हैजा कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

हैजा (Cholera) आंतों में होने वाला इंफेक्शन, जिसे गंभीरता से ना लिया जाए तो जानलेवा भी हो सकता है। यह एक एक संक्रामक रोग है जो अकसर दूषित खाने और पीने से होता है | पीने के पानी के पाईप गंदी नालियों में होकर जाने से गंदगी पानी के साथ प्रवेश कर जाती है। अब इस तरह का दूषित पानी पीकर यदि लोग बीमार पड़ें तो कोई आश्चर्य नहीं। देश में अधिकतर होटल गंदे हैं। वहाँ शुद्ध पेयजल तथा साफ-सफाई के तौर-तरीकों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।

गाँव में बासी खाना अकसर खाया जाता है। विषाक्त खोवे की मिठाइयों से भी ये रोग होते हैं। यद्यपि उलटी-दस्त के लक्षण वाले सभी रोगी हैजा के नहीं होते, लेकिन कुछ मामलों में हैजा भी हो सकता है। कहीं-कहीं तो हैजा सामूहिक रूप से फैल जाता है, हैजा में तो कुछ ही दस्त अथवा उलटियों के पश्चात् मरीज के शरीर में पानी एवं खनिज-लवणों की अत्यंत कमी हो जाती है। इस कारण वह अत्यंत कमजोर भी हो जाता है। उसके गुरदे भी कार्य करना बंद कर सकते हैं। यदि तुरंत इलाज नहीं दिया गया तो मरीज मर भी सकता है। उसे खून की नशों द्वारा ग्लूकोस और सेलाइन की तुरंत आवश्यकता पड़ सकती है। जबकि आंत्रशोथ में कई उलटियों एवं दस्तों के पश्चात् ही मरीज गंभीर होता है, लेकिन आंत्रशोथ या गेस्ट्रोएंट्राइटिस को भी साधारण रोग नहीं मानना चाहिए।

हैजा होने के प्रमुख कारण :

Haija Cholera karan lakshan bachav हैजा कारण, लक्षण और बचाव के उपाय

हैजा कारण, लक्षण और बचाव

  • रोग अलग-अलग जीवाणुओं से होते हैं। दूषित पेय-पदार्थों या दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन से रोग हो सकते हैं, इसके अलावा गैर-छने या बगैर क्लोरीनवाले पानी एवं सड़े-गले बासे खाद्य पदार्थों से भी रोग हो सकता है, जब मक्खियाँ अशुद्ध भोजन या मल पर बैठकर फिर शुद्ध भोजन पर बैठती हैं तो उसे भी दूषित कर देती हैं।
  • शरीर में रोगाणु पहुँचने के पश्चात् रोग 24 से 72 घंटों के बीच कभी भी हो सकता है। कुछ मामलों में पाँचवें दिन रोग के लक्षण उत्पन्न होते हैं, जबकि आंत्रशोथ रोगाणु प्रवेश के बाद शीघ्र होता है।

हैजा और आंत्रशोथ के प्रमुख लक्षण :

  • रोग के जीवाणु मनुष्य की आँतों में पहुँचकर एक विशेष प्रकार का विष उत्पन्न करते हैं। इस विष के कारण ही रोगी की स्थिति गंभीर हो जाती है।
  • हैजा में पेट में मरोड़ या दर्द के बिना अपने आप लगातार पतले दस्त होते हैं।
  • एक-दो दस्त के पश्चात् उलटियाँ भी शुरू हो जाती हैं। इसके साथ ही शरीर की मांसपेशियों में ऐंठन होती है।
  • रोगी को कमजोरी महसूस होने लगती है। पानी की कमी के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं-त्वचा ठंडी हो जाती है एवं कई जगह इसमें सिकुड़न आ जाती है। आँखें अंदर धंस जाती हैं, जबकि आंत्रशोथ में ये लक्षण देर से मिलते हैं।
  • आंत्रशोथ में हाथ-पैर में ऐंठन नहीं होती तथा दस्तों का रंग पीला या मटमैला होता है, जबकि भोजन विषाक्तता में पहले उलटियाँ होती हैं।
  • हैजा में ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। नाड़ी की गति मंद पड़ जाती है। यदि ऐसे समय में रोगी के शरीर में पर्याप्त पानी एवं लवणों की मात्रा नहीं पहुँचाई जाती तो उसका बचना मुश्किल हो जाता है। लेकिन उचित इलाज मिलने पर शीघ्र सुधार होने लगता है।
  • आंत्रशोथ में मरीज की स्थिति एकदम नहीं बिगड़ती।
  • यह जरूरी नहीं कि हैजा के प्रत्येक मामले में उपरोक्त सभी लक्षण मिलें। अधिकतर रोगियों में संक्रमण हलके तरह का होता है। इसमें रोगी गंभीर अवस्था तक नहीं पहुँच पाता।
  • उसे केवल कुछ दस्त और उलटियाँ होती हैं, जो इलाज से ठीक हो जाती हैं। बच्चों में, विशेषकर 12 महीने से कम उम्र के शिशुओं में हैजा होना अत्यंत खतरनाक होता है।
  • बच्चों में इस रोग से मृत्यु दर 15 से 17 प्रतिशत तक है। जबकि वयस्कों में मृत्यु दर , 5 से 6 प्रतिशत है।
  • हैजा होने के बाद बच्चों का दिमाग भी ठीक तरह से कार्य नहीं कर पाता और उन्हें झटके (कनवल्सन) आने लगते हैं। उनमें लवणों और ग्लूकोज इत्यादि की कमी अपेक्षाकृत जल्दी हो जाती है। शरीर में अम्लता की मात्रा भी जल्दी बढ़ती है और उनकी दशा गंभीर हो जाती है।
  • कई बार आंत्रशोथ एवं खाद्य विषाक्तता के लक्षणों से हैजा होने की शंका हो सकती है, लेकिन इन रोगों के लक्षणों में भिन्नता निम्न तरह होती है
  • भोजन विषाक्तता (फूड पॉयजनिंग)-इस रोग में उलटी-दस्त तो होते हैं, लेकिन पहले उलटियाँ बाद में दस्त लगते हैं। पेट में ऐंठन और दर्द होता है, जो सामान्यतः हैजा में नहीं होता। इसमें मरीज को हलका बुखार भी होता है।
  • इसके अलावा फूड पॉयजनिंग एक परिवार में एक साथ कई सदस्यों को होती है। इसके लक्षण विषाक्त भोजन लेने के कुछ ही समय पश्चात् उत्पन्न हो जाते हैं। मरीज के खान-पान के बारे में पूछने पर फूड पॉयजनिंग की पुष्टि हो जाती है। जानिए फ़ूड पॉइजनिंग के कारण और बचाव के उपाय-Food Poisoning
  • आंत्रशोथ (गेस्ट्रोएंट्राइटिस)-इसके लक्षण भी हैजा से मिलते-जुलते हैं। उलटी-दस्त इसमें भी होते हैं, सामान्यत: आंत्रशोथ में पेटदर्द भी होता है, बुखार भी रह सकता है, जबकि हैजा में ये दोनों लक्षण अकसर नहीं होते। आंत्रशोथ में चावल के मांड सरीखे दस्त न जाकर मरीज मटमैले दस्त करता है। बाद में खून मिली ऑव भी आ सकती है। आंत्रशोथ भी अशुद्ध पेय पदार्थों या दूषित भोजन द्वारा होता है।
  • आंव पड़ना- इस रोग में भी रोगी को पेट में दर्द और ऐंठन के साथ दस्त लगते हैं। लेकिन यह रोग आंत्रशोथ, हैजा या भोजन विषाक्तता से निम्न प्रकार से भिन्न होता है
  • आंव की बीमारी में रोगी को उलटियाँ नहीं होती हैं।
  • इसमें पेट में ऐंठन के साथ मरीज को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दस्त आता है।
  • कभी कभी दस्त के साथ खून भी आ सकता है। इसे खूनी आंव कहते हैं।
  • आंव की बीमारी में शरीर के पानी और खनिज-लवणों की कमी अधिक नहीं हो पाती, इस कारण मरीज की स्थिति गंभीर नहीं हो पाती और रोगी चलता-फिरता रहता है।
  • आंव का इलाज तुरंत करना चाहिए, साथ ही दूषित जल या भोजन से बचना चाहिए, क्योंकि यह बीमारी भी अशुद्ध जल या पेय पदार्थों या अशुद्ध भोजन द्वारा होती है।

हैजा का इलाज कैसे होता है :

  • इलाज में सबसे पहले शरीर में पानी एवं खनिज लवणों की कमी को दूर करते हैं। इसके लिए रक्त वाहिकाओं द्वारा सेलाइन, ग्लूकोज एवं अन्य आवश्यक लवणों का घोल, जैसेलेक्टेट देते हैं। साथ ही जीवनरक्षक घोल भी पिलाते रहते हैं।
  • जीवाणु बाईब्राकालरी को नष्ट करने के लिए जीवाणु प्रतिरोधी दवा टेट्रासाइक्लिन देते हैं। इसके अलावा आंत्रशोथ और भोजन विषाक्तता का भी लगभग यही इलाज है।
  • सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि रोगी के शरीर में पानी और खनिज-लवणों की कमी न होने पाए।
  • जीवनरक्षक घोल बनाने की विधि -यह एक लीटर पानी में एक बड़ा चम्मच शक्कर या गुड़ और तीन चुटकी नमक डालकर बनाया जा सकता है। यदि उपलब्ध हो तो एक या आधा नीबू भी इसमें निचोड़ा जा सकता है। इस घोल को थोड़े-थोड़े समय के अंतर से कई बार पिलाना चाहिए। आजकल जीवनरक्षक घोल के बने-बनाए पैकेट भी उपलब्ध हैं। इन्हें उपयोग करना बेहतर रहता है।

हैजे के इलाज के लिए कुछ घरेलू उपाय :

  • राई पीसकर पेट पर लगाने से उल्‍टी बंद हो जाती है।
  • हैजा में रोगी को नींबू पानी या पानी में नारियल पानी मिलाकर पिलाना चाहिए, ताकि उल्‍टी के साथ दूषित चीजें बाहर निकल जाएं।
  • पानी में लौंग उबालकर पिलाने से तत्‍काल आराम मिलता है और हैजा ठीक हो जाता है।
  • तुलसी की पत्ती व काली मिर्च पीसकर चटाने से हैजा ठीक होने लगता है।
  • प्याज व नींबू का रस गर्म पानी में मिलाकर पिलाने से आराम मिलता है और धीरे-धीरे हैजा ठीक हो जाता है।
  • हैजा रोग जब तक पूरी तरह ठीक न हो जाए नींबू-पानी पिलाते रहना चाहिए।
  • 25 से 50 ग्राम प्याज रस पिलाने से हैजे में आराम मिलता है।
  • दारू हल्दी का काढ़ा भी हैजे में लाभकारी है।
  • अमृतधारा भी बहुत लाभकारी है – अमृतधारा बनाने के लिये निम्न तीन चीजें बराबर मात्रा में ली जाती हैं
  • कपूर, पुदीने के फूल या पुदीने की पत्तियां और अजवाइन
  • इन तीनों चीजों को समभाग में लेकर शीशी में रखें और शीशी का मुँह बंद कर देवें। इससे कुछ ही देर में अर्क तैयार हो जायेगा। इस अमृतधारा की 5 से 7 बूंद चीनी या बताशे के साथ रोगी को खिलाना चाहिए। यह हैजे की रामबाण दवा है। इससे उल्टियाँ के दस्त लगना, पेट दर्द, जी मिचलाना या बदहजमी जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं।
  • निम्नलिखित आठ चीजों को समान मात्रा में लें- जीरा, सेंधा नमक, लहसुन, शुद्ध गन्धक, सोंठ काली मिर्च,पीपल और भुनी हींग – इन सब चीजों को नींबू के रस में मिलाकर चने जैसी गोलियाँ बना लें । ये तीन या 5 गोलियां हैजे के रोगी को पानी के साथ खिलाएं

हैजा से बचाव :

  • साफ-सफाई तथा शुद्ध पेयजल उपयोग में लाएँ। कुओं की बजाय हैंडपंप का पानी अपेक्षाकृत शुद्ध होता है। यह उपलब्ध न हो तो पानी को उबालकर ठंडा करके पिया जाए।
  • इसके अलावा ताजे खाद्य पदार्थ उपयोग में लाएँ। भोजन सामग्री ढककर रखें, बासी और सड़े-गले फल इत्यादि से परहेज रखें। यही उपाय फूड पॉयजनिंग से बचने के भी हैं। पेट की गैस की रामबाण दवा तथा अचूक आयुर्वेदिक इलाज
  • सामूहिक भोजों में बासी और खोवे से तैयार मिठाई खाने से बचें।
  • हैजा के रोगी के परिवारवालों को कुछ विशेष सावधानियाँ बरतने की आवश्यकता होती है। मरीज की देखरेख करने वाले व्यक्ति अपने कपड़े बदलें एवं साबुन से अच्छी तरह हाथ धोएँ।
  • परिवार के व्यक्ति अगर चाहें तो डॉक्टर से सलाह लेकर टेट्रासाइक्लिन कैप्सूल सुरक्षा के बतौर पाँच दिन तक खा सकते हैं।
  • बच्चों में पानी की कमी इस तरह पता करते हैं-यदि त्वचा की भरी गई चुटकी बहुत देर तक बनी रहती है तो बच्चे को पानी की अत्यंत कमी है। दस्त के घरेलू उपचार -Diarrhea Treatment 30 Tips
  • व्यक्तिगत साफ-सफाई पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। जैसे-शरीर और कपड़ों की सफाई, नाखूनों का कटा होना, भोजन के पूर्व साबुन से हाथ धोना इत्यादि। पारिवारिक सदस्यों एवं संपर्क में आए व्यक्ति को भी हैजे का टीका लगवा लेना चाहिए। क्योंकि रोग से बचाव के लिए हैजा का टीका ही इलाज है।
  • संक्रमित क्षेत्र में तो यह टीका सभी को लगवा लेना चाहिए, इससे कोई हानि नहीं होती। हाँ केवल गर्भवती महिलाएं इसे न लगवाएँ।

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