टाइफाइड बुखार के आयुर्वेदिक उपचार तथा इस बीमारी से जुड़े कुछ सवालों के जवाब

दूषित पानी और दूषित खाना खाने से टाइफाइड बुखार (आंत्रिक ज्वर) होता है। टाइफाइड बुखार को मियादी बुखार, मोतीझरा आदि अनेक नामों से भी जाना जाता है। टाइफाइड बुखार से पीड़ित रोगी शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो जाता है। यदि समय पर उचित इलाज न की जाए तो रोगी की मृत्यु तक हो सकती है। टाइफाइड बुखार के जीवाणु किसी रोगी व्यक्ति से या दूषित जल व खाद्य-पदार्थों के साथ मिलकर स्वस्थ व्यक्तियों तक पहुंचकर उन्हें रोगी बनाते हैं। विशेषकर किशोर और युवा वर्ग इस रोग से अधिक पीड़ित होते है। जीवाणु शरीर में पहुंचकर आंतों में संक्रमन करके टाइफाइड बुखार का कारण बन जाते हैं। इस बीमारी में रोगी की आंत्रों में जख्म बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में रोगी के मल के साथ रक्त स्राव भी होने लगता है। दस्त लगने से रोगी को अधिक हानि होने की संभावना रहती है।

टाइफाइड बुखार दो-तीन सप्ताह के अंदर ठीक हो जाता है, लेकिन ऐसी स्थिति में रोगी का ठीक से इलाज  होना चाहिए। थोड़ी-सी लापरवाही से रोगी की स्थिति अधिक खराब हो सकती है। आंत्रिक ज्वर के चलते प्रारंभ में शरीर के विभिन्न अंगों में पीड़ा, सिर-दर्द, कब्ज, बेचैनी और बुखार के कम या ज्यादा होने के लक्षण दिखाई देते हैं। बिस्तर पर अधिक समय तक लेटे रहने से कमर में दर्द भी होने लगता है। रोगी को रात को नींद नहीं आती है। वैसे तो टाइफाइड बुखार जैसे गंभीर रोगों का इलाज तुरंत किसी अच्छे डॉक्टर से करवाना चाहिए लेकिन कई बार मरीज ऐसे स्थान या ऐसे हालात में होता है की चिकित्सा की पहुँच उससे बहुत दूर या बाहर होती है इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस आर्टिकल में हम टाइफाइड बुखार में फ़ौरन राहत पाने के लिए कुछ आसान घरेलू उपचार बताएँगे जो फ़ौरन इस रोग के कष्ट को कम करने में मदद करेंगे |

टाइफाइड बुखार का घरेलू आयुर्वेदिक इलाज

typhoid bukhar ki dawa टाइफाइड बुखार के आयुर्वेदिक उपचार तथा इस बीमारी से जुड़े कुछ सवालों के जवाब

टाइफाइड बुखार के आयुर्वेदिक उपचार

  • मुनक्का को बीच से चीरकर उसमें काला नमक लगाकर, हल्का-सा सेंककर खाने से बहुत लाभ होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार मुनक्का से टाइफाइड बुखार के जीवाणु खत्म होते हैं। अधिक मात्रा में मुनक्का नहीं खिलाएं, क्योंकि अधिक मुनक्का खाने से दस्त हो सकते है।
  • गिलोय का रस 5 ग्राम थोड़े-से शहद के साथ मिलाकर चटाने से टाइफाइड बुखार में बहुत लाभ होता है। गिलोय का क्वाथ भी शहद में मिलाकर पिला सकते हैं।
  • अजमोद का चूर्ण 3 ग्राम शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से रोग में बहुत लाभ होता है।
  • मुनक्का, वासा, हरड़ 3-3 ग्राम मात्रा में लेकर 300 ग्राम जल में क्वाथ बनाकर उसमें शहद और मिसरी मिलाकर रोगी को पिलाने से टाइफाइड बुखार में लाभ होता है।
  • काली तुलसी, बन तुलसी और पोदीना 3-3 ग्राम मात्रा में रस निकालकर रोगी को 3 ग्राम मात्रा दिन में दो-तीन बार पिलाने से लाभ होता है।
  • टाइफाइड बुखार होने पर रोगी के सिर पर शृंगराज तेल की पट्टियां रखकर तथा ठंडे जल की थैली रखने से बेचैनी और बुखार की गर्मी कम होती है।
  • घीये (लौकी) के टुकड़ों को तलुओं पर मलने से भी बुखार की गर्मी कम होती है।
  • तेज़ बुखार के कारण बेहोशी होने पर अदरक और लहसुन का रस 2-2 ग्राम मिलाकर एक-एक बूंद छान लें। उस छने हुए रस को थोड़ा-थोड़ा पिलाने से प्यास कम लगती है।
  • सरसों के तेल में सेंधा नमक मिलाकर छाती पर मलने से कफ आसानी से निकल जाता है। खांसी की तेजी कम होती है।
  • सितोपलादि चूर्ण 3 ग्राम शहद मिलाकर चाटने से टाइफाइड बुखार में होने वाली खांसी से राहत मिलती है। रोगी को मूंग की दाल बनाकर देने से लाभ होता है, लेकिन दाल को घी के साथ छौंककर नहीं दें। मिर्च का उपयोग भी न करें।
  • रोगी को टाइफाइड बुखार में अधिक प्यास लगने पर लौंग के 5 दाने 500 ग्राम पानी में उबालकर थोड़ा-थोड़ा पानी पीने को दें।

टाइफाइड बुखार से जुड़े कुछ सवाल-जवाब

टाइफाइड बुखार किसी एक मौसम की बीमारी नहीं है। यह पूरे साल किसी भी समय हो सकता है। इसीलिए बुखार के सभी ऐसे मामले में, जिसमें बुखार अधिक दिन तक बना रहता है, इसकी जाँच जरूरी हो जाती है। खून की जाँच से साफ़ पता चल जाता है कि इसकी पैठ भीतर हो चुकी है। तब असरकारक ऍटिबॉयटिक दवाओं और सही देखभाल से मरीज की बीमारी दूर की जा सकती है।

टाइफाइड बुखार क्या है और यह कैसे होता है ?

  • टाइफाइड बुखार एक खास प्रकार के बैक्टीरिया-सालमोनेला टाइफी-से होने वाला बुखार है। यही मोतीझरा, मियादी बुखार और आँत्र-ज्वर है। और यही एंटरिक फीवर है। किसी समय यह बहुत गंभीर रोग समझा जाता था, पर प्रभावशाली ऐंटिबॉयटिक दवाओं के आने के बाद से अब इसका इलाज काफी आसान हो गया है। दरअसल यह एक संक्रामक रोग है। इसे पैदा करनेवाला सूक्ष्मजीव सालमोनेला पीने के पानी, भोजन, फल-सब्जी और दूध में छिप कर आदमी की आंत में पहुँचता है और बढ़ने लगता है। इसकी पैठ के दस से पंद्रह दिनों बाद बुखार आ जाता है और टाइफाइड के अन्य लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं।

सालमोनेला बैक्टीरिया खान-पान की चीजों में कैसे पहुँचता है ?

  • सालमोनेला टाइफी सिर्फ आदमी में ही अपना ठिकाना बनाता है। टाइफाइड बुखार के मरीज में यह लाखों की संख्या में होता है, लेकिन कुछ लोगों में यह बगैर कोई रोग पैदा किए यों ही छिपा पड़ा रहता है। इसलिए इन दोनों ही वर्ग के लोगों से यह दूसरों लोगो में फ़ैल जाता है। यह उनके मल और मूत्र में छिपा रहता है। पेशाब और शौच जाकर ठीक से हाथ न धोने पर उनके हाथ दूषित रह जाते हैं और यह खान-पान की चीजों में चला जाता है, जिससे दूसरों को भी रोग हो जाता है। तंग गंदी बस्तियों में जहाँ लोग खुले में शौच जाते हैं और हर जगह मक्खियाँ भिनकती रहती हैं, सालमोनेला का फैलाव मक्खियों से भी होता है। रेहड़ी-खोमचों पर खुली बिकने वाली खाने-पीने की चीजें जैसे कटे हुए फल, चाट-पकौड़ी, मिठाई, फलों का रस, कुल्फी आदि में भी सालमोनेला टाइफी और उस जैसे दूसरे बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया होने का हमेशा डर होता है। शहरों में पीने का पानी भी दूषित हो सकता है। छोटी जगहों पर कुएँ, हैंडपंप और तालाब का पानी भी सालमोनेला से गंदा हो सकता है और यह महामारी फैला सकता है।
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टाइफाइड बुखार के लक्षण क्या हैं ?

  • यह बुखार शुरू में बिलकुल फ्लू की तरह मालूम पड़ता है। सिर में दर्द और गले में खराश के साथ बुखार आता है, जो रोजाना थोड़ा-थोड़ा बढ़ता जाता है और 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। किसी को उल्टियों और दस्त की शिकायत होती है, तो कोई कब्ज बताता है। भूख मर जाती है और कमजोरी आ जाती है। इलाज न मिलने पर बुखार टूटता नहीं। टाइफाइड बुखार के दूसरे हफ्ते में कुछ मरीजों के पेट पर गुलाबी रंग के दाने दिखाई देते हैं। लगातार बुखार रहने और भीतर टाइफाइड टॉक्सिन बनने के कारण मरीज की हालत बिगड़ने लगती है। उसकी कमजोरी बढ़ जाती है और वह बेसुध-सा पड़ा रहता है। तीसरे हफ्ते में आंत का जम फट जाने पर मरीज की हालत और भी खराब हो जाती है। लेकिन ऐसी बदहालत गाँव-कस्बों में ही होती है। जहाँ बीमार को दवा देने की बजाय टोटकों से इलाज की कोशिश की जाती है।

यह कैसे पता लगता है कि किसी को टाइफाइड ही हुआ है ?

  • अनुभवी डॉक्टर मरीज के लक्षण, नब्ज और शारीरिक जाँच से टाइफाइड होने का अनुमान लगा सकता है पर पुष्टि के लिए मरीज के खून की जाँच जरूरी होती है। बुखार का पहला हफ्ता हो, तो मरीज के खून का नमूना लेकर सालमोनेला टाइफी की जाँच करने के लिए ब्लड कल्चर किया जाता है। जिन्हें ऐंटिबॉयटिक दवा मिल चुकी होती है, उनमें जाँच विश्वसनीय नहीं रहती। बुखार के दूसरे हफ्ते में मरीज के खून में ऐंटिबॉडी का स्तर नाप कर भी टाइफाइड का पता लग सकता है। यह विडाल टेस्ट, ब्लड कल्चर जितना सटीक तो नहीं होता, लेकिन इसकी मदद से जटिल मामलों में ठीक निदान तक पहुँचा जा सकता है।

टाइफाइड बुखार के इलाज में किन-किन सावधानियों की जरूरत होती है ?

  • टाइफाइड बुखार के मरीज को पूरा आराम चाहिए होता है। बुखार के शुरू के दिनों में उसे बिलकुल बिस्तर में लेटे रहना चाहिए। जो कोई उसकी सेवा करे, उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि मरीज से उसे भी छूत लग सकती है। इसीलिए मरीज का बदन पोंछने के बाद या दूसरे किसी रूप में संपर्क में आने के बाद उसे अपने हाथ साबुन से जरूर धो लेने चाहिए।
  • टाइफाइड बुखार के मरीज के खान-पान पर भी पूरा ध्यान देने की जरूरत होती है। नरम, तरल पदार्थ- जैसे दलिया, खिचड़ी, साबूदाना, पोहा, दही, केला, पपीता इत्यादि उसे नियम से दिए जाने चाहिए ताकि उसके शरीर में पौष्टिक तत्त्वों की पूर्ति होती रहे। उसे खूब मात्रा में तरल पदार्थ भी दिए जाने चाहिए। इससे उसे बेचैनी से राहत मिलेगी और कमजोरी कम महसूस होगी।
  • मरीज की साफ-सफाई पर भी ध्यान देना जरूरी है। उसे नहलाने में कोई हर्ज नहीं, बल्कि मरीज इससे बेहतर महसूस करता है। कमजोरी अधिक होने पर उसका बदन गीले कपड़े से पोंछा जा सकता है। लेकिन यह तौलिया किसी और के इस्तेमाल में नहीं आना चाहिए।
  • दवा के रूप में डॉक्टर द्वारा बताई गई एंटीबायोटिक दवा पूरी मात्रा में और ठीक समय से लेनी बहुत जरूरी है। दवा की खुराक में अपने अंदाज से कटौती करना खतरनाक साबित हो सकता है। इससे बुखार पैदा करने वाले रोगाणु जिंदा बच जाते हैं और उनकी तेजी से बन रही नई पीढ़ियों में यह ताकत आ जाती है कि फिर यही दवा उन पर असर नहीं कर पाती। इससे देखते ही देखते मामला बिगड़ जाता है और रोग से लड़ने के लिए कोई दूसरी कारगर ऐंटिबॉयटिक दवा हूँढ़नी जरूरी हो जाती है।
  • पूरी दवा लेने से सामान्यतः टाइफाइड बुखार अड़तालीस से बहत्तर घंटों में उतरना शुरू हो जाता है। लेकिन पूरे इलाज के लिए दवा दो हफ्ते तक लेनी होती है। दवा ठीक समय शुरू हो जाए तो रोग जल्दी काबू में आ जाता है और मरीज उसकी दर्दनाक जटिलताओं से बच जाता है। आज टाइफाइड रोगाणुओं को खत्म करने के लिए कई प्रभावशाली टाइफाइड की एलोपैथिक दवा भी उपलब्ध हैं। इनमें एमोक्सीसिलिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन, ओफ्लोक्सासिन मोनोसेफ और सेफिजाइम विशेष रूप से कामयाब हैं।

क्या टाइफाइड बुखार की रोकथाम के लिए टीके भी लगाए जाते हैं ?

  • हाँ, टाइफाइड से बचने के लिए आज कई तरह के टीके उपलब्ध हैं। कुछ हैं जो सुई से लगते हैं। पहली बार ये चार से छह हफ्ते के अंतर पर दो बार लगते हैं। फिर इन्हें हर तीसरे साल लगवाना होता है। लेकिन कुछ वर्षों से टाइफाइड रोकथाम टीके की गोलियाँ भी बाजार में आ गई हैं। ये टाइफाओरल के नाम से मिलती हैं। छह साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति इनकी तीन खुराक ले सकता है। यह कैप्सूल खाने से कम से कम एक घंटे पहले लेना होता है और यदि आज इसकी पहली खुराक ली जाए, तो आज से तीसरे दिन दूसरी और पाँचवें दिन तीसरी खुराक लेनी होगी। इसका असर तीन साल तक रहता है, फिर इसे दुबारा लेना पड़ता है।

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