत्म कर देता है। अब इस फ्लू के कई एंटीजन के प्रकारों से रक्षा के लिए प्रभावी वैक्सीन या टीके उपलब्ध हैं, ये टीके डॉक्टर के निर्देश पर प्रभावित रोगी के घरवालों एवं रोगी के संपर्क में आए स्वस्थ लोगों को स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए लगाए जाते हैं।
  • अभी कुछ नए तरह के टीके भी आए हैं, जिन्हें स्प्लिट वाइरस वैक्सीन कहते हैं। ये टीके पूरे विषाणु से तैयार न करके उसके कुछ हिस्से से तैयार किए जाते हैं। इसलिए ये टीके अधिक सुरक्षित और प्रभावी होते हैं। ऐसे टीके बच्चों की सुरक्षा के लिए आसानी से लगाए जाते हैं।
  • इन सब जानकारियों से आधार में अब हम यह कह सकते हैं कि यह रोग खतरनाक एवं जानलेवा तो है, लेकिन थोड़ी से सावधनियाँ रखकर स्वाइन फ्लू से बचा जा सकता है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब रोग के इलाज के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं (नीचे दिए गए हैं)

भारत में चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा प्राप्त निर्देशों के अनुसार स्वाइन फ्लू रोग को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है :-

स्वाइन फ्लू की केटेगरी (A)

  • इसके लक्षण हैं- रोगी को हलका बुखार आना, शरीर एवं सिर में दर्द तथा गले में खराश और दस्त-उलटी का होना। इन सभी लक्षणों वाले रोगी को तकलीफों के अनुसार इलाज दिया जाता है। लेकिन विषाणुरोधी स्वाइन फ्लू की दवा टेमीफ्लू देने की जरूरत नहीं होती और न ही जाँच के लिए रक्त का नमूना भेजने की आवश्यकता होती है, लेकिन ऐसे रोगी को घर में रहकर इलाज करवाने और आराम की सलाह दी जाती है। साथ ही अन्य स्वस्थ व्यक्तियों को रोगी के संपर्क में सावधानी बरतने अथवा उसके संपर्क में न आने की सलाह दी जाती है।

स्वाइन फ्लू की केटेगरी (B)

  • इस वर्ग में वे रोगी आते हैं, जिनको तेज बुखार के साथ केटेगरी (A) वाले सभी लक्षण होते हैं। इस श्रेणी में ऐसे व्यक्ति भी शामिल किए जाते हैं, जिनको फेफड़ों हृदय, गुरदे की बीमारी, मधुमेह, कैंसर या एड्स इत्यादि के संक्रमणों के साथ स्वाइन फ्लू के लक्षण भी होते हैं । 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों को भी इसी वर्ग में रखा जाता है। इस वर्ग के रोगियों को भी अस्पताल में भरती करने की जरूरत नहीं होती, लेकिन टेमीफ्लू दवा से इलाज किया जाता है तथा एच-1, एन-1 विषाणु की जांच के लिए सेम्पल बाहर भेजने की भी आवश्यक नहीं होती, लेकिन घर पर इलाज के दौरान रोगी की लगातार निगरानी रखना जरूरी है। साथ ही परिवार के लोग भी रोगी के सीधे संपर्क में न रहें और टीके लगवाएँ।

स्वाइन फ्लू की केटेगरी (C)

  • इस वर्ग के रोगियों को ‘A’ तथा ‘B’ केटेगरी के लक्षणों के साथ ही कुछ गंभीर तकलीफे व लक्षण पैदा हो जाते हैं। जैसे सीने में दर्द, बलगम में खून आना तथा रक्तचाप का कम हो जाना एवं नाखून पीले पड़ना। इन लक्षणों के अलावा रोगी में चिड़चिड़ापन आ जाता है। वह खाना छोड़ देता है। ऐसी स्थिति में रोगी को जल्दी ही अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड या अलग बने निजी चिकित्सा कक्षों में इलाज के लिए भरती करवाना चाहिए। ऐसे रोगी में स्वाइन फ्लू की जाँच के लिए रक्त का सेम्पल भी तुरंत भेजा जाना चाहिए तथा इस स्थिति में टेमीफ्लू दवा भी देनी जरूरी होती है, जो कि डॉक्टर की देखरेख में दी जाती है।

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