जानिए पुरुषो तथा स्त्रियों में बांझपन के प्रमुख कारण -Infertility Causes

बांझपन अर्थ – इसको अंग्रेजी में इनफर्टिलिटी कहा जाता है जिसका मतलब होता है संतान पैदा करने में असमर्थता यह समस्या स्त्री और पुरुष दोनों में हो सकती है | राजनन और संतानोत्पत्ति सृष्टि की रचना के साथ चला आ रहा है। संतानोत्पत्ति न कर पाने पर काफी स्त्रियाँ अपने जीवन को बेकार मानती हैं। कई घरों में ऐसी स्त्रियों की भारी अवहेलना की जाती है और समाज भी संतानोत्पत्ति न कर पानेवाले दंपती को नीची नजर से देखता है। अधिकांश दंपती शादी के कुछ दिनों बाद ही संतान की प्रतीक्षा करने लगते हैं। यदि गर्भनिरोध की कोई विधि नहीं अपनाई जाए तो प्रजनन उम्र में 10 से 15 प्रतिशत दंपती बांझपन की बीमारी से ग्रसित पाए जाते हैं।

बांझपन के कारण

जानिए पुरुषो तथा स्त्रियों में बांझपन के प्रमुख कारण banjhpan infertility causes treatment hindi

Infertility Causes

 

  • गर्भाधान न होने का कारण पति या पत्नी किसी में भी हो सकता है, कभी-कभी दोनों में ही थोड़ी-बहुत गड़बड़ी पाई जाती है और कभी-कभी किसी में भी कोई गड़बड़ी नहीं मिलती। इसके आंकड़े निम्नलिखित है :-
  • पुरुष प्रधान कारण – 25 प्रतिशत
  • डिंब संबंधी कारण (स्त्री) -27 प्रतिशत
  • ट्यूब या गर्भाशय संबंधी कारण (स्त्री) – 22 प्रतिशत
  • अन्य कारण – 9 प्रतिशत
  • अकारण – 17 प्रतिशत
  • बांझपन में पुरुषों की भागीदारी अब दिनोदिन बढ़ती जा रही है और अनुमानतः अब यह करीब 50 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। जिसके मुख्य कारण मानसिक तनाव, भाग दौड़ भरी जीवन शैली, नशा करना, व्यायाम ना करना जैसे खराब लाइफ स्टाइल से जुड़े होते है |

बांझपन की समस्या पर और अधिक जानकारी लेने से पहले इससे जुड़े कुछ आम सवाल और उनके जवाब पर एक नज़र डाल लेते है |

संतान न होने या बांझपन होने पर पति-पत्नी को डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?

  • पति-पत्नी अगर एक साल से गर्भधारण की कोशिश कर रहे हैं और उनकी मंशा पूरी न हुई हो तो उचित यही है कि वे समय गंवाए बगैर किसी इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ से परामर्श लें। जांच के लिए पति और पत्नी दोनों साथ-साथ में ही जाएं, चूंकि समस्या किसी में भी हो सकती है।

बांझपन होने पर क्या सिर्फ स्त्री की डॉक्टरी जांच करा लेना काफी है?

  • नहीं। संतान न होने पर पति-पत्नी दोनों को ही जांच के लिए साथ-साथ जाना चाहिए। दोनों के संतान बीजों के मिलने से ही नया जीवन अंकुरित होता है। संतान न होने के मायने है कि दोनों में से किसी एक या दोनों को ही डॉक्टरी उपचार की जरूरत है। बांझपन की समस्या स्त्री-पुरुष में समान रूप से पाई जाती है।

टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक किन दंपतियों के लिए उपयोगी साबित होती है?

  • जिन स्त्रियों की डिंबवाही नलिकाएं बंद होती हैं, डिंब और शुक्राणु के मिलन में कहीं कोई बाधा होती है, या पूरी डॉक्टरी जांच-पड़ताल के बावजूद गर्भ न ठहरने का कारण पता नहीं चल पाता, उन दंपतियों में ही यह तकनीक उपयोगी साबित होती है।

टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक की सफलता-दर कितनी है?

  • दुनिया के बेहतर से बेहतर Infertility clinics जो IVF treatment देते है उनमें टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक आजमाने वाले चार में से एक निस्संतान दंपती ही संतान पाने में सफल हो पाते हैं। अगर छह बार कोशिश करने के बाबजूद कामयाबी न मिले तो आगे सफल होने की संभावना कम ही रह जाती है।

क्या बच्चा गोद लेने से निस्संतान दंपती की अपनी संतान होने की संभावना बढ़ जाती है?

  • नहीं। जिन दंपतियों में सभी जांच-परीक्षण करने पर भी गर्भधारण न होने का कारण नहीं मिल पाता, उनमें से 5 प्रतिशत दंपती कई वर्ष बाद माता-पिता बनने की मुराद में अचानक कामयाब हो जाते हैं। बच्चा गोद लेने से इस दर में कोई वृद्धि नहीं होती। अगर गर्भधारण हो जाए तो इसे सुखद संयोग ही मानें।

बांझपन की जाँच-पड़ताल

  • चिकित्सीय इतिहास-बहुत बार बांझपन के कारण का अंदाजा ठीक से पूछताछ करने से ही लगाया जा सकता है। निम्न विषयों की जानकारी आवश्यक है |
  • कब शादी हुई ?
  • कितने दिनों से गर्भाधान चाह रहे हैं ?
  • एक जगह कितने दिन रहे। गर्भ निरोध की कोई विधि प्रयोग में लाए तो कौन सी विधि और कितने दिनों तक ?
  • डिंबक्षरण अवधि (Fertile Period) में साथ रहते हैं कि नहीं ?
  • पहले से गर्भाशय में या उसके आसपास कोई बीमारी हुई थी कि नहीं ?
  • यौन रोग कभी हुआ है ?
  • यदि पहले गर्भ रह चुका हो, तो उसका पूरा इतिहास ?
  • कभी पेडू पर या यौन मार्ग के द्वारा कोई ऑपरेशन हुआ। यदि हाँ तो कब ?
  • स्वयं या परिवार में किसी को टी.बी. की बीमारी ?
  • पेडू में दर्द तो नहीं रहता ?
  • सहवास में कठिनाई या दर्द ?
  • यदि थायरॉयड, मधुमेह, उच्च रक्तचाप इत्यादि बीमारी हो, तो दवा का ब्योरा ?
  • पहले कभी कैंसर की चिकित्सा चल चुकी हो, तो उसका ब्योरा ?
  • पति या पत्नी कैसे वातावरण में काम करते हैं। कुछ फैक्टरियों में जहरीली गैस या पदार्थ अधिक निकलते हैं, जो शुक्राणुओं और अंडाणुओं को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।
  • धूम्रपान, अत्यधिक शराब पीना एवं नशीली दवाएँ भी गर्भ और गर्भाधान दोनों के लिए काफी हानिकारक होती हैं।
  • परिवार में खून के रिश्तेवाली किसी स्त्री को एंडोमेट्रियोसिस या पॉलीसिस्टिक ओवरी की शिकायत।

पुरुषो में बांझपन के कारण

  • पुरुषों की प्रजनन प्रणाली काफी लंबी होती है और स्टेम सेल से शुक्राणु बनने की प्रक्रिया में भी लंबा समय, करीब 90 दिन लगता है। इस 90 दिनों की लंबी अवधि में कोई भी अनचाही दवा, वस्तु या वातावरण इस प्रक्रिया को बाधित कर सकता है।

पुरुष प्रधान बांझपन के मुख्य कारण

  • स्टेम सेल का न होना |
  • गरम वातावरण में अधिक रहना।
  • टेस्टिस का अंडकोष में न होकर पेट के अंदर ही रह जाना।
  • संभोग संबंधी कठिनाइयाँ।
  • पहले कभी रेडियम या कीमोथेरैपी से चिकित्सा।
  • मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कोई अन्य बीमारी।
  • कुछ दवाएँ जैसे-सीमेटीडीन, एरिथ्रोमाइसिन, जेन्टामाइसिन, टेस्ट्रासाइक्लीन और स्पाइरोनोलैक्टोन।
  • धूम्रपान, अधिक मद्यपान एवं नशीली दवाएँ।
  • प्रदूषण का प्रभाव।।
  • एनाबोलिक स्टीरॉयड्स-ये स्टीरॉयडस आजकल मांसपेशियों को मजबूत करने या खेल प्रतियोगिताओं में अच्छा करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं, जो टेस्टिस को काफी नुकसान पहुँचा सकते हैं। कुछ लोग बोडी बिल्डिंग के लिए भी स्टीरॉयड्स खाते है जो पुरुषो में बांझपन एक नया उभरता हुआ कारण है |

स्त्रियों में बांझपन के कारण-

  • स्त्रियों में बांझपन का कारण जानने से पहले गर्भाधान की पूरी प्रक्रिया को समझना आवश्यक है। इस पूरे चक्र में कहीं भी गड़बड़ी हो तो गर्भाधान में रुकावट होगी। इन कारणों को निम्न वर्गों में बाँटा जा सकता है—
  • अंडाणु संबंधी
  • डिंबवाहिनी नली एवं श्रोणि संबंधी
  • गर्भाशय संबंधी
  • गर्भाशय ग्रीवा संबंधी
  • अस्पष्ट कारण

अंडाणु संबंधी कारण—

  • सामान्यतः स्त्रियों का मासिक चक्र 28 दिनों का होता है और इस चक्र के 14वें दिन डिंबक्षरण होता है। मासिक जिस दिन शुरू होता है, उसे चक्र का पहला दिन कहा जाता है। डिंबक्षरण का 14वें दिन होना सुनिश्चित नहीं है, आगे-पीछे भी हो सकता है, पर अधिकांश स्त्रियों में यह 10वें से 18वें दिन के बीच ही होता है। ओवरी से निकलने के बाद डिंब केवल आठ घंटों तक ही निषेचित होने की क्षमता रखता है। यदि डिंबवाहिनी नली सही हो तो ओवरी से निकलते ही डिंब नली के भीतर प्रवेश कर जाता है। यदि समय पर पुरुष शुक्राणु ट्यूब में नहीं पहुँच पाए या ट्यूब में कहीं अवरोध हो तो निषेचन नहीं हो पाएगा। डिंबक्षरण क्रिया पेट के भीतर होती है, उसे आँखों से नहीं देखा जा सकता और उसके कुछ निश्चित लक्षण भी नहीं है। किसी-किसी को पेडू में एक तरफ कुछ घंटों के लिए हल्का दर्द हो सकता है, जो स्वत: एक-दो दिनों में खत्म हो जाता है। किसी-किसी डिंबक्षरण के दिनों में योनि से अधिक स्राव और कभी-कभी रक्त के कुछ कण भी सकते हैं।

डिंबक्षरण की पहचान

  • मासिक चक्र-जिन महिलाओं का मासिक चक्र नियमित 28/7 दिनों का है, उनमें अधिकांश को डिंबक्षरण भी होता है, जो अगला चक्र शुरू होने के 14 दिन पहले होता है। दूसरे शब्दों में निषेचित नहीं होने पर डिंबक्षरण के 14 दिनों बाद अगला मासिक चक्र शुरू हो जाता है।

गर्भाशय में बाँझपन के कारण

  • अंत:परत का पॉलिप के कारण निषेचित डिंब अंत:परत में आरोपित नहीं हो पाता है।
  • फाइब्रॉयड (Leiomyoma) फाइब्रॉयड के कारण गर्भाशय के आंतरिक आकार में गड़बड़ी या जगह में कमी हो सकती है, जिससे डिंब का आरोपण होने के बाद भी गर्भपात होने की संभावना बढ़ जाती है। यदि गर्भग्रीवा के पास फाइब्रॉयड हो तो उसके कारण शुक्राणुओं का गर्भाशय में प्रवेश अवरोधित हो सकता है।
  • Asherman Syndrome लक्षण समूह में गर्भाशय की आगे और पीछे की अंत:परत आपस में चिपक जाती हैं, जिसके कारण मासिक स्राव या तो पूर्णतः बंद हो जाता है या बहुत कम होता है। शुक्राणुओं के प्रवेश में अवरोध, निषेचित डिंब के आरोपण में कठिनाई एवं गर्भपात इत्यादि की संभावना काफी बढ़ जाती है। इस लक्षण समूह का कारण या तो गर्भाशय का तेज संक्रमण होता है या अधिक क्यूरेटाज, जिसमें अंत:परत काफी क्षतिग्रस्त हो जाए।

गर्भाशय ग्रीवा की वजह से बांझपन

  • मासिक चक्र के मध्य में जब डिंबक्षरण होता है, उस समय दो-चार दिनों तक ग्रीवा का पानी (Mucus) पतला, साफ और मात्रा में अधिक होता है, जो अन्य समय में गाढ़ा होता है। डिंबक्षरण के समय Mucus पतला होने के कारण शुक्राणु उसमें जल्दी प्रवेश पा लेते हैं, जो अन्य समय में कठिन होता है। गर्भाशय ग्रीवा पर किए गए लघु या बड़ी शल्य क्रिया के बाद उनकी गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है, जिसके कारण शुक्राणुओं का गर्भाशय में प्रवेश बाधित होता है। mucus की गुणवत्ता जानने के लिए पोस्टक्वायटल टेस्ट किया जाता है।

बांझपन के लिए पुरुष की जाँच-

  • पत्नी की जाँच के साथ-साथ पति की भी पूरी जाँच आवश्यक है। उम्र, कार्यक्षेत्र, वातावरण, धूम्रपान, मद्यपान, नशीली दवाओं का सेवन, यौन संबंधी कोई परेशानी, यौन रोग या अन्य किसी संक्रमण के विषय में जानकारी इत्यादि के बाद शारीरिक जाँच की जाती है। मधुमेह, उच्चरक्तचाप, पूर्व में कैंसर या अन्य किसी बड़ी बीमारी के बारे में भी जानकारी आवश्यक है।

वीर्य एवं शुक्राणु बनने की प्रक्रिया-

  • स्त्रियों की ओवरी के बदले पुरुषों में अंड ग्रंथि यानी टेस्टिस होते हैं, जो संख्या में दो होते हैं। इनका मुख्य दो काम है- शुक्राणु बनाना और 2. पुरुष हॉर्मोन मुख्यतः टेस्टोस्टेरोन (testosterone) बनाना। टेस्टिस में सेमिनीफेरस ट्यूब्यूल्स (seminiferous Tubules) होते हैं, जिनमें विकसित होते हुए शुक्राणु एवं सर्योली सेल्स पाए जाते हैं। ये सर्योली सेल्स शुक्राणुओं की रक्षा का काम करते हैं। सेमिनीफेरस ट्यूब्यूल्स के बीच-बीच में लेडीग (leydig) सेल पाए जाते हैं, जिनका मुख्य काम है टेस्टोस्टेरोन एवं अन्य स्टीरॉयड का उत्पादन। टेस्टिस में स्टेम सेल होते हैं, जिनसे पुरुषों में आजीवन जर्म सेल बनने की क्षमता रहती है। स्टेम सेल से शुक्राणुओं तक विकास की क्रिया में 70 दिन लगते हैं, जिसके बाद 12 से 21 दिन शुक्राणुओं को एपिडिडमिस (epididymis) तक पहुँचने में लगते हैं, जहाँ वे और विकसित होकर चलायमान हो जाते हैं। शुक्राणुओं के सही विकास के लिए अंड ग्रंथियों में टेस्टोस्टेरोन का पूरी मात्रा में रहना जरूरी है। पीयूष ग्रंथि से निकलनेवाले FSH और LH लेडीग सेल को टेस्टोस्टेरोन बनाने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। अतः शुक्राणुओं के पूर्ण विकास के लिए इन सारे हॉर्मोस का सही और संपूर्ण मात्रा में रहना जरूरी है। हॉर्मोन के अलावा अंडग्रंथि के माप का भी प्रभाव वीर्य की गुणवत्ता पर पड़ता है। यदि आकार छोटा हो तो सेमिनीफेरस ट्यूब्यूल्स की संख्या में कमी पाई जाती है, जिससे वीर्य की मात्रा में कमी हो सकती है। पुरुष की बढ़ती उम्र के साथ शुक्राणुओं की चाल में कमी एवं ढाँचे में गड़बड़ी आने की आशंका रहती है, यद्यपि उनकी संख्या पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ता है।

बांझपन के टेस्ट के लिए वीर्य की जाँच

  • वीर्य की जाँच कराने से दो-तीन दिन पहले से यौन संपर्क बंद कर देना चाहिए, नहीं तो रिपोर्ट गलत आ सकती है। यौन संपर्क और वीर्य की जाँच के बीच की अवधि के बहुत लंबा होने पर भी रिपोर्ट में गड़बड़ी आने की संभावना रहती है। WHO ने वीर्य के लिए निम्नलिखित मापदंड निर्धारित किए हैं |
  • मात्रा – 5 ml या अधिक शुक्राणुओं की संख्या
  • 15 million/ml या अधिक
  • चलते शुक्राणु- 50 प्रतिशत या अधिक
  • सामान्य आकार प्रकार- 30 प्रतिशत या अधिक
  • सफेद रक्तकण की संख्या – 1 million/ml या कम

सामान्य वीर्य, जाँच में क्षारीय होता है एवं उसमें Fructose की अच्छी मात्रा होती है। अम्लीय वीर्य या क्रुक्टोज की अनुपस्थिति का कारण है वीर्य के रास्ते में रुकावट। यदि वीर्य की बार-बार जाँच में एक भी शुक्राणु न मिले तो उसे एजोस्पर्मिया (azoospermia) कहते हैं। करीब एक प्रतिशत पुरुषों के वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं पाए जाते यानी एजोस्पर्मिया होता है यह बांझपन का एक बड़ा कारण होता है । टेस्टिस में स्टेम सेल नहीं होने के कारण या शुक्राणुओं के रास्ते में रुकावट के कारण जाँच में एजोस्पर्मिया मिल सकता है। यदि शुक्राणुओं की संख्या 15 million/ml से कम हो तो उसे ऑलिगोस्पर्मिया (oligospermia) कहा जाता है। इसके अनेकों कारण होते हैं, जैसे अधिक तापमान, दूषित वातावरण, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कुछ दवाएँ, धूम्रपान तथा मादक द्रव्य इत्यादि। शुक्राणुओं के रास्ते में आंशिक रुकावट के कारण भी इनकी संख्या में कमी पाई जा सकती है। यदि चलते हुए शुक्राणुओं की संख्या परिमाण से कम हो तो उसे ऐस्थिनोस्पर्मिया (asthenospermia) कहते हैं। अंतिम यौन संपर्क एवं वीर्य की जाँच के बीच का लंबा अंतराल, जननांगों का संक्रमण, वैरिकोसिल एवं ऐंटीस्पर्म ऐंटीबॉडी के कारण ऐस्थिनोस्पर्मिया होने की संभावना रहती है। शुक्राणुओं के आकार में विकृति को टेराटोस्पर्मिया (teratospermia) कहा जाता है। यदि वीर्य में WBC अधिक संख्या में पाए गए तो उसकी चिकित्सा डॉक्सीसाइक्लिन (Doxycycline) नामक एंटीबायोटिक देकर की जाती है, जिसका 100 मिलीग्राम प्रतिदिन दो बार, दो सप्ताह तक दिया जाता है। यदि शुक्राणुओं में बार-बार गड़बड़ी पाई जाए तो इसके लिए हॉर्मोन एवं जेनेटिक जाँच की भी जरूरत होती है। वीर्य की मात्रा निम्न परिस्थितियों में कम हो सकती है

  • वीर्य का नमूना इकट्ठा करने में गड़बड़ी।
  • वीर्य के रास्ते में आंशिक रुकावट।
  • वीर्य का मूत्राशय में विसर्जन या स्खलन हो जाना—ऐसा अक्सर प्रॉस्टेट ग्रंथि

मधुमेह, स्पाइनल इंजुरी या अन्य स्नायु संबंधी बीमारियों एवं कुछ दवाओं के प्रभाव से भी मूत्राशय में वीर्य स्खलन हो सकता है। स्खलन के बाद मूत्र की जाँच से इसका पता चलता है। बांझपन के सही कारणों का पता करने के लिए स्त्री व पुरुष दोनों की जाँच होती है इसके लिए कई प्रकार टेस्ट किये जाते है उसके बाद ही ठीक-ठीक कुछ कहा जा सकता है लेकिन अधिकांश मामलों में 100 प्रतिशत इलाज किया जा सकता है बशर्ते की मरीज सही डॉक्टर के पास अपना इलाज करवाए |

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