कुष्ठ रोग के कारण, पहचान, बचाव के उपाय तथा एम.डी.टी इलाज

आधुनिक चिकित्साशास्त्र ने इतनी प्रगति कर ली है कि कुष्ठ रोग या कोढ़ (Leprosy) का इलाज कई वर्ष पहले ही संभव हो गया था और अब तो इस रोग की मल्टी ड्रग थेरैपी (M.D.T.) उपलब्ध है। सन् 2004 तक एम.डी.टी. द्वारा भारत में एक करोड़ बारह लाख रोगियों को कामयाब इलाज द्वारा कुष्ठ रोग से मुक्त किया गया था |

इस तरह यह रोग चिकित्सा विज्ञान के लिए असाध्य नहीं रहा। लेकिन बहुत से लोग आज भी इसे अंध विश्वास के चलते दैवीय रोग मानते हैं। यही कारण है कि कई कुष्ठ रोगी इलाज के बिना रहते है और जीवन भर इस पीड़ा को भोगते रहते है । इसलिए कुष्ठ रोग के बारे में पूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है।

कुष्ठ रोग विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत रोगियों में यह रोग असंक्रामक किस्म का होता है। मतलब सौ में से अस्सी रोगियों को साथ रखने पर भी यह रोग अन्य स्वस्थ व्यक्तियों में संक्रमण द्वारा नहीं फैलता है। शेष बीस प्रतिशत कुष्ठ रोगियों का भी यदि इलाज समय पर हो जाए तो उनका रोग कुछ ही दिनों में असंक्रामक हो जाता है।

क्या है कुष्ठ रोग ?

कुष्ठ रोग माइकोबैक्टीरियम लेप्री के कारण होने वाला क्रोनिक संक्रामक रोग है, जिसके परिणामस्वरुप त्वचा पर गंभीर घाव हो जाते हैं और हाथों तथा पैरों की तंत्रिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती है समान्यत त्वचा पर पाये जाने वाले पीले या तांबे रंग के धब्बे हो जाते है | 1873 में हैनसन ने इस रोग के रोगाणु की खोज की, इसलिए इसको “हैनसन बीमारी” (Hanson’s Disease) भी कहा जाता है। यह रोग भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर में होता है तथा लाखों लोगों को अपंग और नकारा बना देती है हालाँकि विश्व के अधिकतर देशों में कुष्ठ रोग का सफाया हो चुका है लेकिन भारत अब भी कुष्ठ रोग की समस्या से जूझ रहा है | कुष्ठ रोग वंशानुगत नहीं होता है | सफेद दाग और कुष्ठ रोग में बहुत अंतर होता है इसलिए सफ़ेद दागो को कुष्ठ नहीं समझना चाहिए |

कुष्ठ रोग के कारण

kushth rog ka karan cause symptoms ilaj कुष्ठ रोग के कारण, पहचान, बचाव के उपाय तथा आधुनिक इलाज

कुष्ठ रोग

  • आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार कुष्ठ के जीवाणु शरीर में पहुंचकर रक्त को दूषित करके कुष्ठ रोग की उत्पत्ति करते हैं। चिकित्सा नहीं कराने पर जीवाणु रक्त में तेजी से फैलकर त्वचा को गलाकर खत्म कर देते हैं। शरीर के विभिन्न अंगों में जख्म दिखाई देने लगते हैं।
  • कुष्ठ के जख्मों से पूय स्राव होता है। इस पूय में भी कुष्ठ के जीवाणु होते हैं। इस पूय के संपर्क में आने वाले लोग भी कुष्ठ रोग के शिकार हो सकते हैं। जीवाणु के शरीर में पहुंच जाने के लंबे समय बाद कुष्ठ के लक्षण दिखाई देते हैं।
  • कुष्ठ की चिकित्सा में देर होने से शरीर में जीवाणु विकसित होकर रक्त को दूषित करके कुष्ठ रोग की वृद्धि कर चुके होते हैं।
  • एक अनुमान के अनुसार कुष्ठ रोग पीडितो में से अधिकांश व्यक्ति गर्म एवं नम जलवायु वाले क्षेत्रों में मिलते हैं जबकि ठंडे तथा सूखे जलवायु में कुष्ठ रोगियों की संख्या कम होती है।
  • आयुर्वेद के अनुसार कुष्ठ रोग भोजन में प्रकृति विरुद्ध खाद्य-पदार्थों का सेवन करने से रक्त के दूषित होने पर कुष्ठ रोग की उत्पत्ति होती है जैसे कि मांस का सेवन करने के बाद दूध पी लेना ।

कुष्ठ रोग के विभिन्न प्रकार

  • तंत्रिका कुष्ठ : इसमें शरीर के एक अथवा अनेक अवयवों की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। सुई चुभोने पर भी मरीज को किसी प्रकार का कोई दर्द अनुभव नहीं होता है |
  • ग्रंथि कुष्ठ: इसमें शरीर के किसी भी भाग में त्वचा से भिन्न रंग के धब्बे या चकत्ते पड़ जाते है अथवा शरीर में गाँठ निकल आती है |
  • मिश्रित कुष्ठ : इसमें शरीर के अवयवों की संवेदन शीलता समाप्त होने के साथ-साथ त्वचा में चकत्ते भी पड़ते हैं। और गाँठे भी निकलती है | यह भी जरुर पढ़ें – सफेद दाग होने के कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

कुष्ठ रोग के लक्षण

  • कुष्ठ रोग का पहला लक्षण यह है कि रोगी के शरीर के संक्रमित स्थानों की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है और शरीर के प्रभावित भागों पर स्पर्श महसूस नहीं होता। रोग के शुरू में अकसर त्वचा के किसी भाग में संवेदनहीनता अथवा ज्यादा संवेदनशीलता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह इस रोग का प्रमुख लक्षण है।
  • कुछ अन्य तरह के मामलों में पहले त्वचा पर 2 से 3 से.मी. व्यास के पीलापन और लाल रंग लिए चमकदार चकत्ते उभरते हैं। इनमें सूजन आ जाती है। रोगी को बुखार भी रहता है और प्रभावित स्थानों में तेज दर्द होता है तथा सूजे हुए चकत्तों के ऊपर की त्वचा फट जाती है, जिससे स्राव भी होता है।
  • हाथ, उंगली या पैर की अंगुली भी सुन्न हो सकती है पलकों के झपकने में कमी होने से रोगी अंधेपन का शिकार हो सकता है |
  • मुंह तथा संक्रमित स्थानों की त्वचा मोटी हो जाती है और नाड़ियों में सिकुडन महसूस होती है।
  • इसके अलावा हाथ, पैरों और आंखों में कमजोरी, नसों में सूजन, मोटापन या दर्द, चेहरे, शरीर और कान पर गांठें छाले और घाव जिससे दर्द न हो रहा हो के अलावा हाथ और पैरों में विकृति रोग के अंतिम चरण में हाथों एवं पैरों की उंगलियों में घाव बन जाते हैं और ये गलकर समाप्त होने लगते हैं।
  • कुष्ठ रोगी को धूप में चलने-फिरने से बहुत जलन व पीड़ा होती है।
  • वैसे चेहरे पर होने वाली गाँठों में संवेदना मौजूद होती हैं।

कुष्ठ रोग होने पर क्या करना चाहिए

  • कुष्ठ रोग के प्रथम लक्षण दिखाई देते ही उसके उपचार की व्यवस्था की जाए।
  • कुष्ठ रोगी को साफ एवं स्वच्छ स्थान पर रखने की व्यवस्था की जाए।
  • रोग बढ़ने पर कुष्ठ रोगी को कुष्ठ रोग अस्पताल में भर्ती करा देना चाहिए।
  • कुष्ठ रोग की सूचना कुष्ठ निवारण केन्द्र में दे दी जाए ताकि उसके उपचार में सहायता मिल सके।

कुष्ठ रोग से बचाव

  • यदि मरीज को संक्रामक कुष्ठ रोग है तो रोगी के आसपास के लोगो को सावधानी पूर्वक रहना चाहिए क्योंकि यह फैलने वाला रोग होता है |
  • कुष्ठ रोग, कुष्ठ रोगी की नाक से निकले स्त्राव के संपर्क से, कुष्ठ रोग के जीवाणु युक्त हवा में मौजूद धूल-कणों या ड्रापलेट्स से हो सकता है।
  • इसके अलावा वह ऐसे कुष्ठ रोगी के सीधे संपर्क से हो सकता है, जिसने रोग का इलाज न लिया हो। उसके गंदे कपड़ों, शरीर के स्रावों से भी रोग लग सकता है। माँ के दूध से उसके बच्चे में भी यह रोग पहुँच सकता है।

कुष्ठ रोग का आधुनिक उपचार

  • कुष्ठ रोग अनेक प्रकार के होते हैं और उनका इलाज भी उनकी प्रकृति पर ही निर्भर करता है।
  • कुष्ठ रोग की पहली अवस्था में निदान होने से शरीर में कोई विकृति नहीं आने पाती और रोगी पूरी तरह ठीक हो जाता है। लेकिन इलाज न हो तो रोग त्वचा और हड्डियों को नुकसान पहुँचाकर विकलांगता पैदा करता है और विकलांगता इस रोग का सबसे बड़ा साइड इफ़ेक्ट होता है। लेकिन यदि रोग का तुरंत निदान कर इलाज शुरू किया जाए तो विकलांगता की स्थिति नहीं आती।
  • ट्यूबरक्युलॉयड कुष्ठ रोग, जिसमें जीवाणु बहुत कम होते हैं और संक्रामकता नहीं के बराबर होती है, को मात्र छह महीने में ‘मल्टी ड्रग थेरेपी’ से ठीक किया जा सकता है।
  • जबकि लेप्रोमोटस कुष्ठ रोग जिसमें जीवाणु अधिक होते हैं और संक्रामकता भी अधिक होती है, को कम से कम एक साल के ‘मल्टी डुग थेरेपी’ (एम.डी.टी) से ही ठीक किया जा सकता है। मल्टी ड्रग थेरेपी में जिन औषधियों का उपयोग किया जाता है, उनमें प्रमुख हैं – डैप्सोन और रिफैम्पिसिन।
  • एम.डी.टी. से रोगी थोड़े से समय में रोगमुक्त हो जाता है। कुष्ठ रोग में शरीर के अंगों का गलना या सड़ना तभी शुरू होता है जब उचित देखभाल और इलाज न कराया जाए। यदि किन्हीं कारण वश इलाज देर से शुरू हुआ और अंगों में विकृति आ गई हो तो उसका भी इलाज संभव होता है।
  • एम.डी.टी. के उपचार में दिए जाने वाले दवा के एक पत्ते में 28 दिन की दवाइयां होती हैं। एक से 5 धब्बों का छह महीने का उपचार होता है। पांच से अधिक धब्बे होने पर 12 महीने का इलाज चलता है।
  • रिफैपीसीन की केवल एक खुराक लेने से संसर्गजन्य कुष्ठरोग में 57% से लेकर 75% तक की कमी हो जाती है |
  • कुष्ठ रोग के टीके : बीसीजी का टिका लगाने से भी कुष्ठ रोग से सुरक्षा प्राप्त होती है |
  • अंगों को ज्यादा नुकसान होने पर प्लास्टिक सर्जरी द्वारा ठीक किया जा सकता है।

कुष्ठ रोग की जाँच

  • रोगी की पहचान ऊपर बताए गए लक्षणों के आधार पर चिकित्सक रोगी की त्वचा की पैथोलॉजी जाँच में लेप्रा बेसीलाई की उपस्थिति का पता करते हैं।
  • नाक के स्त्राव की स्लाइड बनाकर भी उसकी जाँच की जाती है।
  • हिस्टामिन जाँच- इस जाँच में रोग ग्रस्त संवेदनाशून्य त्वचा पर हिस्टामिन का इंजेक्शन लगाते हैं। फिर त्वचा की प्रतिक्रिया देखकर रोग की पहचान करते हैं। रोग की पहचान के तुरंत बाद इलाज शुरू कर देना चाहिए।

कुष्ठ रोग से जुडी कुछ अन्य जानकारी

  • कुष्ठ रोग संबंधी कानून के तहत कुष्ठ रोगी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता है। ऐसा करने वाले को सजा का प्रावधान भी है।
  • भारतीय जीवन बीमा निगम ने कुष्ठ रोगियों को एक सुविधा यह दे दी गई है कि वह पहले जो अतिरिक्त धन राशि बीमे के लिए उनसे ली जाती थी, अब नहीं ली जाती है ।

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