रोहे रोग या (ट्रेकोमा) होने के कारण, लक्षण तथा बचाव की जानकारी

रोहे रोग (ट्रेकोमा) या पोथकी आँखों का एक खतरनाक रोग है, वैसे तो यह कंजक्टिवाइटिस का ही एक रूप है, जिसे क्रोनिक फॉलिकूकर केरेटो कंजक्टिवाइटिस कहते हैं। यह सभी उम्र के लोगों के अलावा बच्चों में अधिक होता है। हमारे देश में ट्रैकोमा का संक्रमण पंजाब, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और प्रायः पूरे उत्तर भारत में बहुत पाया जाता है। यह निश्चित रूप से बहुत ज्यादा फैलने वाली बीमारी है और अब दक्षिणी और मध्य क्षेत्र के राज्यों में भी होने लगी है। यह एक विशिष्ट वाइरस संक्रमण है, जो केवल आँखों को प्रभावित करता है। यदि समय पर इस संक्रमण का उपचार ना किया जाए, तो कई जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं, जैसे-आँख की बरौनियों का अंदर की ओर मुड़ जाना, अल्सर, कॉर्नियल विकृति तथा आखिर में कभी भी ठीक न हो सकने वाला अंधापन। यह रोग विकासशील देशों, विशेष रूप से भारत में अंधेपन का प्रमुख कारण है। रोहे रोग एक संक्रामक अर्थात् फैलने वाला रोग है, जो क्लेमाइडिया नामक जीवाणु से होता है। दुनियाभर में इस रोग से अंधेपन के शिकार डेढ़ करोड़ लोगों में 50 लाख केवल भारत में हैं और रोहे रोग से अंधे बने रोगियों की संख्या सबसे अधिक है। इस वाइरस के कई स्रोत हैं-रेत, मक्खियों, आँधी और धूल। यह हवा से फैलता है और प्रत्यक्ष स्पर्श और सम्पर्क से भी एक ही परिवार के व्यक्तियों को प्रभावित करता है। इस संक्रामक बीमारी में आँखों की पलकों में दाने हो जाते हैं। ये दाने कोर्निया के संपर्क में आकर आँख में खुजली पैदा करते हैं |

रोहे रोग (ट्रैकोमा) के कारण

रोहे रोग या ट्रैकोमा होने के कारण, लक्षण तथा बचाव की जानकारी Trachoma rohe rog karan lakshan ilaj

आँखों की बीमारी ट्रैकोमा

  • घूल मिटटी आँखों में जाने पर अक्सर हम अपनी आँखों को जोर-जोर से रगड़ते है जिससे आँखों के अंदर जख्म बन जाते हैं इन जख्मो की वजह से सूजन और दाने भी हो जाते है रोहे रोग होने का यह एक बड़ा कारण होता है |
  • खराब वातावरण में लगातार रहना, व्यक्तिगत स्वच्छता की कमी तथा प्रदूषित पानी में नहाने से भी यह रोग हो सकता है |
  • मक्खी के द्वारा भी इसके जीवाणु फैलते हैं। यह रोग सूखे धूल वाले मौसम में अधिक होता है | इसके मरीज राजस्थान और गुजरात राज्य में अधिक होते है
  • रोहे रोग को कुछ स्त्रियाँ भी फैलाती हैं, उदाहरण के लिए, वे अपने पल्लू से सफाई भी करती हैं और अपने बच्चों के मुँह आदि भी पोंछती हैं, जिससे इसके कीटाणु बच्चों की आँखों में जाकर रोग फैलाते हैं।
  • बहुत से लोग जब आसपास अधिक रहते हैं तब रोहे रोग के संक्रमण की संभावना अधिक रहती है।
  • माँ जब एक ही उँगली से कई बच्चों को काजल लगाती है, तब भी इस तरह के संक्रमण की आशंका होती है।
  • मक्खियाँ भी रोग फैला सकती हैं।

रोहे रोग (ट्रेकोमा) के लक्षण

  • रोहे रोग का प्रमुख लक्षण आंखों में खुजली होती है। बार-बार आंखों को मलने को जी करता है। रोग की शुरुवात में ऊपर की पलकों के अन्दर की ओर छोटे-छोटे लाल दाने निकलने शुरू हो जाते जाते हैं। इसके कारण ही आंखों में खुजली होने लगती है जिसे रगड़ने या खुजलाने की इच्छा होती है। आंखों से पानी निकलता है। यह पानी शुरू में पतला और रोग बढ़ने पर चिपचिपा व गाढ़ा गोंद जैसा हो जाता है। पलकें सूज जाती हैं। जिससे पलकों के बाल अन्दर की मुड़कर घाव बना देते हैं तथा रोगी हर समय बहुत ही बेचैन रहता है। अन्त में रोगी की देखने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
  • रोहे रोग होने पर आँसू बहना एवं किसी बाहरी वस्तु के चुभने जैसा अहसास होना।
  • आँखें लाल हो जाती हैं एवं खुजली भी होती है।
  • मवादयुक्त स्राव से पलकों का चिपक जाना।
  • कोर्निया में रक्त वाहिनियों के गुच्छे जैसे बन जाते हैं, तथा कोर्निया पर छोटे-छोटे घाव या छाले हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद दाने सूखकर एक झिल्ली सी बन जाती है, यह रोहे रोग का सेकेंडरी इंफेक्शन कहलाता है।
  • रक्त वाहिनियाँ सिकुड़ जाती हैं और रक्त का प्रवाह रूक जाता है।
  • कोर्निया के अल्सर और सफेदी के कारण देखने में परेशानी होती है।
  • पलकें सूज जाती हैं। जो दाने निकलते हैं, बाद में उनमें छाले पड़ जाने के कारण रोगी को तेज़ रोशनी या धूप चुभती हैं।
  • रोहे रोग में पलकों के भीतरी सतह पर खुरदरापन आ जाता है |
  • कुछ जटिलताएँ भी उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे पलकों और आँखों का अंदर की ओर मुडना, पलकों का मोटा व भारी होना।
  • कोर्निया पर प्रभाव होने से दिखने की क्षमता में कमी हो सकती है।
  • रोहे रोग में अंधापन आंख की पटल पर हुए जख्मों और उनके भरने के दौरान आने वाली सफेदी के कारण होता है।
  • बार-बार ट्रेकोमा के होने से संक्रमण में बार-बार चोट लग जाती है जिससे आँखों की झिल्ली और पलकों पर बेहद घातक प्रभाव पड़ता है,
  • गंभीर संकर्मण के लक्षण : किसी भी अन्य प्रकार की कंजक्टिवाइटिस के समान लाल, पीड़ादायक और चिपकने वाली आँख।

रोहे या ट्रॉकोमा से बचाव कैसे करें?

  • रोहे रोग से बचाव के लिए परिवार में तौलिया, रुमाल आदि व्यक्तिगत रूप से अलग-अलग रखें। एक-दूसरे के कपड़ों का इस्तेमाल न करें।
  • जब धूल भरी हवाएं चल रही हो तो उनसे आँखों को बचाएं काला चश्मा पहन कर घर से निकले |
  • आँखों की बिमारियों से बचाव के लिए सार्वजनिक नदी ,तालाब, कुएं या स्विमिंग पूल आदि में नहाने से पहले पानी की गुणवत्ता जरुर जाँच ले |
  • रोहे रोग या अन्य आँखों के इन्फेक्शन से बचाव के लिए काजल लगाने की आदत छोड़ दें तो अच्छा रहेगा। और यदि लगाएँ तो एक बार में एक ही बच्चे को काजल लगाएँ। फिर उँगलियाँ साफ करके दूसरे बच्चे को काजल लगाएँ।
  • घरों में मक्खियों पर नियंत्रण रखें। इसके लिए साफ-सफाई रखें।
  • रोगी व्यक्ति की आँखों से निकले आँसू या कीचड़ पर बैठकर मक्खियाँ स्वस्थ व्यक्ति की आँखों को रोगग्रस्त बना सकती हैं।
  • ट्रॉकोमा से प्रभावित रोगियों का इलाज तुरंत करवाया जाए, ताकि ये रोगी अन्य स्वस्थ व्यक्तियों में रोग न फैला सकें।
  • रोहे रोग के जीवाणु रोगी के आँखों से बहने वाले तरल के द्वारा संपर्क में आने से रोग अन्य व्यक्तियों में फैलता है।

रोहे रोग (ट्रेकोमा) का उपचार

  • ट्रॉकोमा का शुरू में इलाज किया जाए तो यह ठीक हो जाता है। इलाज के लिए लगाने अथवा आँख में डालनेवाली दवाओं के साथ खानेवाली दवाएँ भी दी जाती हैं। रोगी के परिवार के अन्य सदस्यों की जाँच भी करवा लेनी चाहिए, क्योंकि संक्रामक बीमारी होने के कारण परिवार के कई सदस्यों को एक साथ यह रोग अपनी गिरफ्त में ले सकता है। इसलिए सभी का इलाज एक साथ कराना चाहिए। इलाज योग्य चिकित्सक की सलाह से करवाएँ। कभी-कभी ट्रॉकोमा या रोहे में मुड़ी पलकों को ठीक करने के लिए उनका छोटा ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है। कोई भी घरेलू नुस्खा ना आजमायें इसमें समय व्यर्थ हो जायेगा |
  • आँखों के रोगों में हमेशा किसी कुशल डॉक्टर से ही उपचार करवाएं इसमें किसी भी प्रकार ढिलाई नहीं देनी चाहिए |

रोहे रोग की वजह से आँख की बरौनियों का उलटना और (एनट्रोपीय) :

  • यदि ऊपरी होते हैं, तो वे ऊपर बताए गए लम्बे और उचित उपचार से मिट जाते हैं।
  • यदि गहरे होते हैं, तो उनके लिए कॉर्नियल प्रतिरोपण सर्जरी की जरूरत होती है |

रोहे रोग में लाभदायक भोजन

  • इस बीमारी में पीले फल, पपीता, आम एवं अमरूद तथा आंवला आदि खाना चाहिये जिससे विटामिन ‘ए’ शरीर में अधिक मात्रा में प्रवेश करे। पीले फल में विटामिन ‘ए’ अधिक होता है। इसके अतिरिक्त मौसम्बी, संतरा एवं नींबू का प्रयोग भी लाभदायक होता है। रात को सोते वक्त हरे पानी में पट्टी भिगोकर बांधने से भी रोगी को आराम मिलता हैं |
  • बाहरी स्रोत – ट्रेकोमा संक्रमण 

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