जानिए सार्स रोग क्या है ? इस संक्रामक रोग से अपना बचाव कैसे करें ?

सार्स रोग क्या है? – ऐसा समझा जाता है कि सार्स बीमारी की शुरुआत 2002 में चीन के गुआंगडाँग इलाके से हई जो बाद में सिंगापुर, हांगकांग, वियतनाम, ताइवान, कनाडा और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला। फिर भारत भी इसका शिकार बना। सार्स (Severe Acute Respiratory Syndrome) : अत्यन्त एक संक्रामक (संचारी) रोग है जिसके कारण इलाज के अभाव में रोगी की मृत्यु हो जाती है। कई बार सार्स के लक्षण निमोनिया जैसे रोगों से मिलने के कारण रोग की सही पहचान नहीं हो पाती। इसलिए इस रोग की प्रयोगशाला में जाँच जरूरी है।

वास्तविकता यह है कि रोग की शुरुआत के कई वर्ष बाद भी इस रोग के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। अभी तक न तो रोग का टीका और न रोग का इलाज खोजा जा सका है। फिर भी रोग के बारे में जो तथ्य उपलब्ध हैं उनकी जानकारी यहाँ दी जा रही है। ताकि लोग इस भयानक रोग से बचाव कर सकें। “सार्स रोग श्वसन संस्थान का एक ऐसा रोग है जो एकदम सांस लेने सम्बन्धी तकलीफें जैसे खाँसी, साँस लेने में कठिनाई इत्यादि उत्पन्न करता है। साथ ही रोगी को बुखार भी रहता है। इसमें दम घुटने से रोगी की मृत्यु होती है।

रोग का कारण :

सार्स रोग जैसे खतरनाक रोग की वजह बनते हैं छोटे से वाइरस या विषाणु जो साधारण माइक्रोस्कोप से भी नहीं दिखते हैं। इन विषाणुओं को शरीर में आसानी से नष्ट भी नहीं किया जा सकता है। लेकिन वाइरस शरीर के बाहर कुछ घंटे ही जीवित रह सकते हैं। सार्स का विषाणु जुकाम पैदा करनेवाले समूह से ही सम्बन्धित सदस्य है। सार्स विषाणु कोरोना वायरस समूह का है. इसी समूह के सीवियर एक्यूट रेस्पीरेटरी सिंड्रोम (सार्स) विषाणु भी है जो आजकल एक बहुत बड़ी माहमारी के रूप में दुनिया भर में तेजी से फ़ैल रहा है |

सार्स रोग के लक्षण :

जानिए सार्स रोग क्या है ? इस संक्रामक रोग से अपना बचाव कैसे करें ? sars virus kya hai bachav karan lakshan

  • सूखी खाँसी
  • 100 फारेनहाइट से अधिक बुखार और बदन दर्द, सिर दर्द |
  • साँस लेने में कठिनाई होना (निमोनिया हो जाना)
  • दस्त, अतिसार
  • सूंघने और स्वाद की क्षमता में कमीः बहुत से मामलों में पाया गया है कि (आजकल फैली कोरोना बीमारी) से संक्रमित लोगों को सूंघने और स्वाद की क्षमता में कमी आती है |

सार्स से बचाव के तरीके :

  • सार्स रोगी के पास मास्क पहनकर जाएँ।
  • सार्स रोगी को अलग कमरे में रखना चाहिए।
  • लगातार हाथ साफ़ करें. साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।
  • अगर कोई व्यक्ति सार्स की चपेट में है, तो उसके संपर्क में कम से कम आने का प्रयास करें। उसके कपड़े, तौलिया, साबुन आदि इस्तेमाल न करें।
  • सार्स जैसे लक्षणों वाले रोगियों की सूचना तुरन्त चिकित्सा अधिकारी को दें।

रोग कैसे फैलता है:

  • यह रोग, रोगी के सम्पर्क में आने तथा संक्रमित वस्तुओं से फैल सकता है।
  • संक्रमित व्यक्ति के साँस छोड़ने या खाँसने से तथा नाक द्वारा भी विषाणुयुक्त छोटी-छोटी बूंदें निकलती हैं जिन्हें ड्रापलेट्स कहते हैं। ये जब स्वस्थ व्यक्ति के सम्पर्क में आती हैं तो उसे रोग हो सकता है।
  • वैसे सार्स हवा दवारा फैलने वाला रोग (Air borm disease) नहीं है। हांगकांग में मनुष्यों के मल, नालियों के गन्दे पानी और काकरोच से रोग फैलने की भी सम्भावना जताई गई थी। कुछ का मानना है दरवाजों के हत्थे जैसी चीजें भी रोग फैलाती हैं।
  • सार्स का वाइरस मनुष्य के शरीर के बाहर किसी भी वस्तु की सतहों पर कई घंटे जीवित रह सकता है। और मनुष्य के शरीर से निकले बलगम, मल-मूत्र इत्यादि में यह 4 दिनों तक जिन्दा रह सकता है। इसके अलावा यह प्लास्टिक की सतह पर कमरे के तापक्रम में 24 घंटे जीवित रह सकता है और ठंडे माहौल में और भी अधिक समय तक जिन्दा रह सकता है। सार्स प्रभावित क्षेत्रों से वापस आनेवाले कई व्यक्तियों में भी यह रोग पाया गया था।

बीमारी का उद्भवन काल (Inclubation Period) :

  • विषाणु के प्रवेश के पश्चात् बीमारी के लक्षण आने में 2 से 7 दिनों तक का समय लगता है। वैसे सामान्यतया उद्भवन काल 3 से 5 दिन होता है। (कुछ मामलों में यह दस दिन भी हो सकता है)
  • रोग के लक्षण गम्भीर निमोनिया से मिलते-जुलते हैं। लेकिन सार्स के मामलों में रोगी का अन्य सार्स रोगी के निकट सम्पर्क में आना अथवा सार्स प्रभावित क्षेत्रों में रहना पाया गया है। इस रोग में रोगी की स्थिति तेजी से बिगड़ती है। कोई भी दवा विशेष फायदा नहीं करती और रोगी की मृत्यु हो सकती है।

रोगी की जाँचें :

  • रोगी की एक्स-रे जाँच में फेफड़ों में धब्बे दिखते हैं तथा साँस, घुटने (Distress) के लक्षण भी दिखते हैं। (कई बार फेफड़ों में खराबी नहीं दिखती) रोगी के फेफड़ों का अध्ययन (Autopsy) करने पर उनमें सॉस घुटने (Respiratory Distress) के चिहन तो मिलते हैं लेकिन अन्य कोई रोग समझ में नहीं आता है।

रोग का संक्रमण और फैलाव

  • रोगी में बीमारी के दसवें दिन श्वसन संस्थान से रोग के वायरस अधिक मात्रा में पैदा होते हैं। इसलिए इस समय रोगी अन्य स्वस्थ व्यक्तियों में बीमारी फैलाने में अधिक सक्षम होता है। लेकिन यदि रोगी को पाँचवें दिन से ही अलग कमरे में रख दिया जाए तो वह बहुत कम व्यक्तियों में रोग फैला पाता है।
  • बच्चे सार्स से कम प्रभावित होते हैं। अभी तक दो मामले ऐसे मिले हैं, जिनमें बच्चों में वयस्क से रोग फैला है। लेकिन बच्चे से बच्चे में सार्स रोग फैलने के प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं। ऐसी माँ के शिशु में भी रोंग नहीं पाया गया जो गर्भावस्था के दौरान सार्स से ग्रस्त थी।

रोग की पहचान के लिए परीक्षण :

  • पहचान के लिए जो जाँचें की जाती हैं उनके ऋणात्मक परिणाम आने पर 100 प्रतिशत यह नहीं कहा जा सकता है कि रोगी को सार्स नहीं है। निदान के लिए एलाइजा, पी.सी.आर. और इम्यूनो फ्लोरोसेंस नामक जाँचें करते हैं। लेकिन इम्यूनो फ्लोरोसेंस जाँच के परिणाम रोग के दसवें दिन ही सही मिल पाते हैं। अत: चिकित्सक लक्षणों के आधार पर तुरन्त इलाज शुरू कर देते हैं।

रोग का इलाज :

  • इस रोग का कोई विशेष और प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है। रोग प्रतिरोधक दवाओं का भी असर रोगी पर नहीं होता तथा रोग के वाइरस को नष्ट करनेवाली विशेष दवा उपलब्ध नहीं है। फिर भी अन्य विषाणु रोधी दवाएँ जैसे-राइबोविरिन को नस दवारा देते हैं साथ में कार्टिको स्टेराइड की अधिक मात्रा भी देते हैं। इस इलाज से कुछ फायदा रोगी को मिलता है।
  • अपनी इम्यूनिटी पावर यानि शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत को मजबूत रखना भी एक बचाव का उपाय है  – इम्यूनिटी पावर बढ़ाने के उपाय, खानपान, घरेलू नुस्खे |

ऐसे संक्रामक रोगों का खतरनाक होने का कारण

  • ऐसा नहीं है की ऐसे संक्रामक रोग होने पर सभी रोगियों की मौत हो जाती है | ऐसे संक्रामक रोगों में म्रत्यु दर बहुत सामान्य होती है जो 7-8 प्रतिशत के आसपास होती है | लेकिन असल समस्या होती है की, एक साथ लाखो लोगो के बीमार पड़ जाने से डॉक्टर तथा हॉस्पिटल और अन्य जरुरी चिकित्सा सुविधाएँ कम पड़ने लगती है जिसकी वजह से रोगियों को उचित इलाज नहीं मिलता और उनकी बीमारी बढ़ने लगती है और अंत में रोगी इलाज में देरी से मर जाता है |
  • दूसरा कारण होता है की मरीज में पहले से ही कोई रोग मौजूद हो जैसे टीबी, मधुमेह या दिल से जुडी बीमारियाँ इससे भी संक्रामक रोग कमजोर शरीर को आसानी से जकड़ लेता है |

सार्स जैसे संक्रामक रोगों से बचाव :

  • रोगी की तुरन्त पहचान और अस्पताल में उसे लोगों या अन्य रोगियों के सम्पर्क से अलग करना भी बचाव का एक उपाय है।
  • सार्स मरीज की चिकित्सा और देखभाल करनेवाले डॉक्टर, नर्स एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमण से बचाने के लिए पर्याप्त सावधानियों का उपयोग भी रोग फैलने पर नियंत्रण ला सकता है। जैसे कि मास्क का उपयोग इत्यादि।
  • अपने शरीर का इम्यून सिस्टम हमेशा मजबूत बनाये रखे ताकि ऐसे संक्रामक रोगों से आप अपना बचाव बेहतर ढंग से कर पायें |

W.H.O द्वारा सुझाए गये कुछ अन्य उपाय ये है :

इस महामारी के फैलाव दौरान ये करें

  • साबुन और पानी या अल्कोहल-आधारित हाथ रगड़ के साथ अपने हाथों को 20 सेकंड के लिए नियमित रूप से धोएं
  • खांसने या छींकने पर अपनी नाक और मुंह को डिस्पोजेबल टिश्यू या मुड़ी हुई कोहनी से ढक लें
  • उन लोगों के साथ निकट संपर्क (1 मीटर या 3 फीट) से बचें जो अस्वस्थ हैं |
  • घर में रहें और घर में दूसरों से अलग-थलग रहें |
  • श्वसन स्वच्छता का पालन करें –यह सुनिश्चित करें कि आप, और आपके आस-पास के लोग, अच्छी श्वसन स्वच्छता का पालन करें। इसका मतलब है खांसी या छींक आने पर अपनी मुड़ी हुई कोहनी या रूमाल से अपने मुंह और नाक को ढंकना। फिर इस्तेमाल किए गए रुमाल को तुरंत फेंकना या एल्कोहल से साफ़ करें।
  • अगर आपके हाथ साफ नहीं हैं, तो अपनी आँखें, नाक या मुँह न छुएँ | साथ ही दरवाजे के हैंडल, मोबाइल फोन जैसी चीजों को छूने के बाद हाथों को जरूर धोएं |
  • भीड़ वाली जगहों पर जाने से बचें |

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