जानिए क्या होते हैं प्रसव पीडा के लक्षण : Signs and Symptoms of Labor

गर्भावस्था का लंबा सफर तय करने के बाद एक दिन वह घड़ी आ ही जाती है जिसमे स्त्री को थोड़ी खुशी और थोड़ी चिंता की एक मिलीजुली एक नई अनुभूति का अहसास होता है इस अनुभूति के साथ ही प्रत्येक गर्भवती स्त्री को इस दिन का इंतजार बड़ी बेसब्री से रहता है। सामान्यतया डॉक्टर आखिरी माहवारी के पहले दिन की तारीख में नौ महीने सात दिन जोड़कर आनुमानिक ढंग से प्रसव (डिलीवरी) का दिन निर्धारित कर देते हैं। कई बार यह अंदाजा 10-15 दिन आगे-पीछे भी हो सकता है। इसीलिए एक-दो दिन बीत जाने पर घबराना नहीं चाहिए बल्कि जो करना है उसके बारे में ठंडे दिमाग से सोचना चाहिए। सामान आदि ठीक से रखना, मेटरनिटी बैग को तैयार रखना, अस्पताल जाने के लिए गाड़ी की व्यवस्था आदि करना जैसी छोटी-मोटी बातों के विषय में पूरी प्लानिंग कर लेना चाहिए, अस्पताल के डॉक्टर या नर्स से बातचीत करके भर्ती होने के साधारण नियमों को जान लेना चाहिए। पहली बार गर्भवती हुई स्त्री को प्रसव के प्रारंभिक चरण से बच्चा होने तक पर्याप्त समय मिलता है, शरीर में किसी तरह की बेचैनी या बच्चेदानी में सिकुड़न  आदि अनुभव करने पर अच्छी तरह से पता करना चाहिए कि सारे लक्षण प्रसव के संकेत दे रहे हैं या नहीं । प्रसव की आरंभिक स्थिति को जानने-समझने के कुछ उपाय हैं। इस आर्टिकल में हम उनके बारे में बताएँगे। उन्हें अच्छी तरह से समझ लेने पर आपको दूसरी तरह के पेटदर्द और प्रसव के दर्द में फर्क मालूम हो जाएगा।

प्रसव पीडा के लक्षण

prasav pida ke lakshan Labor Signs जानिए क्या होते हैं प्रसव के लक्षण : Signs and Symptoms of Labor

Signs and Symptoms of Labor Pain

  • प्रसव का प्रथम चरण प्रसव का समय नजदीक आते जाने पर शरीर में थोड़ी थकान अनुभव कर सकती हैं; हाजमे में गड़बड़ी, दस्त, नींद की कमी, भूख का न लगना, बार-बार पेशाब लगना और पेट का निचला हिस्सा भारी होता जाता है। प्रसव शुरू होने के तीन संकेत हो सकते हैं। ये लक्षण या संकेत अलग-अलग या एक साथ भी हो सकते हैं। इसके साथ ही निम्नलिखित कुछ और लक्षणों की ओर भी ध्यान रखना चाहिए |
  • बच्चेदानी का सिकुड़न : प्रसव का प्रथम आभास है बच्चेदानी में सिकुड़न  की अनुभूति सामान्यतया सुन्न हो जाने जैसी एक अनुभूति कमर से होती हुई पेट के निचले हिस्से से होकर जाँघों और पैरों में फैल जाती है। इस सुन्न स्थिति के बढ़ने से माँ खुद समझ जाती है कि बच्चेदानी संकुचित हो रही है। इसके साथ थोड़ा दर्द होता है इसीलिए बच्चेदानी के संकुचने को दर्द उठना कहा जाता है। इस तरह से प्रत्येक 15 मिनट बाद नियमित रूप से सुन्न होने का आभास होता है और 10-15 सेकेंड बाद ही बच्चेदानी की पेशियाँ पुनः शिथिल हो जाती हैं। कुछ देर तक इस तरह के सिकुड़न  के बाद क्रमशः बच्चेदानी का मुँह नरम और थोड़ा प्रसारित हो जाता है। इस समय बच्चेदानी के मुंह से सफेद और लाल रंग का श्लेष्मास्राव निकलता है और वह योनिपथ को नरम करने में सहायता करता है। एक के बाद एक बच्चेदानी का सिकुड़न  और श्लेष्मास्राव शुरू होने पर समझ लेना चाहिए कि अब सचमुच प्रसव का समय आ गया है |
  • म्यूकस का डिस्चार्ज प्रसव का समय आने पर गर्भाशय से गाढ़े गुलाबी या भूरे रंग का श्लेषमीय पदार्थ निकल सकता है। गर्भावस्था के बाद यह पदार्थ गर्भाशय में जमा होता रहता है और गर्भाशय को संक्रमण से बचाता है।
  • प्रसव के एक दिन या कुछ घंटे पहले गर्भाशय स्वयं को उस संरक्षात्मक श्लेष्मक से मुक्त करती है और स्राव योनि के रास्ते बाहर आने लगता है। यह प्रक्रिया इस बात का संकेत है कि शरीर बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार हो रहा है। जरूरी नहीं है कि स्राव शुरू होते ही प्रसव हो जाएगा, बल्कि यह डॉक्टर ही जाँच करके बता सकता है कि गर्भाशय प्रसव के लिए पूरी तरह से तैयार हुआ है या नहीं।
  • सिकुड़न प्रसव का समय नजदीक आने पर गर्भाशय की मांसपेशियों में सिकुड़न या सिकुड़न तथा दर्द महसूस हो सकता है। शुरुआत में यह सिकुड़न  हलका होता है, जिस तरह का सिकुड़न  मासिक धर्म शुरू होने पर होता है। कभी-कभी इस तरह के दर्द को पेट खराब होने के कारण होने वाला दर्द समझ लिया जाता है, क्योंकि प्रसव शुरू होने से पहले दस्त होना सामान्य है। कभी-कभी कुछ महिलाएँ समझ लेती हैं कि कमर पर टाइट कपड़ा पहनने के कारण यह दर्द हो रहा है, जबकि ढीले कपड़े पहन लेने या खाना कम खाने पर भी यह परेशानी बनी रहती है। यह दर्द रुक-रुककर होता है। अगर यह दर्द और सिकुड़न  हर आधे-आधे घंटे या 15-15 मिनट पर हो रहा हो तो यह प्रसव की निशानी है।
  • कभी-कभी अभ्यासरूपी या भ्रामक सिकुड़न भी महसूस हो सकते हैं। ये सिकुड़न गर्भाशय का बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार होने का संकेत है। ये भ्रामक सिकुड़न बिलकुल प्रसव सिकुड़न की तरह की महसूस होते हैं, लेकिन इनके बीच का समय अनिश्चित होता है और घटता-बढ़ता रहता है। हो सकता है कि कुछ दिनों तक निश्चित समयांतरालों पर सिकुड़न अनुभव होने के बाद यह कुछ दिनों के लिए बंद हो जाए, लेकिन कुछ दिनों बाद यह फिर दोबारा शुरू हो जाएगा। कभी-कभी प्रसव पीड़ा रुक-रुककर होती है और यह काफी समय ले लेती है। इसलिए जब तक सिकुड़न  का अनुभव हर 10 मिनट बाद न होने लगे, आप घर पर ही आराम कर सकती हैं। अगर यह सिकुड़न  हर 10 या 5 मिनट के अंतराल पर होना शुरू हो जाए तब भी घबराने की बात नहीं है।
  • जब आप किसी अस्पताल या नर्सिंग होम के अनजान माहौल में पहुँचती हैं तो हो सकता है कि यह सिकुड़न कुछ देर के लिए थम जाए। अगर ऐसा होता है तो आप थोड़ी देर इधर-उधर टहलें और अपने आसपास के माहौल से परिचित हो जाएँ। तब तक सिकुड़न फिर से शुरू हो जाएगा।
  • धीरे-धीरे संकुचन के बीच का अंतर 10 मिनट से कम होकर 5 मिनट रह जाएगा और बच्चे के जन्म से कुछ देर पहले यह अंतराल दो मिनट तक सिमट जाएगा। प्रसव के समय दोबारा यह समयांतराल 5 मिनट का हो जाएगा। तरल का स्राव गर्भ में बच्चा एमनियोटिक थैली के आवरण में होता है। कभी-कभी यह एमनियोटिक थैली फट जाती है और सारा एमनियोटिक द्रव बाहर आ जाता है। उस समय ऐसा लगता है कि अचानक आपके शरीर के भीतर कोई नल खुल गया हो। वैसे आम तौर पर यह एमनियोटिक थैली प्रसव शुरू होने से पहले फटती है। यह नौवें महीने में कभी भी फट सकती है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह रात में फटती है। इसलिए आप रात में सोते समय बिस्तर पर रबड़ की सीट बिछा सकती हैं। इसे मोमजामा कहते हैं और किसी भी केमिस्ट या कपड़े की दुकान से इसे खरीदा जा सकता है।
  • जब यह थैली फटती है तो जो श्लेष्मक गर्भाशय के मुँह को बंद किए रहता है, वह भी थैली से निकले एमनियोटिक द्रव के साथ बहकर बाहर आ जाता है और इस प्रकार श्लेष्मक और एमनियोटिक द्रव से बनी सुरक्षा या प्रतिरोधकता भी समाप्त हो जाती है। इस कारण महिला जब भी अंदरूनी जाँच या परीक्षण से गुजरती है तो उसे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए यह थैली फटने के 24 घंटे के अंदर ही डॉक्टर बच्चे का जन्म करा देना चाहते हैं।
  • सामान्य प्रक्रिया में जब किसी महिला की एमनियोटिक थैली फट जाती है, तो तुरंत सिकुड़न प्रक्रिया को कृत्रिम रूप से शुरू करने के लिए ग्लूकोज ड्रिप लगाई जाती है, जिसमें एक सिंथेटिक हॉर्मोन सिंटोसिनोन मिला होता है। कई मामलों में चार-पाँच घंटों तक इंतजार करने पर सिकुड़न  स्वयं ही शुरू हो जाता है और ड्रिप चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती है।
  • स्वयं ही सिकुड़न शुरू होना ज्यादा अच्छा होता है, क्योंकि सहज शुरू होने वाले सिकुड़न कृत्रिम रूप से शुरू किए गए सिकुड़न की तुलना में अपेक्षाकृत आरामदेह होते हैं। इसलिए थैली फटने पर आप अस्पताल में अवश्य भरती हों, लेकिन ड्रिप चढ़ाने से पहले 4-5 घंटे प्रतीक्षा करने को कहें। ऐसा करने के लिए आप डॉक्टर पर दबाव न डालें, बल्कि अनुरोध करें, क्योंकि थैली फटने के 24 घंटे के भीतर बच्चा बाहर आना चाहिए और चार-पाँच घंटे इंतजार करने के बाद भी 19-20 घंटे का पर्याप्त समय बचा रहता है।
  • कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एमनियोटिक द्रव की थैली फटने के बजाय द्रव धीरे-धीरे बहकर बाहर आने लगता है या टपकने लगता है। यह प्रक्रिया भी नियंत्रण से बाहर होती है। ऐसा होने पर आप सैनिटरी पैड पहनें और घर पर ही आराम करें। कुछ देर बाद यह दोबारा शुरू भी हो सकती है या इसके बाद सिकुड़न प्रक्रिया शुरू हो सकती है। जब सिकुड़न का समयांतराल 10 मिनट रह जाए, तब अस्पताल जाएँ अथवा जब वह बहाव या द्रव का टपकना बिलकुल अनियंत्रित हो जाए और इसे पैड से भी रोकना संभव न हो तब अस्पताल जाएँ। सैनिटरी पैड को हमेशा बदलते रहें, ताकि संक्रमण का खतरा न हो।

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