जानिए क्या है जल चिकित्सा : पानी से विभिन्न रोगों का उपचार

आयुर्वेद में जल (पानी) की कई रोगों के इलाज में उपयोगिता बताई गई है जो दुनिया भर में जल चिकित्सा के नाम से प्रचलित है। विदेशों में जल चिकित्सा को “Hydrotherapy” के नाम से जाना जाता है, जर्मनी के महान आचार्य सरलुईकूने ने जल के विभिन्न प्रयोगों द्वारा कई रोगों को सफलतापूर्वक दूर किया। आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में इसकी काफी महत्ता बताई गई है। अब तो इसे एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में भी अपनाया जा रहा है। जापान में जल चिकित्सा पद्धति काफी लोकप्रिय हैं तथा अनेक रोगों का उपचार इससे किया जा रहा है। भारत में भी फिर से यह पद्धति धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है।

पंचतत्वों से बने शरीर को पानी सबसे ज्यादा जरुरत पड़ती है। शरीर का तीन-चौथाई भाग पानी है। पानी हमारे सब प्रकार के आहारों जैसे फल, सब्जी, दूध में सम्मिलित रहता है, फिर भी हमको अपने शरीर के बेहतर स्वस्थ्य के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है। पानी पीने से न केवल हमारे आंतरिक अवयव स्वच्छ रहते हैं, बल्कि उनमें ताजगी भी बनी रहती है।

पानी के गुणों और अवगुणों का संबंध उसके स्रोत पर निर्भर करता है। जैसे झरने का जल कफनाशक, हल्का और दिल को ताकत देनेवाला होता है। ओस का पानी प्रकृति से ठंडा तथा रूखा होता है। बर्फ का पानी ठंडा, भारी तथा पित्त रोगों में लाभदायक होता है। सरोवर का जल मीठा, बलदायक तथा प्यास को बुझाता है। लेकिन तालतलैया का पानी हर प्रकार से हानिकारक होता है। इसी प्रकार दिन भर सूर्य की किरणों से तपा हुआ तथा रात में चंद्रमा की किरणों से युक्त पानी जल ठंडा, हल्का, दोषनाशक, बलदायक, बुद्धिवर्धक अर्थात् अमृत के समान होता है। जल चिकित्सा बेहद असरदार होती है। साथ ही इसकी एक खास बात है कि इसका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। जल चिकित्सा में पानी के सफल प्रयोग से कई बीमारियाँ ठीक होती हैं, यहाँ पर कुछ आम बीमारियों और उनके जल चिकित्सा के द्वारा उपचार के नुस्खे बताए जा रहे है, उम्मीद है कि आपको इससे जरुर लाभ मिलेगा। [ Hydrotherapy Spa Treatments Water Therapy]

जल चिकित्सा से ऐसे करें बिमारियों को दूर

जानिए क्या है जल चिकित्सा : पानी से विभिन्न रोगों का उपचार Hydrotherapy jal pani se upchar

जल चिकित्सा – Hydrotherapy

  • जल चिकित्सा की कई विधियां हैं। ठंडे पानी की पट्टी, गर्म पानी की पट्टी, जल धौती, एनिमा, वाष्प स्नान, कटि स्नान, टब स्नान, बर्फ आदि विधियों से विभिन्न रोगों में लाभ होता है।
  • दर्द, सूजन, फोड़े-फुसी गर्म-ठंडे पानी से सेकने पर ठीक हो जाते हैं। पहले तीन मिनट गर्म पानी की सेंक करें, फिर एक मिनट ठंडे पानी की। इस प्रकार दस मिनट तक सुबह-शाम दो बार सेंकने से जरुर लाभ मिलता है।
  • जब तनाव की स्थिति से गुजर रहे हों तो एक गिलास ठंडा पानी पिएँ। यह आपकी एनर्जी को बढ़ाता है।
  • जल चिकित्सा से भगाए तनाव को– तनाव को भाप स्नान से दूर किया जा सकता है। घर पर वाष्प स्नान लेने के लिए एक कुरसी पर रोगी को बैठा दें। उसको कंबल से चारों तरफ से ढक दें। दूर गैस चूल्हे पर एक कुकर पानी भरकर रखें। सीटी को हटाकर एक लंबी पाइप लगा दें। पाइप के एक सिरे को सावधानीपूर्वक रोगी की कुर्सी के नीचे रख दें। इससे पहले रोगी को एक गिलास पानी पिलाएँ और सिर पर ठंडे पानी से भीगा तौलिया रखें। भाप स्नान से त्वचा का मैल निकल जाता है। शरीर के रोम छिद्र खुल जाते हैं। शरीर में हल्कापन आता है। त्वचा निखरती है। तनाव कम हो जाता है। भाप स्नान से कमर दर्द में भी फायदा मिलता है। सावधानियाँ : उच्च रक्तचाप की तकलीफ है तो भाप स्नान न करें। अगर गर्मी सहन न हो तो उपचार तुरंत रोक दें।
  • पेट में यदि दर्द हो रहा हो तो गर्म पानी की पट्टी या रबर की बोतल में गर्म पानी भर उसका सेंक करने से पेट दर्द दूर हो जाता है। अकसर पेट-दर्द गलत खान-पान से होता है जिससे पेट में गैस बनती है और गैस मरोड़ पैदा करती है। इसके लिए एनीमा लेना भी लाभप्रद है। एनीमा से पेट का जमा हुआ मल या गैस आदि बाहर निकल जाते हैं।
  • पैरों में पसीना आने की बीमारी हो, तो पहले गर्म पानी में और फिर ठंडे पानी में क्रमश: पांच-पांच मिनट पैर रखने चाहिए। फिर बाद में रगड़कर पोंछ लें और यह प्रयोग कम-से-कम हफ्ते भर करें। जल चिकित्सा के इस उपाय से अन्य शारीरिक विकारों को भी दूर किया जा सकता है।
  • पाचन क्रिया दुरुस्त रखने के लिए जल चिकित्सा : इसके लिए कमर स्नान काफी फायदेमंद होता है। बड़े टब में पानी भरें। रोगी को टब में कपड़े उतारकर इस तरह बैठा दें कि उसकी नाभि तक पानी आ जाए। रोगी के पैर बाहर एक मेज पर रख दें। रोगी के सिर पर एक गीला तौलिया रख दें तथा रोगी को एक सूती कपड़ा देकर नाभि के चारों तरफ रगड़ने को कहें। यह जल चिकित्सा 20 से 30 मिनट तक दें। इससे कब्ज में लाभ मिलता है और पाचन क्रिया ठीक हो जाती है।
  • दमा के दौरे में हाथ-पैर गर्म पानी में डुबोएं और रात में सोने से पूर्व गर्म पानी पिलाएं। दौरा पड़ने पर भी गर्म पानी ही पिलाना लाभप्रद होता है।
  • गर्मी में ठंडे पानी से और सर्दी में गर्म पानी से पैर धोकर सोने से नींद अच्छी आती है।
  • ज्यादा चलने, ऊंचाई पर चढ़ने आदि से पैरों में आई थकान को दूर करने के लिए शाम को गर्म पानी में थोड़ा नमक डालकर पांच-दस मिनट डुबो कर रखें, सारी थकान दूर हो जाएगी।
  • पेट दर्द की शिकायत में गर्म पानी की थैली से सिंकाई करें, इस जल चिकित्सा से आराम मिलेगा।
  • मसूढ़े फूलकर दर्द करते हों, तो गर्म पानी से कुल्ला करें। दांत दर्द में पहले दो मिनट सहनीय गर्म पानी मुंह में रखें, फिर बहुत ठंडा पानी दो मिनट रखें। इस क्रिया को चार-पांच बार दोहराने से दांत दर्द मिट जाएगा।
  • शरीर के किसी भी हिस्से के जल जाने पर तुरंत ही उस पर ठंडा पानी तब तक डालें, जब तक कि जलन समाप्त न हो जाए। बर्फ के पानी में जले हुए अंग को डुबा कर रखना और भी अधिक लाभदायक उपाय है। जल चिकित्सा के इस उपाय से न केवल शीघ्र आराम मिलेगा, बल्कि जले हुए का निशान भी नहीं पड़ेगा।
  • घाव, चोट पर जब तक दवा उपलब्ध न हो, ठंडे पानी की पट्टी रखें। उसे गीला करते रहें। दिन में दो-तीन बार पट्टी बदल कर दोहराते रहने से छोटे घाव यूं ही ठीक हो जाते हैं।
  • तेज बुखार में ठंडे पानी की पट्टियां माथे पर रखने और बार-बार भिगो कर बदलते रहने से शरीर का तापक्रम कम हो जाता है।
  • पित्त ज्वर की जल चिकित्सा – पित्त बुखार में रोगी की नाभि पर ठंडे पानी की धार डालने से उसे प्रचुर लाभ मिलता है। पित्त ज्वर के रोगी को पीठ के बल लिटा देना चाहिए। फिर उसके पेडू पर तांबे या कांसे का बर्तन जो गहराई वाला हो, रखें-और तब ठंडे पानी की धार उसमें गिराएं। यह विधि पित्त ज्वर में तुरन्त फायदा पहुंचाती है।
  • लू लगने पर जल चिकित्सा- जब मनुष्य को लू लगती है तो अधिक गर्मी सहन न कर सकने की दशा में वह बेहोश हो जाता है। ऐसे व्यक्ति को ठंडी और हवादार जगह में लिटाना चाहिए। खस या खजूर के पंखे को पानी में भिगोकर उससे हवा करनी चाहिए। चेहरे पर ठंडे पानी के छीटें मारें। रोगी के कपड़े उतार कर उसे ठंडे पानी से नहलाएं। चने के सूखे साग या चने के भूसे को पानी में भिगोकर कुछ देर बाद उस पानी में कपड़ा भिगोकर रोगी के शरीर पर मलें, यह बहुत ही लाभ पहुंचाता है।
  • गर्मी में या शरीर में किसी कारणवश गर्मी की अधिकता से कभी-कभी नाक से खून निकलना आरम्भ हो जाता है। इसे नकसीर फूटना भी कहते हैं। ऐसे में रोगी की नाक पर ठंडे पानी के छींटे मारने चाहिए। साथ ही सिर पर ठंडा पानी डालें और रोगी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखें। कुछ ही देर में रोगी को आराम मिल जाएगा।
  • कमजोरी या किसी रोग के कारण, या फिर खून की कमी की वजह से चक्कर आ जाते हैं। ऐसे में रोगी के मुंह पर ठंडे पानी के छींटे मारें तथा उसे हवादार स्थान पर लिटाएं या पंखे से उसकी हवा भी साथ-साथ करें। रोगी को ठंडी पानी पिलाते ही चक्कर आने बंद हो जाते हैं।
  • हैजे की जल चिकित्सा – हैजा एक संक्रामक रोग है। यह रोग आमतौर पर गंदा पानी पीने और सड़ी-गली और बासी खाद्य वस्तुएं खाने से होता है। इससे बचने के लिए कभी गंदा पानी न पिएं। खाने-पीने की वस्तुएं ढककर रखें। गले-सड़े फल-सब्जियां सेवन न करें। दूध उबालकर ही पिएं। हैजे में उल्टी और दस्त बहुत होते हैं। अत: उल्टी-दस्तों को रोकने वाली दवा न खाकर उल्टी-दस्त खुलकर होने दें, ताकि सारा विष पेट से निकल जाए। इसके लिए गर्म पानी में नमक डालकर वह पानी उसे पिलाएं और मरीज से उल्टी कराएं। इससे हैजे का सारा संकर्मण बाहर निकल जाएगा। इसके बाद रोगी को नींबू का पानी पिलाएं।
  • अनिद्रा या नींद न आने की स्थिति अधिकतर मानसिक कारणों से होती है। गलत खान-पान, चिंता, देर रात तक जागना, पेट में गैस हो, छाती में भारीपन, शरीर में दर्द हो, रात को अधिक चाय पीना, कॉफी का अधिक सेवन करने आदि से अनिद्रा की स्थिति बन जाती है। शहरी आबादी में यह रोग बहुतायत में पाया जाता है। उपचार : सोने से पहले ठंडे जल से स्नान करें। नहाते समय सिर पर पानी की धार डालें। रात में हल्का भोजन लें।
  • गैस के उपचार के लिए जल चिकित्सा के उपाय – पेट की गैस को ठीक करने के लिए कुंजन क्रिया बड़ी ही कारगर साबित होती है। जब पित्त की मात्रा शरीर में अधिक हो जाए और अपचन की शिकायत हो तो रोगी को चाहिए की वह अपने पेट को वमन (उलटी) द्वारा ठीक करे। इसके लिए सबसे पहले 5-6 गिलास पीने का पानी गरम करें। उसमें एक चम्मच नमक मिलाएँ। अब कागासन में बैठकर पानी पिएँ। इसके बाद 5 से 10 मिनट तक टहलें। फिर आगे की तरफ झुककर उलटी कर दें। इसे ‘कुंजन क्रिया’ कहते हैं। इससे गैस संबंधित रोग खत्म होता है। शरीर के अंदर की सफाई हो जाती है। इसके बाद आप काफी हल्का महसूस करेंगे। सावधानियाँ : उच्च रक्तचाप की समस्या वाले व्यक्ति डॉक्टर की सलाह से ही यह क्रिया करें।
  • मौसम बदलते ही सर्दी-जुकाम इससे निजात पाने के लिए जल चिकित्सा की “जल नेति क्रिया” फायदेमंद होती है। एक लोटा लेकर उसमें हल्का गरम पानी और आधा चम्मच नमक मिलाकर नाक में लगाएँ और मुँह को खोलकर साँस लें तथा दूसरी नाक से पानी को निकाल दें। जल नेति से सर्दी-जुकाम की समस्या से तो मुक्ति मिलती ही है, यह नेत्र ज्योति भी बढ़ाती है। समय से पहले बाल सफेद नहीं होते। सिरदर्द ठीक होता है। यह भी पढ़ें – जाने क्या है ब्रेन वेव जो बढ़ाये मानसिक शांति और शक्ति?
  • एक लीटर पानी में 10-20 ग्राम जीरे का पाउडर मिलाकर गरम करें। जब पानी की मात्रा तीन-चौथाई बच्चे तब इसे ठंडा करके छान लें। इस जल को पीने से रक्त प्रदर, गर्भाशय के तमाम रोग, गर्भावस्था के दौरान होनेवाले रोग जैसे गर्भपात, वायु एवं पित्त रोगों में अत्यंत लाभ मिलता है। इसके अलावा हाथ-पैरों में जलन, श्वेत प्रदर, अनियमित मासिक स्त्राव तथा नेत्र रोगों में भी लाभ मिलता है।

जल चिकित्सा के अतिरिक्त पानी के बारे में अन्य रोचक ज्ञानवर्धक तथ्य

  • शरीर में कितना पानी – हमारे शरीर के खून में 60 प्रतिशत तक , मस्तिष्क में 84 प्रतिशत, मांसपेशियों में 77 प्रतिशत, लीवर में 73 प्रतिशत, कार्टिलेज में 67 प्रतिशत, हड्डी में 22 प्रतिशत और वसा में 15 प्रतिशत पानी की मात्रा होती है। उसी प्रकार हमारे शरीर से प्रतिदिन प्राय: 3 लीटर पानी खर्च होता है। इस प्रकार शरीर से बाहर निकलने वाले पानी की कमी कुछ मात्रा में भोजन में रहने वाले पानी के द्वारा पूरी हो जाती है, फिर भी शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने के लिए ढाई से तीन लीटर, यानी 8 से 10 गिलास पानी 24 घंटे में जरुर पीना चाहिए जो मौसम और व्यक्ति के शरीर तथा दिनचर्या पर निर्भर करता है। जैसे कड़ी धूप में अधिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों को अन्य लोगो के मुकाबले अधिक पानी पीने की जरुरत होती है |
  • आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मनुष्य बिना भोजन के 40 दिनों तक जीवित रह सकता है, लेकिन पानी के बिना 7 दिन से अधिक नहीं। यह हमारे शरीर में पाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। औसतन एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में 35 से 50 लीटर तक पानी रहता है, यानी उसके स्वयं के भार का 60 से 75 प्रतिशत। वात पित्त कफ का इलाज : त्रिदोष नाशक उपाय
  • पानी का महत्त्व – जल चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार पानी शरीर में पहुंच कर शरीर को फुर्तीला बनाता है, शरीर की नमी का संतुलन बनाए रखते हुए उसकी अत्यधिक गर्मी को कम करता है। भोजन के आवश्यक पोषक तत्वों को घोल कर उन्हें शरीर द्वारा सोख लेने योग्य बनाता है। अनावश्यक शारीरिक पदार्थों को मल, मूत्र और पसीने के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल कर शरीर का तापमान संतुलित बनाए रखता है। पानी से खून तरल बना रहता है, जिससे हर कोशिका तक पोषण तत्व बराबर पहुंचता रहता है। पानी की कमी से मल सूखा होने लगता है, कब्जियत हो जाती है। मूत्र पीला और जलन के साथ आने लगता है। उलटी, दस्त से जब शरीर में पानी की कमी हो जाती है, तो निर्जलन (डिहाइड्रेशन) के कारण व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।
  • जल चिकित्सा के सिद्धांत के अनुसार बुखार, लू लगने पर, और पेशाब संबंधी बीमारियां होने, रक्तचाप, हृदय की धड़कन, कब्ज़, पेट की जलन जैसी तकलीफों में सामान्य स्थिति की अपेक्षा अधिक पानी पीना लाभदायक होता है।

एक वर्ष पहले हमने पानी को लेकर एक आर्टिकल प्रकाशित किया था जिसमे पानी के लाभ इसके सेवन का सही तरीका तथा पानी कब नहीं पीना चाहिए, इस विषय पर विस्तार से बताया था जिसको आप लोगो ने काफी सराहा था हमे भरोसा है की जल चिकित्सा के इन उपायों से भी आपको जरुर लाभ होगा |पढ़ें यह पोस्ट-  पानी पीने के भी हैं कुछ खास नियम और सही तरीके

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