इन्द्रायण की जड़,फल तथा तेल के फायदे तथा घरेलू नुस्खे जानिए

इन्द्रायण की बेल पूरे भारत में पाई जाती है यह एक लता होती है जो पूरे भारत के बलुई क्षेत्रों (रेगितानी मिटटी) में पायी जाती है यह खेतों में अपने आप ही उग आती है। इसकी लंबाई 20 से 30 फुट होती है। इसके तरबूज के पत्तों की तरह 2-3 इंच लंबे और 2 इंच चौड़े होते हैं। इसका फल गोल, चिकना, 2-3 इंच व्यास के, कच्ची हालत में हरे और पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। खरबूजे की तरह इसके फल में भी 6 फांकें होती हैं। फल के अंदर का हिस्सा स्पंज के समान, स्वाद में खट्टा कुछ कडवा सा होता है। सामान्यतया छोटी और बड़ी, दो प्रकार की इन्द्रायण देखने को मिलती है, जिसमें 45-120 फल लगते हैं। बड़ी इन्द्रायण का फल पकने के बाद लाल रंग का हो जाता है। इंद्रायन के और भी कई नाम है जैसे – कचरी, काचरी, कड़वा सेब, कड़वा ककड़ी, कड़वा तुम्बा या जंगली लौकी इन्द्रायण की तासीर गर्म और शुष्क होती है | इन्द्रायण की जड़, फल, बीज सभी औषधीय गुणों से भरपूर होते है |

इन्द्रायण की जड़ तथा फल की फायदे तथा घरेलू नुस्खे indrayan jad fal tel beej fayde nuskhe

इन्द्रायण की बेल

इन्द्रायण बिगड़े हुए जुकाम, पित्त, कफ, कब्ज, परमेह सहित कई रोगों में बेहतरीन दवा मानी गई है। प्रसिद्ध आयुर्वेदीय ग्रंथ ‘राज-निघंटु’ में इन्द्रायण का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह एवं तिक्तरंस वाली, विपाक में अम्ल वातनाशक पित्तकारक तथा पुराने बिगड़े हुए जुकाम को कम करने वाली दीपन तथा उत्तम रुचिकारक है। यह भूख बढ़ाने वाली, कामोद्दीपक तथा बवासीर, लकवा इत्यादि वात-कफज रोगों में आराम देती है। चूंकि कचरी में महक होती है, इसलिए यह दिल व दिमाग को ताकत देती है। वात रोगों में इसका सेवन ‘सोंठ’ के साथ कराया जाता हैं भोजन पचाने तथा भूख बढ़ाने वाले चूर्ण में भी इन्द्रायण की कचरियाँ मिलाई जाती हैं। इन्द्रायण के पाचक गुणों के कारण इसे दाल में भी डालने का प्रचलन है। गाँवों में इसको सुखाकर रख लेते हैं फिर इसको लहसुन और लाल मिर्च के साथ मिलाकर इसकी चटनी बनाकर खाते है जो ना केवल स्वाद में अच्छी लगती है बल्कि पाचन तंत्र और पेट के लिए भी बहुत फायदेमंद होती है इससे गैस के रोगियों को भी लाभ होता है। बवासीर में कचरी की धूनी देना बहुत लाभदायक होता हैं कचरी की जड़ में ‘पथरी’ नष्ट करने की क्षमता होती है।

इन्द्रायण की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर पता चला है कि इसके फल मज्जा में कोलोसिन्थिन नामक तिक्त पदार्थ और एक प्रकार का राल होने के कारण ही आंतों में रेचन की क्रिया होती है और कब्ज दूर होती है। इनके अलावा हेण्ट्रिएकोटेन, ए-इलेटरिन, फाइटोस्टेराल और वसा अम्ल होते हैं। बीजों में तिक्त स्थिर तेल इपुरैनाल (Ipuranol) 21 प्रतिशत, फाइटोस्टेराल, ग्लाइकोसाइनाइड, हाइड्रोकार्बन, टैनिन और सैपोनिन होते हैं। प्रत्येक फल में छिलका 23 प्रतिशत, बीज 62 प्रतिशत और मज्जा 15 प्रतिशत होते हैं।

इन्द्रायण की जड़, फल तथा बीजो द्वारा ऐसे करें विभिन्न रोगों का इलाज

इन्द्रायण की

इन्द्रायण के बीज, तेल, सूखा फल, तथा ताजा फल दर्शाया गया है |

  • इंद्रायण में एंटी-डाइबेटिक गुण होते हैं। इस जड़ी बूटी को पीसकर गुनगुने पानी के साथ लेने पर शुगर का स्तर कम हो जाता है। जिससे डायबिटीज के रोगियों को फायदा होता है।
  • कब्ज : इन्द्रायण के फल को घिसकर नाभि पर लगाएं और इसकी जड़ का चूर्ण 2 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ सोते समय लेंकब्ज से छुटकारा मिलेगा।
  • त्वचा की रंगत बढ़ाने के लिए : इन्द्रायण के ताजे हरे फलों से रस निकालकर शरीर में जहां-जहां त्वचा की रंगत बिगड़ गई हो, वहां-वहां कुछ दिन नियमित रूप से लगाते रहने से वह स्वाभाविक रंग में आ जाएगी।
  • पेशाब की रूकावट होने पर : इन्द्रायण की जड़ को पानी के साथ पीसकर छान लें, फिर उसे दिन में तीन बार पिएं, पेशाब खुल कर आने लगेगा।
  • लाल इन्द्रायण की जल, हल्दी, हरड़ की छाल, बहेडा आंवला रागी की 10-20 ग्राम मात्रा को 160 मि.ली पानी में उबालकर जब एक चौथाई पानी बचे तब इसमें शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से पेशाब की रूकावट दूर होती है।
  • स्तन की विभिन्न समस्याओ में : इन्द्रायण की जड़ को पानी में घिसकर बने लेप को स्तन पर लेप करने से उसकी सूजन, दर्द व घाव जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
  • कान के रोग : इन्द्रायण के कच्चे या पके फल को मसल लें और फिर 4 चम्मच तिल के तेल में धीमी आंच पर पका लें। आधा तेल बचा रहने पर उसे छानकर शीशी में रख लें। रोजाना सोने से पहले 2-3 बूंद डालने से बहरापन, कान में झनझनाहट, कई तरह की ध्वनियां सुनाई देना जैसी समस्याएं ठीक हो जाती हैं।
  • इन्द्रायण के फल के रस या जड़ की छाल को तिल के तेल में उबालकर तेल को मस्तक (माथे) पर लेप करने से मस्तक पीड़ा या बार-बार होने वाली मस्तक पीड़ा मिटती है। इन्द्रायण के फलों का रस या जड़ की छाल के काढ़े के तेल को पकाकर, छानकर 20 मिलीलीटर सुबह-शाम उपयोग करने से आधे सिर का दर्द), पुराना जुकाम, कान दर्द आदि दूर हो जाते हैं।
  • आसानी से गर्भ धारण के लिए : बेल का फल और इन्द्रायण की जड़ को बराबर की मात्रा में पीसकर पीने से स्त्री गर्भ धारण करने में आसानी होती है।
  • ग्रंथि शोथ (glanditis) : इन्द्रायण के पत्तों का लेप गांठ पर बांधने से वह बैठ जाती है।
  • प्रसूता का पेट बढ़ना : अनेक बार प्रसव होने के बाद स्त्री का पेट बेडौल होकर फ़ैल जाता है। ऐसे में इन्द्रायण के फल को पीसकर पेस्ट तैयार करें और नियमित रूप से कुछ हफ्ते सोते समय पेट पर लगाएं, पेट अपनी पुरानी अवस्था में वापिस आ जाएगा।
  • बवासीर के मस्सों पर : इन्द्रायण के बीजों को पानी में पीसकर लेप बनाएं और उसे बवासीर के मस्सों पर दिन में 2 बार कुछ हफ्ते तक लगाएं आराम मिलेगा।
  • पेट के कीड़े : 10 ग्राम गुड़ में 2 ग्राम इन्द्रायण की जड़ का चूर्ण मिलाकर सोते समय सेवन करने से 3-4 दिनों में ही सारे पेट से कृमि निकल जाते हैं।
  • कानो से कम सुनाई देना : इसके पके हए फल को या उसके छिलके को तेल में उबालकर, छानकर कान में 2-4 बूंद टपकाने से बहरापन मिटता है।
  • अपस्मार : इसकी जड़ के चूर्ण का नस्य दिन में तीन बार देने से अपस्मार मिटता है।
  • खांसी में : इसके फल में छेद करके उसमें काली मिर्च भरकर छेद बंद कर धूप में सूखने के लिए रख दें या आग के पास कुछ दिन तक पड़ा रहने दें, फिर फल को फेंक दे और काली मिर्च के 7 दाने प्रतिदिन शहद के साथ सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।
  • पेट विभिन्न रोगों में : इन्द्रायण का मुरब्बा खाने से पेट के कई रोग मिटते हैं।
  • इन्द्रायण के फल में सैंधा नमक और अजवायन भर कर धूप में सुखा लें, इस अजवायन की गर्म पानी के साथ फंकी लेने से दस्त लगकर पेट साफ़ होता है।
  • व्यक्ति द्वारा दूषित भोजन या पानी पीने के कारण होने वाला आँत संबंधी संक्रामक रोग हैजा होने पर इसके ताजे फल के 5 ग्राम गूदे को गर्म पानी के साथ या फिर 2-5 ग्राम सूखे गूदे को अजवायन के साथ देना चाहिए।
  • मासिक धर्म की रूकावट – इन्द्रवारूणी के बीज तीन ग्राम, काली मिर्च 5 दोनों को पीसकर 200 ग्राम पानी में क्वाथ बनायें, जब चौथाई पानी शेष रह जाये तब छानकर पिलाने से रूका हुआ मासिक धर्म सामान्य हो जाता है।
  • विरेचन : इसकी फल मज्जा को पानी में उबालकर इसके बाद इसे गाढ़ा करके उसकी छोटी-छोटी चने के बराबर गोलियां बना लें, इसमें 1-2 गोली ठंडे दूध से लेने से प्रातःकाल शुद्ध विरेचन (दस्त ) लग जाता है।
  • जलोदर रोग में : इन्द्रायण के फल को गूदा तथा बीजों से खाली करके इसके छिलके की प्याली में बकरी का दूध भरकर पूरी रात रखा रहने दें। सुबह इस दूध में थोडी सी खांड मिलाकर रोगी को पिला दें। कुछ दिन तक पिलाने से जलोदर ठीक हो जाता है। इसकी जड़ का क्वाथ तथा फल का गूदा खिलाना भी लाभदायक है, लेकिन ये तेज औषधि है कई लोगो पर साइड इफ़ेक्ट छोडती है।
  • उपदंश (Syphilis) की बीमारी में 100 ग्राम इन्द्रायण की जड़ को 500 ग्राम एरंड तेल में पकायें जब तेल मात्र शेष रह जाये तो 15 ग्राम तेल गाय के दूध के साथ दिन में दो बार पिलाने से उपदंश की बीमारी ठीक होती हैं।
  • सूजन – इन्द्रायण की जड़ को सिरक में पीसकर इसे गर्म करके सूजन वाले अंग पर लगाने से सूजन उतरती है।
  • संधिवात – इन्द्रायण की जड़ और पीपल के चूर्ण समान मात्रा में गुड के साथ मिलाकर 10 ग्राम की मात्रा में रोजाना देने से संधिगत वायु दूर होती है।
  • गठिया में इन्द्रायण के गूदे के आधा किलो रस में हल्दी, सैंधा नमक, बड़े हुतनीला की छाल 11 ग्राम डालकर बारीक पीस लें, जब पानी सूख जाये तो 3-5 ग्राम की गोलीयां बना लें। एक-एक गोली सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से गठिया से जकड़ा हुआ रोगी चलने-फिरने लग जाता हैं।
  • सुजाक – त्रिफला, हल्दी और लाल इन्द्रायण की जड तीनों का क्वाथ बनाकर 30 मिली० दिन में दो बार पीने से सुजाक में लाभ होता है।
  • फोडे-फुंसी : सर्दी-गर्मी से नाक में ऐसी फुंसी हो जाती हैं, जिनमें से पीप निकलता हो, उन पर इंद्रायण फल को नारियल तेल के साथ लगाने से लाभ होता है।
  • विद्रधि (abscess) फुंसी जैसी – इसके उपचार के लिए लाल इन्द्रायण की जड़ और बड़ी इन्द्रायण की जड़ दोनों को बराबर लेकर लेप बनाकर विद्रधि पर लगाने से लाभ होता है।

बालों के लिए इन्द्रायण के नुस्खे

  • इन्द्रायण के बीजों का तेल लगाने से बाल काले हो जाते हैं।
  • बाल काले करने के लिए : इन्द्रायण का तेल, नारियल के तेल में बराबर की मात्रा में मिलाकर नियमित रूप से लगाएं, लाभ होगा।
  • इन्द्रायण की जड़ के 3-5 ग्राम चूर्ण का गाय के दूध के साथ सेवन करने से सफेद बाल काले हो जाते हैं। परन्तु केवल दूध ही पीना चाहिए।
  • इसके बीजों का तेल निकाल कर सिर के बाल मुंडवाकर सिर पर इस तेल का लेप करने से बाल काले उगने लगते हैं।
  • सिर के बाल उड़ जाने पर : इन्द्रायण की जड़ को पानी में पीसकर नियमित रूप से गंजे स्थानों पर लगाएं। कुछ ही दिनों के प्रयोग से लाभ नजर आएगा।

इन्द्रायण के हानिकारक प्रभाव

  • मरोड़ अधिक उत्पन्न करने के कारण इन्द्रायण के फल को अकेले नही खाया जाता। अधिक मात्रा में इसे सेवन करने से उलटी, दस्त, हैजा के लक्षण पैदा होते हैं। इसलिए इसका प्रयोग सावधानी पूर्वक करना चाहिए। इसके साइड इफ़ेक्ट को खत्म करने के लिए धनिए का सेवन करना लाभप्रद होता है।
  • गर्भिणी, स्त्रियों, बच्चों एवं कमजोर व्यक्तियों में इसका प्रयोग किसी चिकित्सक की देखरेख में किया जाना चाहिए |
  • इन्द्रायण के कडवे फल का उपयोग ना करें |
  • जिन लोगो को गर्मी अधिक लगती हो उन्हें इसका सेवन नहीं करना चाहिए |

मात्रा

  • फलों का चूर्ण 125 मिलीग्राम से 500 मिलीग्राम तक। जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम।

उपलब्ध आयुर्वेदिक योग

  • इन्द्रायण वटी, इन्द्रायण तेल, इन्द्रायण अर्क।

इन्द्रायण की पहचान इस विडियो में देखें

 

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