गर्भकालीन मधुमेह: कारण लक्षण बचाव और सावधानियां

गर्भकालीन मधुमेह, जैस्टेशनल डायबिटीज गर्भावस्था के दौरान विकसित होता है। आमतौर पर गर्भावस्था समाप्त होने पर यह अपने आप ही ठीक हो जाता है | जिन महिलाओं में प्रेगनेंसी के दौरान डाइबिटीज़ रोग होता है उनके  अपने जीवन में आगे 5 से 10 वर्षों में मधुमेह की बीमारी फिर से होने का 20 से 50 प्रतिशत तक खतरा होता है। यदि इस दशा का उपचार न किया जाए तो यह मां और बच्चे के लिए कठिनाई का कारण बन सकती है।

गर्भकालीन मधुमेह होने का भय निम्नलिखित महिलाओं में अधिक होता है :

  • तीस साल से ज्यादा उम्र में गर्भधारण होने वाली स्त्रिया ।
  • परिवार में बिना इंसुलिन निभर मधुमेह का इतिहास होना ।
  • आनुवांशिक अत्यधिक मोटा होना ।
  • पूर्व संतान का डिलिवरी के समय वजन 4 किलो या अधिक होना।
  • पूर्व प्रसव में मृत बच्चे की डिलिवरी होना।
  • प्रसव दौरान पेट में पानी का अधिक होना ।
  • खास क्षेत्र से जैसे कि भारतीय, एशियाई, प्रशांत महासागर के द्वीपों की महिला होना।

गर्भकालीन मधुमेह में सही देखभाल न करने से निम्नलिखित समस्या हो सकती है :

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Diabetes During Pregnancy

  • गर्भकालीन मधुमेह से शिशु मृत्युदर में वृद्धि
  • गर्भकालीन मधुमेह से कष्टप्रद प्रसव
  • बच्चे में जन्मजात विकृति
  • यदि किसी को गर्भावस्था का मधुमेह हो, तो बेहतर है कि देखरेख करने के लिए अपने डॉक्टर से लगातार संपर्क करें।
  • महिला अगर गर्भकालीन मधुमेह से पीड़ित तो इसका प्रभाव बच्चे पर पड़ता है। गर्भ में ही बच्चे का आकार बढ़ जाता है। जिससे डिलीवरी के दौरान परेशानियां होती है और पीलिया की संभावना बढ़ जाती है।
  • गर्भकालीन मधुमेह में अक्सर ऐसे लक्षण नहीं होते हैं, जिन्हें आसानी से पहचान लिया जाए, मगर आपको निम्नांकित कुछ लक्षण महसूस हो सकते हैं:
  • थकान
  • मुंह सूखना
  • अधिक प्यास लगना
  • अत्याधिक पेशाब आना
  • कुछ संक्रमण रोग बार-बार होना
  • धुंधला दिखाई देना

गर्भकालीन मधुमेह: सावधानियां एवं उपाय

  • नियमित चिकित्सकीय परीक्षण कराएं
  • गर्भकालीन मधुमेह में संतुलित आहार लें
  • गर्भावस्था में नियमित व्यायाम करें

गर्भकालीन मधुमेह स्वास्थ्यपूर्ण आहार के लिए टिप्स

  • खाने में अलग-अलग तरह के अन्न खाएं।
  • भोजन और अन्य नाश्ता नियमित रूप से करें।
  • हर भोजन में और नाश्ते में कार्बोहाइड्रेट युक्त अन्न (स्टार्च) जैसे कि अनेक तत्वों से बनी डबलरोटी, पास्ता, फल और सब्जियों का प्रयोग करें।
  • बड़ी मात्रा में चीनी डाले हुए अन्न और पेय को न लें।
  • कम चर्बी वाली रसोई पकाएं और कम चर्बीवाले उत्पादन चुनें।
  • गर्भकालीन मधुमेह में आहार तथा विहार की योजना कैसी हो :
  • कैलरी ठीक मात्रा में मिलती रहे, जो वजन सही रखने में मदद करे, जिससे गर्भधारण के सही परिणाम प्राप्त हों ।
  • भोजन को चबा-चबाकर लें, वरना पेट में स्थित अंगों को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ सकती है। यही अनियमितता मधुमेह का कारण बन सकती है। भोज्य पदार्थ को बिना चबाए न निगलें।
  • बिना पकी सब्जियों (सलाद) अंकुरित अनाज का अधिक सेवन करें।
  • गर्भकालीन मधुमेह में चपाती, ब्रेड, आलू, दलिया जैसे कार्बोहाईड्रेट-युक्त आहार लें। मौसमी फलों तथा सब्जियों (सलाद) का सेवन अवश्य करें। उपवास से बचें।
  • गर्भकालीन मधुमेह में अधिक चिकनाईयुक्त भोजन से बचें। भुना आहार लें – गुड़, चीनी, शहद, केक, चाकलेट के अधिक सेवन से बचें।
  • हर भोजन के बाद पैदल चलें, चाहे घर ही में क्यों न हो, इससे रक्त में भोजन के बाद बनने वाली शर्करा के स्तर में सुधार होगा।
  • धूम्रपान तथा शराब से दूर रहें। – शुगर-लेवल बराबर चेक कराते रहें। – दवाइयां आप वैसे ही लेते रहें, जैसे चल रही हैं।
  • व्यायाम में टहलना, किसी एक्सपर्ट की देखरेख में योग (सूर्य नमस्कार) करें, अति लाभदायक होगा, खाली पेट व्यायाम न करें। हलका नाश्ता लेकर ही करें |
  • बाहर के खाने से बचे।
  • बहुत पानी पीएं।
  • यदि आहार और नियमित व्यायाम से गर्भावस्था का मधुमेह नियंत्रण में न आए तो गर्भावस्था के बचे हुए समय के लिए इंसुलिन की सुइयां लेना आवश्यक होगा। ये मां और उसके बच्चे, दोनों के लिए सुरक्षित होती है।
  • मधुमेह का उपचार करने वाली गोलियों का गर्भावस्था में उपयोग नहीं किया जाता है। अगर अन्य कोई और समस्या न हो तो, गर्भावस्था सामान्य रूप से पूरी होकर स्वस्थ बच्चा पैदा होता है।
  • मधुमेह के रोगी में गर्भावस्था के दौरान की देखभाल गर्भावस्था की अवधि पर निर्भर होती है जैसे कि गर्भवती होने से पहले अगर किसी को मधुमेह रोग है और वह बच्चा चाहती है, तो गर्भ धारण करने से पहले खून में ग्लूकोज़ की मात्रा अच्छी तरह नियंत्रित करनी जरुरी है।
  • गर्भ धारण करने से पहले डॉक्टर से परामर्श अवश्य (क्या खाना चाहिए और किन खानों से परहेज़ रखना चाहिए) के बारे में समझ लें।
  • गर्भावस्था में अपने वजन बढ़ने पर नियंत्रण रखें। अगर, आप गर्भावस्था से पहले आपका वजन सही था, तो गर्भावस्था के नौ महीनों में शायद आपका 10.5 किलो से 11 किलो तक वजन बढ़ सकता है।

गर्भावस्था के शुरुवाती  दिन : पहली तिमाही (सप्ताह 9 से 16) :

  • इस समय के दौरान बच्चे के बड़े अंग जैसे दिल दिमाग और स्नायुओं की सप्लाई में विकास होने लगता है। इसी अवधि में बच्चे में आखें, कान और नाक का विकास भी होता है।
  • बच्चे के विकास की जांचने के लिए कुछ टैस्ट करवाना आवश्यक है जैसे कि अल्ट्रासाउंड स्कैन ( गुर्दो की जांच (खून का परीक्षण) आखों की जांच, ब्लड प्रेशर की जांच आदि |
  • कुछ महिलाओं को कभी-कभी बहुत उबकाई आती है। इसके लिए उनको अपने चिकित्सक से लगातार संपर्क में रहना चाहिए ताकि उनका खाना-पीना और इंसुलिन की मात्रा समान हो सके।

गर्भावस्था के बीच वाले सप्ताह : दूसरी तिमाही (सप्ताह 16-28) :

  • बच्चे के शरीर और सिर दोनों एक ही गति से बढ़ने लगेंगे और बच्चे का हिलना-डुलना महसूस होता है। बच्चे के विकास की जांचने के लिए कुछ और टैस्ट करवाना आवश्यक है। डायबिटीज डाइट चार्ट वेजीटेरियन-मधुमेह आहार तालिका |
  • एक और अल्ट्रासाउंड स्कैन ये देखने के लिए कि कहीं आपके बच्चे में कोई खराबी तो नहीं
  • खून के परीक्षण या ब्लड प्रेशर |
  • इस दौरान बच्चे की वृद्धि के साथ इंसुलिन की अधिक मात्रा की – आवश्यकता होती है और लगातार खून में ग्लूकोज़ की मात्रा की जाँच बहुत जरुरी होती है |

अन्तिम सप्ताह : तीसरी तिमाही (सप्ताह 28-40) :

  • इस अवधि में बच्चा बहुत तेजी से बढ़ता है और उसे विकास के लिए बहुत अधिक भोजन की आवश्यकता होती है।
  • इस दौरान कुछ और जांच करवाना आवश्यक है जैसे कि एक और अल्ट्रासाउंड स्कैन जो डॉक्टर को यह फैसला करने में मदद देगा कि बच्चे का कब और कैसे प्रसव होगा।
  • इस अवधि में इंसुलिन की मात्रा को और बढ़ाना आवश्यक होगा।
  • खून में ग्लूकोज़ की मात्रा की लगातार जांच कराते रहना चाहिए।

गर्भकालीन मधुमेह का बच्चे पर प्रभाव

यदि मधुमेह की अच्छे से देखभाल की जाए तो बच्चा बड़े शरीर वाला हो सकता है जिससे डिलीवरी और कठिन हो जाती है। जन्म के बाद थोड़े समय के लिए बच्चे का ग्लूकोज़ स्तर कम भी हो सकता है। ये बच्चा जन्म से मधुमेह पीड़ित होकर नहीं होगा हालाँकि, बच्चे के बड़े होने पर मधुमेह होने की संभावना अधिक होती है।

डिलीवरी के बाद अपने मधुमेह पर नियंत्रण

बच्चे को जन्म देने के बाद कम मात्रा में इंसुलिन की जरूरत होती है। बच्चे को माँ का दूध पिलाने से खून में ग्लूकोज़ की मात्रा कम हो जाती है | यदि वह अपना दूध पिलाती है, तो उसे अधिक पेय पदार्थ की जरूरत होगी।

बच्चे के जन्म होने के बाद मधुमेह प्रायः ठीक हो जाता है। खून का ग्लूकोज़ पुनः सामान्य स्तर पर आ जाता है ये पक्का करने के लिए डिलीवरी के छ: सप्ताह बाद खून की ग्लूकोज़ जांच की जाती है। फिर भी, गर्भावस्था का मधुमेह होने वाली औरतों को जीवन में आगे चलकर बिना इंसुलिन निर्भर मधुमेह से ग्रस्त होने का अधिक बना रहता है।

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