गेहूं के जवारे का रस बनाने की विधि तथा घर पर व्हीटग्रास उगाने के तरीके

हरा रक्त यानि ( गेंहू के जवारे अंग्रेजी में इसे Wheat grass कहते हैं ) लम्बे तथा स्वस्थ जीवन के लिए  प्रकृति का दिया हुआ एक अमृत है, जो सभी के लिये लाभकारी है। गेंहू के जवारे का सेवन सभी व्यक्तियों के लिये बहुत उपयोगी है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। कई प्रकार के प्रयोगों द्वारा परीक्षण करने पर यह निष्कर्ष निकला गया है कि आज के युग में भी यह प्रकृति का दिया अनूठा उपहार है और अमृत समान  है। गेंहू के साफ और स्वस्थ बीज को उपजाऊ जमीन या ट्रे में बो दिया जाता है जब यह अंकुरित होकर  बढ़ने लगता है तथा जब इसमें पाँच छ पत्तियाँ निकल आये तब इसे गेंहू के जवारे कहते हैं। कई त्योहारों पर गेंहू के ज्वारों को उगाने, पूजा करने के रिवाज सदियों से चले आ रहे हैं।

गेहूं के ज्वारों से उपचार की पद्धति डॉo विग्मोर ने प्रारम्भ की थी। गेंहू के जवारे में अनेक पोषणदायक और रोगनिवारक तत्व हैं। उन में सभी आवश्यक विटामिन (जैसे – विटामिन ए, विटामिन-सी 100 मि.ग्रा./100 ग्राम, विटामिन बी, विटामिन ई, विटामिन के, लिट्राइल- विटामिन बी, आदि) हैं। इन सभी विटामिन के अतिरिक्त इसमें कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन और वसा भी मौजूद होती है। लिट्राइल से कैंसर जैसी बिमारियों से बचाव होता हैं, किन्तु जवारे का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व है क्लोरोफिल। क्लोरोप्लास्ट्स सूर्यकिरणों की सहायता से पोषक तत्वों का निर्माण करते हैं। यही कारण है कि आविष्कारक वैज्ञानिक डॉ. बर्शर क्लोरोफिल को केन्द्रित “सूर्यशक्ति’ कहते हैं। वास्तव में यह क्लोरोफिल हरे रंग की सभी वनस्पतियों में होता है, लेकिन गेंहू के जवारे में क्लोरोफिल सबसे अधिक मात्रा में होता हैं। गेंहू के जवारे खून में हिमोग्लोबिन बढ़ाने वाला होता है। अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि यदि सभी वनस्पति, सब्जी, फल  या घास में क्लोरोफिल होता है तो फिर गेंहू के जवारे को ही पसंद क्यों किया जाए? इसमें ऐसा क्या खास है ?

गेंहू की घास यानि गेंहू के जवारे सभी घासों में सबसे अधिक विटामिन से भरपूर होती है। गेंहू के जवारे के रस से मनुष्य को आवश्यक सभी प्रकार का पोषण उपलब्ध हो जाता है। गेंहू के जवारे के रस से व्यक्ति को आवश्यक सभी प्रकार का पोषण उपलब्ध हो जाता है। 23 किलो हरी सब्जियों से आपको जितना पोषण मिलता है उतना केवल 1 किलो जवारे से प्राप्त हो जाता है। गेंहू के जवारे का रस एक सम्पूर्ण आहार (a complete food) है। केवल यह रस पीकर भी मनुष्य पूरा जीवन बिता सकता है। उनमें मौजूद  मेग्नेशियम शरीर के भीतर लगभग तीस ऍन्जाइमों की सक्रियता के लिए उपयोगी है। जवारे में विटामिन-डी और विटामिन-बी के आलावा सभी विटामिन बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। जवारे के ताजे रस में उतने ही वजन की मौसम्बियों या संतरों के रस की अपेक्षा काफी अधिक विटामिन-सी पाया जाता है। 100 ग्राम जवारे में 18,000 इकाई विटामिन-ए उपस्थित हैं। उसमें अवस्थित विटामिन-ई हृदय, रक्तवाहिनियों और यौन स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक है। उसमें उपस्थित विटामिन-बी 17 (लिट्राइल) को कई डॉक्टर  कैन्सर को खत्म करने के लिए सही मानते हैं। उसमें अनेक पाचक रस और ऍन्जाइम हैं जो शरीर को विविध रूप में उपयोगी हैं। सौ ग्राम ताजे जवारे में से अंदाजन 90-100 मि.ग्राम क्लोरोफिल प्राप्त होता है। यह क्लोरोफिल अत्यन्त उच्च गुणवत्ता वाला एवं सक्रिय रसायन होता है।

गेंहू के जवारे के रस की रासायनिक संरचना मनुष्य के रक्त की रासायनिक संरचना से काफी मिलती-जुलती है। गेंहू के जवारे का रस और मानव-रक्त दोनों समान मात्रा में क्षारीय (Alkaline) हैं। दोनों का pH एक समान ही है। इसीलिए उसका रस पीने के बाद बहुत जल्दी से पच जाता है और शीघ्रता से रक्त में मिल जाता है और शरीर के उपयोग में आने लगता है खासकर खून बढ़ाने में |

गेंहू के जवारे रक्त व रक्त संचार संबंधी रोगों, रक्त की कमी, उच्च रक्तचाप, सर्दी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, स्थायी सर्दी, साइनस, पाचन संबंधी रोग, पेट में छाले, कैंसर, आंतों की सूजन, दांत संबंधी समस्याओं, दांत का हिलना, मसूड़ों से खून आना, चर्म रोग, एक्जिमा, किडनी संबंधी रोग, कान के रोग, थायराइड ग्रंथि के रोग के इलाज में गेंहू के जवारे एक अनमोल औषधि हैं साथ ही गेंहू के जवारे का रस पीने से बाल असमय सफेद नहीं होते हैं। यदि इसका सेवन 7-8 महीने तक किया जाये तो यह मुहाँसों और उनसे बने दाग, धब्बे और झाइयां भी साफ हो जाते हैं। इस आर्टिकल में हमने केवल गेंहू के जवारे कुछ गुणों को बताया है आगे आने वाले अपने आर्टिकल में हम आपको बतायेंगे आप इसके प्रयोग से आप कितने रोगों से बचाव कर सकते है | यहाँ हम केवल इसको उगाने की विधि तथा रस निकालने की विधि के बारे में बतायेंगे |

गेंहू के जवारे का रस बनाने की विधि 

गेहूं के जवारे का रस बनाने की विधि तथा घर पर व्हीटग्रास उगाने के तरीके गेहूं के जवारे रस बनाने Wheatgrass health benefits

गेहूं के जवारे का जूस कैसे निकालें

  • ताजे काटे हुए जवारे को पानी से धोकर उन्हें सिल पर या मिक्सी में पीस लें। इसके बाद एक साफ़ बारीक सूती कपड़े में रखकर उसे दबाकर रस निचोड़ लें ।
  • कपड़े के बदले प्लास्टिक की जालीदार छलनी का भी उपयोग किया जा सकता है।
  • गेंहू के जवारे को पीसते समय थोड़ा पानी मिलाने से रस आसानी से निकलता है। सादे पानी के बदले लौह चुम्बक से प्रभावित पानी भी मिलाया जा सकता है।
  • इलेक्ट्रिक मिक्सर में डालकर भी ज्वारों को पीसा जा सकता है। समय बचाने और पीसने की झंझट से बचने के लिए अथवा अधिक मात्रा में रस निकालने के लिए मिक्सर अधिक उपयोगी होता है।
  • रस निकालने के बाद उसे तुरन्त पी लेना चाहिए। रस निकालकर उसे रख छोड़ने से उसमें उपस्थित कई उड़नशील तत्व उड़ जाते हैं। उसके बाद उसमें उपस्थित विटामिन- विशेषतः विटामिन ‘सी’ का हवा के कारण (Oxidation) हो जाता है। रस में उपस्थित क्लोरोफिल की सक्रियता में भी कमी होती जाती है।
  • इसलिए रस निकालने के बाद जितना जल्दी हो सके उसको पी जाएं।
  • गेंहू के जवारे का रस पीने की एक विशेष पद्धति है। रस को एक साथ ही न गटगटा पियें, किन्तु उसे एक-एक बूंट करके पीना चाहिए। ऐसा करने से रस में लार का मिश्रण होता है और फलस्वरूप वह पचकर शरीर में अच्छे से मिल जाता है।
  • जिन लोगों को ज्वारों का रस बिल्कुल स्वादिष्ट न लगता हो या पीने से उबकाई आती हो उन्हें जवारे के रस में अंगूर या मौसम्बी का थोड़ा रस मिला लेना चाहिए। लेकिन स्वाद के लिए जवारे के रस में नमक, काली मिर्च या अन्य मसाले न मिलाएं।

गेंहू के जवारे व उसके रस की मात्रा

  • शुरुवात में गेंहू के जवारे या उसके रस की मात्रा कम रंखनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे उसकी मात्रा बढ़ाते जाएं।
  • साधारण बीमारी या तकलीफ के समय दिनभर में लगभग 100 ग्राम गेंहू के जवारे या 100 मि.ली. रस का सेवन करना चाहिए।
  • गंभीर रोगों में 25 से 50 मि.ली. से आरम्भ करें और इसकी मात्रा बढ़ाते हुए 250 से 300 मि.ली. तक पहुंचे।
  • रोग मिटने के बाद भी प्रतिदिन 50 मि.ली. के लगभग रस पीना जारी रखें। इससे स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायता मिलती है। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति इतना रस पीकर रोगों को होने से रोक सकता है।
  • गेहूं के जवारे के नुकसान: -शुरुवात से ही जवारे का रस अधिक मात्रा में पीने से कई लोगो को उबकाई, दस्त या बुखार जैसी तकलीफें हो जाने की संभावना है। इस कारण शुरुवात में रस की मात्रा कम रखकर धीरे-धीरे बढ़ाते जाने की सलाह दी जाती है।
  • जवारे के रस का सेवन करते हुए यदि अच्छा महसूस ना हो तो घबराएं नहीं, ऐसी स्थिति में रस में थोड़ा पानी मिलाकर फिर उसका सेवन करें |

गेंहू के जवारे का सेवन कैसे करें?

  • एक तरीके के अनुसार, गेंहू के जवारे को चबाकर खाने की है और दूसरे तरीके के अनुसार जवारे का रस निकाल कर पीने की है। सबसे पहले यहाँ इन दोनों तरीको के फायदे तथा नुकसान पर एक नजर डाल लेते हैं ।
  • गेंहू के जवारे को चबाकर खाने से उसमें विशेष मात्रा में मुंह की लार मिली होती है। इससे उनके पाचन की प्रक्रिया मुंह में ही शुरू हो जाती है। जवारे चबा लेने के बाद बचे हुए रेशों को थूक दें। फिर भी यदि रेशों के कुछ टुकड़े पेट में चले जाते हैं तो उनसे लाभ ही होता है। जवारे के रेशे कब्ज को रोकते हैं और उसे दूर करते हैं। साथ ही जवारे को चबाकर खाने से दांतों को कसरत मिलती है, दांत स्वच्छ और मजबूत बनते हैं, उसके बाद जवारेमें उपस्थित क्लोरोफिल दांतों की सड़न को दूर करता है या रोकता है।
  • गेंहू के जवारे का प्रयोग करने वाले ज्यादातर वे लोग होते हैं जो किसी न किसी बीमारी की चपेट में होते हैं। उन्हें जवारे में मौजूद रोगनिवारक तत्त्वों की अधिक मात्रा में जरूरत होती है।
  • जवारे को चबाकर खाने की पद्धति इस प्रकार है : ताजा काटे हुए जवारे को पानी में धोकर मुंह में रखें और फिर खूब चबाएं। अन्त में जब सफ़ेद रेशे शेष रह जाएं तो उन्हें थूक डालें। जिन्हें कब्ज की शिकायत रहती हो उन्हें ये सफेद रेशे भी निगल जाने चाहिए। जवारे को खूब चबाने का खास फायदा है। रेशों में भी मूल्यवान तत्त्व और फाइबर होते हैं।

गेंहू के जवारे उगाने की विधि

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ज्वार उगाने का तरीका

गेंहू के जवारे उगाने के लिए निम्न विधि अपनाएं –

  • गमले का चुनाव : गेंहू के जवारे उगाने के लिए लगभग तीन इंच की गहराई और एक वर्ग फुट नाप के 7 गमले लें। यदि घर में आंगन हो तो उसमें छोटी-सी क्यारी बनाकर भी गेहूं के बीज बोए जा सकते हैं।
  • मिट्टी और खाद : गेंहू के जवारे उगाने के लिए बहुत चिकनी या रसायन मिश्रित मिट्टी काम में न लें, अन्य कोई भी सामान्य मिट्टी चल जाएगी। रसायन मिश्रित मिट्टी उपयोग में न लें | यह भी पढ़ें – गेहूं के जवारे का रस के फायदे : व्हीट ग्रास जूस के औषधीय गुण
  • गेंहू के जवारे के अच्छे विकास के लिए और उसमें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों के समावेश के लिए मिट्टी में खाद डालनी चाहिए। गावों में तो गोबर की खाद आसानी से मिल जाती है, किन्तु शहरों में इस किस्म की खाद मिलने में कठिनाई पड़ती है। इसलिए शहरों में ‘कम्पोस्ट’ नाम की तैयार खाद मिलती है। उसी का उपयोग किया जा सकता है, लेकिन सभी रासायनिक खादों का उपयोग न करें।
  • जवारे की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए तीन भाग मिट्टी और एक भाग खाद की मिलावट अच्छी रहती है। मिट्टी और खाद के इस मिश्रण को गमले में इस ढंग से भरें, की गमले के ऊपर वाला हिस्सा लगभग आधा इंच खाली रहे।
  • गेहूं की किस्म : जवारे उगाने के लिए अच्छी किस्म के और बड़े दाने वाले गेंहू लें। हर बार बोने के लिए लगभग सौ ग्राम गेंहू लें। इतने गेंहू से लगभग 100 ग्राम जवारे प्राप्त हो जाते हैं, जिनसे 4 से 6 औंस रस निकलता है। एक व्यक्ति के लिए इतनी मात्रा पूरे दिन के लिए काफी होती है।
  • बोने के पहले गेंहू के दानों को अंकुरित कर लें। इसके लिए गेंहू को सबसे पहले लगभग 12 घण्टे तक थोड़े पानी में भिगोकर रखें। इतने समय में गेहूं अच्छी तरह फूल जाते हैं। इन फूले हुए गेंहू को एक भीगे मोटे कपड़े में 12 से 14 घण्टों तक सख्ती से बांधे रखें। इतने समय के भीतर गेंहू अंकुरित हो जाते हैं। गेंहू को अंकुरित करने की प्रक्रिया उपयोगी है। यदि गेंहू बिल्कुल नए हों, सड़े हुए हों या घुन लगे हुए हों तो ऐसे गेंहू नहीं उगते। उन्हें अंकुरित करने से उनकी गुणवत्ता फौरन मालूम हो जाती है यानि कितने प्रतिशत गेंहू उग सकते हैं यह पता चल जाता है। दूसरी ओर यदि गेंहू अंकुरित किये बगैर बोए जाएं तो चौथे या पांचवें दिन उसकी गुणवत्ता मालूम होती है। यदि गेंहू उगते नहीं हैं तो गेंहू, मिट्टी, खाद, मेहनत आदि सभी कुछ खराब हो जाता है। दूसरी ओर निर्धारित दिन को आवश्यक मात्रा में जवारे नहीं मिलते। पानी में भिगोने के बाद और भीगे कपड़े में बांधने के बाद यदि केवल 50 प्रतिशत गेंहू ही अंकुरित हों तो 100 ग्राम के बदले 200 ग्राम गेंहू बोना आवश्यक है। इसके अलावा निर्धारित समय में जवारे भी तैयार हो सकते हैं।
  • गेंहू के जवारे उगाने की विधि : अंकुरित गेहूं मिट्टी के ऊपर बहुत पास-पास गेहूं के दानों को मिट्टी पर इस प्रकार बिछा दें कि दानों का आपस में स्पर्श होता रहे। इसके बाद उन पर थोड़ा पानी छिड़क दें। पानी उड़ेलना नहीं है, बस छिड़कना है। अधिक मात्रा में पानी सींचने से गेहूं सड़ जाते हैं।
  • गेंहू के जवारे पर सामान्य पानी छिड़कने के स्थान पर यदि लौह चुम्बकों से प्रभावित किया हुआ पानी छिड़का जाए तो जवारे बहुत तेज़ी के साथ उगते हैं और उनमें पोषक तत्व भी अधिक होते हैं यह कई प्रयोगों द्वारा पता चला है। आप चाहे तो इस पानी से सिंचाई कर सकते है पानी को चुंबकांकित बनाने की विधि सबसे नीचे दी गई है |
  • उगाए हुए गेंहू के जवारे पर सामान्यतः 24 घण्टे में एक बार ही पानी छिड़कना चाहिए। पानी के छिड़काव के लिए दोपहर के बाद या शाम के पहले का समय अच्छा माना जाता है। गर्मियों में दो-तीन बार पानी छिड़कने की आवश्यकता रहती है। गमले को तीन-चार घण्टे से अधिक समय तक धूप में न रहें इसका ध्यान रहे। दोपहर में धूप कड़ी होती है अतः उस समय गमले छाया में ही रखें।
  • याद रहे कि एक दिन में केवल एक गमला ही तैयार करना है, सातों गमले एक साथ तैयार नहीं करने हैं। पहले दिन पहले गमले में 100 ग्राम गेंहू बोएं। दूसरे दिन दूसरे गमले में और तीसरे दिन तीसरे गमले में गेहूं बोएं। इस प्रकार सात दिनों के भीतर सातों कुण्डों में सौ-सौ ग्राम गेंहू बोएं। पहले कुण्डे में बोए हुए गेंहू की घास आठवें दिन काटने के योग्य हो जाती है यानि 4-5 इंच ऊँची हो जाती है। आठवें दिन कैंची से ज्वारों को नीचे से काट लें और धोकर उपयोग में लें । ज्वारों को जड़ से न उखाडे ।
  • गेंहू के जवारे को 4-5 इंच से अधिक ऊँचा न होने दें, क्योंकि बाद में उनमें से क्लोरोफिल और अन्य पोषक तत्व कम होने लगते हैं। उसके बाद उनमें कोमलता भी कम होने लगती है जिससे रस कम निकलता है।
  • गेंहू के जवारे काट लेने के बाद गमले की मिट्टी निकालकर धूप में सुखाने के लिए रख दें। चार-पांच दिनों के बाद इस मिट्टी को फिर से उपयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार उपयोग में ली जाने वाली मिट्टी में हर बार थोड़ी नई मिट्टी और खाद मिला कर इस्तमाल किया जा सकता है। यह भी पढ़ें – दूब घास के फायदे तथा औषधीय गुण जो कई रोगों को करे दूर
  • गमले और उगते हुए ज्वारों की देख-भाल : कबूतरों, चिड़ियों और चूहों से ज्वारों को बचाने के लिए लकड़ी या लोहे के पिंजरे का उपयोग करें। ताकि हवा और सूर्यप्रकाश मिलते रहें।
  • उत्तरी भारत में बहुत अधिक तेज़ गर्मी के दौरान यह संभव है जवारे ठीक से न उगें। ऐसे समय में गेहूं के बदले मकई के दानों को बोकर मकई की घास का उपयोग करें। हालाँकि पोषक तत्वों एवं विटामिन के लिहाज से मकई की घास गेंहू की घास (जवारे ) की अपेक्षा थोड़ी कम उपयोगी है। मकई का दाना आकार में बड़ा होने से 100 ग्राम के बदले 40-45 ग्राम बोने से ही काम चल जाता है। ये फायदा जरुर है मकई के जवारे का |

पानी को चुंबकांकित करने की विधि  :

  • एक कांच के गिलास में पानी लें । एक शक्तिशाली (लगभग 2000 गॉस शक्ति वाले) लौह चुम्बकों की एक जोड़ी (पेयर) लें ताकि पानी उनके द्वारा प्रभावित हो, प्रत्येक लौहचुम्बक के दो ध्रुव होते हैं उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव। लोहचुम्बकों को इस प्रकार जमाइंए कि पानी भरे हुए गिलास की एक ओर उत्तर ध्रुव और दूसरी ओर दक्षिण ध्रुव रहे। बारह से पन्द्रह घण्टे में पानी लौह चुम्बकांकित हो जाता है।

यदि किसी आप किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति हैं तो गेंहू के जवारे का प्रयोग कराना चाहते है तो आप अपने वर्तमान इलाज को बंद किए बिना भी गेंहू के जवारे का सेवन कर सकते है। क्योंकि इससे किसी भी  चिकित्सा पद्धति में गेहूं के जवारों के प्रयोग से कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं आते है, क्योंकि यह औषधि ही नहीं है बल्कि एक आहार भी है।

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